- मऊगंज की छात्रा आकांक्षा की मौत केवल एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं पर उठते भरोसे के संकट की गंभीर चेतावनी है
मध्य प्रदेश के मऊगंज जिले की 20 वर्षीय आकांक्षा चतुर्वेदी उर्फ स्नेहा की आत्महत्या की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है। डॉक्टर बनने का सपना लेकर नीट की तैयारी करने वाली इस छात्रा ने नागपुर में अपने कमरे में फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। बताया गया कि परीक्षा में अच्छे अंक आने की उसे पूरी उम्मीद थी, लेकिन पेपर लीक और परीक्षा को लेकर पैदा हुए विवादों के बाद वह गहरे अवसाद में चली गई। अपने पीछे छोड़े गए सुसाइड नोट में उसने दोबारा परीक्षा देने की हिम्मत न होने की बात लिखी। यह केवल एक छात्रा की आखिरी चिट्ठी नहीं है, बल्कि उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है जिसे आज लाखों प्रतियोगी छात्र महसूस कर रहे हैं।
आकांक्षा एक किसान परिवार से थी। उसके माता-पिता ने अपनी बेटी को डॉक्टर बनाने का सपना देखा था और बेटी भी उसे पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत कर रही थी। परीक्षा देकर लौटने के बाद उसने आत्मविश्वास के साथ अपने पिता से कहा था कि वह डॉक्टर बनेगी, क्योंकि उसका पेपर बहुत अच्छा गया है। लेकिन कुछ ही दिनों बाद जब परीक्षा को लेकर विवाद शुरू हुआ, तो वही आत्मविश्वास निराशा में बदल गया। यह घटना बताती है कि किसी परीक्षा की विश्वसनीयता पर उठने वाला सवाल केवल प्रशासनिक समस्या नहीं होता, बल्कि यह सीधे छात्रों की मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है।
देश में प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के भविष्य का आधार मानी जाती हैं। लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, परिवार अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च करता है और पूरा घर एक सपने के साथ जीता है। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लग जाए तो सबसे बड़ी चोट उन युवाओं को लगती है जिन्होंने केवल अपनी मेहनत और प्रतिभा पर भरोसा किया होता है। उन्हें लगने लगता है कि कहीं उनकी ईमानदार कोशिश किसी गड़बड़ी की भेंट तो नहीं चढ़ गई।
सबसे गंभीर चिंता यह है कि पेपर लीक और परीक्षा में अनियमितताओं की खबरें अब समय-समय पर सामने आती रहती हैं। हर घटना के बाद जांच और कार्रवाई की बातें होती हैं, लेकिन व्यवस्था में ऐसा भरोसा अभी तक नहीं बन पाया है कि छात्र पूरी तरह निश्चिंत महसूस कर सकें। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और प्रतिभा-आधारित समाज के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती।
हालांकि किसी भी परिस्थिति में आत्महत्या समाधान नहीं है और न ही इसे किसी समस्या का उत्तर माना जा सकता है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि ऐसी घटनाओं को केवल व्यक्तिगत निर्णय बताकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमें यह समझना होगा कि प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव, भविष्य की चिंता और व्यवस्था पर उठते सवाल कई बार युवाओं को मानसिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में पहुंचा देते हैं।
सरकारों, परीक्षा एजेंसियों और शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी केवल परीक्षा आयोजित करने तक सीमित नहीं है। उन्हें ऐसी व्यवस्था भी बनानी होगी जिस पर छात्रों का भरोसा अटूट रहे। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य सहायता, काउंसिलिंग और संकट की स्थिति में छात्रों तक तत्काल सहायता पहुंचाने की व्यवस्था को भी मजबूत करना होगा।
आकांक्षा चतुर्वेदी अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उसकी मौत एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिसका जवाब पूरे सिस्टम को देना होगा। यदि मेहनत करने वाले युवाओं का भरोसा बार-बार टूटता रहा, तो नुकसान केवल कुछ छात्रों का नहीं होगा, बल्कि देश की उस प्रतिभा का होगा जिस पर भविष्य की नींव टिकी है।
