बसपा के शासन में 2011 में आई थी भर्ती, फिर सपा की सरकार बनी और अब भाजपा का शासन, कोर्ट में मिल रही तारिख

सौम्या द्विवेदी

भारत में और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह सरकारी नौकरी और परीक्षाओं को लेकर चर्चाएं चल रही हैं, वह बहुत गंभीर है। अब तो युवा यह मानने लगे हैं कि नौकरी के लिए पढ़ना, परीक्षा देना और परिणाम आने तक के ही स्तर नहीं है, बल्कि इसमें पेपर लीक होना और सालों तक कोर्ट के चक्कर लगाना भी शामिल है। इसलिए यदि सरकारी नौकरियों के चक्कर में है तो संभल जाइए। यह हालांकि तंज है, मगर गलत भी नहीं है। तमाम ऐसे उदाहरण है, जिनमें व्यवस्थागत खामियों की वजह से यहाँ भर्तियां समय पर पूरी नहीं हो पा रही है। अभ्यार्थी परीक्षा देने के बाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के चक्कर लगाने को विवश हैं। वो भी तब जब हम पूरी दुनियाँ में विश्वगुरु बनकर निरंतर अपनी पीठ थपथपाते आ रहे हैं। अब तो यह माना जाने लगा है कि ये भर्तियां चुनाव में वोट पाने का एक जरिया हैं और उसमें समस्याएं जानबूझकर उत्पन्न की जाती हैं, ताकि लंबे समय तक परीक्षार्थी कोर्ट में उलझे रहें । कुछ लोग यहां तक कहते हैं कि सरकार अब नौकरी देना ही नहीं चाहती।

यहां हम जिस भर्ती की बात कर रहे हैं उसको शुरू हुए राम जी के वनवास से भी लंबा समय हो गया, क्योंकि राम जी का वनवास तो 14 वर्ष में पूरा हो गया था, लेकिन उत्तर प्रदेश में बसपा के शासन के दौरान 2011 में आई उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक विद्यालयों के लिए शिक्षक चयन भर्ती का जो वनवास है वह अभी तक चल रहा है। दुःखद ये कि कुछ अभ्यर्थी तो नौकरी का इंतजार करते-करते इस धरती को भी अलविदा कर गए।

व्यवस्था की संवेदनहीनता औऱ शिक्षक चयन भर्ती के 12091 अभ्यर्थियों के संघर्ष की कहानी भी अजीब है। बात शुरू होती है 30 नवंबर 2011 में जब उत्तर प्रदेश की सरकार ने बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत संचालित प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक भर्ती हेतु एक निर्धारित प्रारूप पर आवेदन मांगे। इसके अंतर्गत उत्तर प्रदेश में टेट 2011 भर्ती, जिसमें जिलावार 72825 शिक्षकों की भर्ती होने वाली थी। इस तरह से यह एक बड़ी भर्ती प्रक्रिया थी। इसका आधिकारिक विज्ञापन जो 2011 में जारी हुआ जिसमें चयन टेट के अंकों पर होना था लेकिन बाद में जिस तरह भर्ती के नियमों में बदलाव, जटिल कानूनी प्रक्रिया,भर्ती प्रक्रिया में संशोधन, याचियो और मुकदमों में उलझाया गया। उसने हजारों अभ्यर्थियों को निराशा के गहरे अंधकार मे डूबो दिया।

राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार इस प्रशिक्षण के लिए अहर्ताएं तय की गई, साथ ही कक्षा 1 से 5 तक के शिक्षकों हेतु आयोजित अध्यापक पात्रता परीक्षा टेट उत्तीर्ण होना अनिवार्य था। आवेदन पत्र के साथ प्राचार्य जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान के पक्ष में ₹500 का बैंक ड्राफ्ट सामान्य के लिए और ₹200 का अनुसूचित जाति जनजाति के अभ्यर्थियों के लिए तय किया गया। इसके अलावा कुल व्यक्तियों के सापेक्ष 10% रिक्तियां सुरक्षित रखी गईं शिक्षामित्रों के लिए।

30 -11 -2011 की नियुक्ति को हाई कोर्ट इलाहाबाद में चुनौती दी गई कि पांच ही जिलों में आवेदन क्यों किया गया?,और ₹500 का बैंक ड्राफ्ट एक से अधिक जिले में क्यों भेजा जाए? इस पर हाई कोर्ट इलाहाबाद नें आदेश जारी किया कि किसी एक जनपद के बैंक ड्राफ्ट को मूल बैंक ड्राफ्ट मानकर सभी जनपदों में उसकी छाया प्रति भेज कर आवेदन करें। अभ्यर्थियों नें यही किया लेकिन बाकी जिलों में जो 500 के पांच बैंक ड्राफ्ट अभ्यर्थियों ने भेजें उनका कोई पता ठिकाना नहीं, वह पैसा उनका कहाँ गया।

इसके बाद बसपा का शासन खत्म होने और समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद इस विज्ञापन को ही निरस्त कर दिया गया। नया विज्ञापन जारी करते हुए टेट मेरिट को ही अंतिम रूप से चयन का आधार बनाया। अब यहीं से अभ्यर्थियों को परेशान करने का एक काम शुरू हो गया।

30-11-2011 की विज्ञप्ति में जो चयन टेट के अंको पर होना था उस भर्ती प्रकिया को ही 07-12-2012 के विज्ञापन में बदल दिया गया। अब चयन हाई स्कूल से लेकर स्नातक बीएड के प्राप्ताँक के गुणांक के आधार पर तय कर दिया।

सपा सरकार ने चयन प्रक्रिया को बदल कर इसे शैक्षणिक गुणांक के आधार पर करने का निर्णय लिया औऱ एक दिन काउंसलिंग भी कर ली गई। सरकार के इस निर्णय को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चैलेंज किया गया। समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा इस विषय पर तथ्यात्मक दलील ना पेश करने के कारण इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विज्ञापन को निरस्त कर दिया और पुनः मूल विज्ञापन को बहाल किया, जिस पर सपा सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज किया, लेकिन माननीय सुप्रीम कोर्ट नें भी इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया, और कहा कि पहले से बनाए नियमों को बीच में बदला नहीं जा सकता।

अंततः यह भर्ती 30 /11 /2011 के ही विज्ञापन के आधार पर शुरू करना पड़ा जिसके तहत 17 /12/ 2014 तक 54464 पद भरे गए। फिर अचानक चयन प्रक्रिया रुक गई। प्रकिया रुकने पर जब सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे की सुनवाई में सरकार से प्रश्न पूछा गया कि चयन प्रक्रिया आगे क्यों नहीं बढ़ी, तब राज्य सरकार ने 14640 रिक्त पदों का हवाला देते हुए माननीय न्यायालय को बताया कि सरकार नियुक्ति देने के लिए बुला रही है मगर लोग आ ही नहीं रहे हैं । तब इन 14640 पदों पर नियुक्ति का क्राईटेरिया तय करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सामान्य वर्ग के लिए 70% और आरक्षित वर्ग के लिए 65 प्रतिशत टेट अंक तय किया एवं उस क्राइटेरिया में आने वाले अभ्यार्थियों से प्रत्यावेदन लेने और उन्हें नियुक्त करने का निर्देश दिया।

इसके लिए सरकार को एक सूची बनाने का भी निर्देश दिया गया इसके बाद उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद इलाहाबाद में एक विज्ञप्ति प्रकाशित की जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का हवाला देते हुए टीईटी के लिए निर्धारित अंक प्राप्त अभ्यर्थियों को काउंसलिंग में उपस्थित होने के लिए आमंत्रित किया और 16/11/2015 तक डाक और स्पीड पोस्ट के माध्यम से फॉर्म भेजनें के लिए कहा। इस विज्ञापन के उपरांत 16/11/2015 तक 75612 प्रत्यावेदन प्राप्त हुए जिनमें से 3149 आवेदन खारिज कर दिए गए और 72463 प्रत्यावेदनों पर विचार किया गया जिसमें से 12091 अभ्यर्थियों को छांटा गया।

सरकार के अनुसार यह 12091 अभ्यर्थी कट ऑफ मेरिट से ऊपर थे और एक या दो जिलों की कट ऑफ मेरिट से ऊपर उनके अंक थे। टेट अनुक्रमांक और एससीइआरटी के द्वारा दिए गए मास्टर डाटा की सूचना के आधार पर इन अभ्यर्थियों का चयन किया गया, लेकिन इसमें यह स्पष्ट नहीं हुआ कि वह कौन-कौन से जनपद थे। ध्यान देने योग्य है कि इस सूची को उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के प्रधान सहायक, उपसचिव, संयुक्त सचिव एवं सचिव जैसे उच्च पदाधिकारियो ने हस्ताक्षर के साथ प्रमाणित भी किया। जिसके आधार पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने 7 /12 /2015 को आदेश देते हुए इन 12091 अभ्यर्थियों को 6 सप्ताह के भीतर जांच कर नियुक्ति देने का आदेश दिया।

उस समय उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद ने 14640 रिक्तियां दिखाई थी औऱ 12091 योग्य अभ्यर्थी थे और इनमें से केवल 400 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी गई। 3/2/2016 को एक काउंसलिंग करने का मौका दिया लेकिन उसमें 12091 के अभ्यर्थी शामिल नहीं हुए इसलिए 12091 अभ्यर्थियों को नियुक्ति नहीं दी गई।

इससे पहले 7 /12 /2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने दूसरे पार्ट में 1100 याचियों में से 862 अभ्यर्थियों को नियुक्त करने का आदेश दिया था। इन 862 में 840 लोगों की नियुक्ति दे दी गई थी औऱ मजेदार बात जिसे जानकर आप चौंक जायेंगे वो ये है कि इनको बिना वेरिफिकेशन किए हुए एडहॉक पर नियुक्ति दी गई। इन 862 में से 95 अभ्यर्थी ऐसे थे, जो 30 /11 /2011 के विज्ञापन में आवेदन ही नहीं किए थे, लेकिन नियुक्ति पा गए थे।

इसके अलावा सामान्य वर्ग के 80 ऐसे अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली जो 70% निर्धारित अंक टेट में प्राप्त नहीं कर पाए थे। यही हाल आरक्षित वर्ग में था जिसमें 171 अभ्यर्थी ऐसे थे जिन्होंने 60% अंक टेट में प्राप्त नहीं किए थे। 27 ऐसे अभ्यर्थियों को नियुक्ति मिली जो बेसिक नियमावली को भी पूरा नहीं कर पा रहे थे यानी कि जिनके 45% अंक भी नहीं थे।

2017 में भाजपा की सरकार बनने के बाद इन अभ्यर्थियों में एक उम्मीद जगी मगर,उत्तर प्रदेश बनाम शिवकुमार पाठक मामले में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टीईटी अंक को अंतिम योग्यता सूची मानने की जगह केवल एक अहर्ता परीक्षा ठहरा दिया।

13 दिसंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट में अभ्यर्थियों द्वारा सरकार द्वारा अपनाई गई नियुक्ति प्रक्रिया को त्रुटिपूर्ण मानते हुए इसे न्यायालय की अवमानना बताया था,उस अवमानना याचिका पर सुनवाई कर न्यायालय नें सरकार द्वारा अपनई गई नियुक्ति प्रक्रिया को सही ठहराया और उसमें किसी भी तरह की गलती न मानते हुए याचिकाओं को निरस्त कर दिया।

इसी बीच जनवरी 2024 में 12091 सूची के याचियों के पक्ष को सुनते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एकल बेंच ने 12091 अभ्यर्थियों के लिए फिर से विज्ञापन निकालकर उन्हें निर्धारित समय में नियुक्ति प्रदान करने का आदेश दिया। इससे कुछ समय के लिए इन अभ्यर्थियों में उल्लास तो आया लेकिन वह जल्दी समाप्त हो गया जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ही डबल बेंच नें फैसले पर यूटर्न लेकर ये कहते हुए एकल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया कि " बहुत लम्बे समय से यह प्रक्रिया चल रही है औऱ 13 वर्ष का बहुत लंबा समय बीत जाने के कारण नियुक्ति नहीं दी जा सकती है। यह निर्णय देकर एकल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया गया । इससे अभ्यर्थी घोर निराशा में चले गए क्योंकि उन्हें यह नहीं समझ में आ रहा था कि यह सरकार की अक्षमता थी, व्यवस्था की लापरवाही, न्यायपालिका की पराजय थी या उनका दुर्भाग्य । क्योंकि अभ्यर्थियों के अनुसार वह अपने हक की वाजिब लड़ाई लड़ रहे थे और कमियां व्यवस्थागत थीं, वे केवल स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। 

 हताश निराश अभ्यर्थी जब अपनी गुहार लेकर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचे तो सर्वोच्च न्यायालय ने भी डबल बेंच की ही बात को सामने रखते हुए 12091 की नियुक्ति की याचिका को खारिज कर दिया। इसी क्रम में 2025 में प्रशांत शुक्ला को नोडल अधिकारी नियुक्त करते हुए याचियों की सूची तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई, जो 2017 से पहले की सूची में भी शामिल थे औऱ वर्तमान अवमानना सूची में भी। इस क्रम में अभ्यर्थियों की वास्तविक संख्या का आंकलन करने के लिए 14851 याचियों की सूची सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर डाली गई।

वहीं फरवरी 2026 में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि 72825 पदों के मुकाबले कुल 66655 भरे जा चुके हैं और वर्तमान में केवल 4465 पद हैं, जो आरक्षित वर्ग के हैं। सरकार का यह भी कहना है कि 2017 के बाद से 126371 शिक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है।

यहाँ एक रोचक बात याचियों की तरफ से उठाई गई, क्योकि सरकार के पक्ष को मानें तो 54464 अभ्यर्थियों को नियुक्ति देने के बाद के 14640 रिक्त पद थे, इसी रिक्तियों के सापेक्ष 12091 अभ्यर्थियों को नियुक्ति देना था, लेकिन 12091 में से केवल 400 अभ्यथियों को नियुक्ति दी तो यहाँ तक कुल संख्या-54864 हुई। तो सरकार का आंकड़ा 64257 पर कैसे पहुँच गया?, यह प्रश्न कौतुहल पैदा करता है क्योंकि 54464 में 12091 को जोड़ दें तो यह संख्या 66655 पहुँचती है। प्रश्न तो उठेंगे ही।

मार्च 2026 में इस केस की विस्तृत पृष्ठभूमि को देखते हुए इसे पांच अलग-अलग श्रेणीयों में बांटा गया, ताकि इसकी श्रेणीवार समीक्षा की जा सके। इसी क्रम में मई 2026 की सुनवाई में कोर्ट ने 'याची लाभ' देने के लिए तीन शर्ते रखी जिसमें वे लोग जिन्होंने 2011 में फॉर्म भरा था, 2017 से पहले सुप्रीम कोर्ट में याची बने हैं, एवं दिसंबर 2025 तक अवमानना याचिकाओं का हिस्सा रहे हैं, शामिल होंगे। इस आधार पर योग्य विद्यार्थियों की संख्या लगभग 11000 के आसपास आ रही है। अभ्यर्थी लगातार न्यायालय के सामने गुहार लगा रहे हैं कि न्यायालय अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए योग्य याचियों को उनका अधिकार दे।

यहां उम्मीद की एक किरण बन रही थी कि शायद इस मामले पर निर्णायक सुनवाई हो जाएगी, लेकिन 26 मई 2026 को इस मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस करोल और जस्टिस प्रसन्न बी वराले की बेंच नें इसे दूसरी बेंच को ट्रांसफर कर दिया। स्पष्ट है कि अब नई बेंच मामले को नए सिरे से सुनेगी और न्याय की आस में वर्षों से बैठे हुए इन अभ्यार्थियों का इंतजार और बढ़ गया। अब सब कुछ सरकार के विवेक और उसकी संवेदनशीलता पर निर्भर है, क्योंकि दोष कहीं भी हो यह तो तय है कि न्याय की आस में बैठे यह हजारों अभ्यर्थी निरपराध है।

"12091 की सूची जिसमें इस भर्ती के लिए उचित औऱ इसके सभी मानको को पूरा करने वाले योग्य उम्मीदवार हैं औऱ जिसे ख़ुद अधिकारियों नें प्रमाणित किया है, वे लम्बे समय से इस नियुक्ति के लिए उम्मीद बांधे हुए संघर्ष कर रहे है। ये दुर्भाग्य है कि इनके संघर्ष को सत्ता औऱ व्यवस्था संवेदना औऱ न्याय की दृष्टि नहीं देख रही । ये सत्य की लड़ाई है अधिकार की लड़ाई है। जिस नौकरी को पाने के लिए हम आर्थिक,मानसिक हर तरह का संघर्ष कर रहे है वो हमारा अधिकार है वो हमें मिलना चाहिए।"-राम प्रसाद विश्वकर्मा, याचिकाकर्ता

"12091 सूची के अभ्यर्थी आज भी दर दर भटक रहे हैं इनको न्याय नहीं मिल पा रहा हैं। कंटेंप्ट ऑफ़ कोर्ट हुआ है लेकिन आज तक न्याय से वंचित है। आर्थिक शोषण,न्यायालय की लंबी प्रक्रिया और बेरोजगारी से लड़ते हुए कई साथी तो यह दुनिया ही छोड़ चुके है और कुछ साथी आज भी इसी उम्मीद में लड़ रहे हैं क्युकि उन्हें यह विश्वास है कि सत्य की सदा ही जीत होती है। बस इसी हौसले पर हम आगे बढ़ रहे हैं।"-हरिओम सिंह जादौन, मुख्य याची