हर धर्म, जाति और वर्ग के लोगों की आस्था से जुड़ी दरगाह खिदमत, इंसानियत और आपसी सौहार्द का दे रही संदेश
बिजनौर (उत्तर प्रदेश) : शहर की भागदौड़ और व्यस्तता के बीच जजी चौक के निकट एक ऐसी जगह भी है, जहां पहुंचते ही माहौल आस्था और सुकून में बदल जाता है। हज़रत बाबा कप्तान शहीदउद्दीन रहमतुल्लाह अलैह और हज़रत बाबा फरीदउद्दीन रहमतुल्लाह अलैह की दरगाह स्थानीय लोगों के साथ आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं की अकीदत का केंद्र बनी हुई है। ‘कप्तान साहब की मज़ार’ के नाम से प्रसिद्ध यह दरगाह केवल धार्मिक आस्था का स्थान नहीं, बल्कि कौमी एकता और साझा विश्वास की भी मिसाल मानी जाती है।
दरगाह पर लगे बोर्ड पर इसका पूरा नाम ‘दरगाह शरीफ हज़रत बाबा कप्तान शहीदउद्दीन व हज़रत बाबा फरीदउद्दीन रहमतुल्लाह अलैह’ अंकित है। स्थानीय स्तर पर बाबा और दरगाह से जुड़ी कई जनश्रुतियां भी प्रचलित हैं। ‘कप्तान साहब’ के नाम को लेकर भी लोगों के बीच मान्यता है कि यह संबोधन उनके प्रभाव, नेतृत्व और लोगों के लिए अगुआ या रक्षक जैसी भूमिका से जुड़ा रहा होगा। हालांकि इसके ऐतिहासिक आधार को लेकर कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए यह मान्यता मुख्य रूप से स्थानीय जनश्रुति के रूप में ही चली आ रही है।
दरगाह की विशेषता यहां आने वाले लोगों की विविधता है। धर्म, जाति और वर्ग की सीमाओं से अलग बड़ी संख्या में लोग अपनी मन्नत और दुआ लेकर यहां पहुंचते हैं। कोई परिवार की खुशहाली की कामना करता है तो कोई जीवन की परेशानियों से राहत की उम्मीद लेकर बाबा की चौखट पर हाजिरी लगाता है। श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई दुआ कबूल होती है। यही विश्वास लोगों को बार-बार इस दरगाह तक खींच लाता है।
सोमवार और जुमेरात को यहां विशेष चहल-पहल देखने को मिलती है। इन दिनों बिजनौर शहर के अलावा आसपास के क्षेत्रों से भी अकीदतमंद पहुंचते हैं। श्रद्धालु मज़ार पर चादर चढ़ाकर और दुआ मांगकर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। अलग-अलग धार्मिक और सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले लोगों की मौजूदगी इस दरगाह को आस्था के साथ सामाजिक समरसता का केंद्र भी बनाती है।
दरगाह की देखरेख और सेवा की भी एक व्यवस्थित परंपरा है। वर्तमान में गद्दीनशीन बाबा शाह गौहर दरगाह की व्यवस्था संभाल रहे हैं, जबकि खादिम बाबा गुलाब शाह मलंग भी सेवा में लगे रहते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा और दरगाह की धार्मिक परंपराओं के निर्वहन का ध्यान रखा जाता है।दरगाह पर लगा बोर्ड इसकी आध्यात्मिक विचारधारा को भी अभिव्यक्त करता है। इस पर ‘अल्लाह हो माफी, अल्लाह हो साफी, अल्लाह हो काफी’ का संदेश अंकित है, जो क्षमा, पवित्रता और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास की भावना को सामने रखता है। इसी के साथ दरगाह पर अंकित पंक्तियां इसकी सेवा और फकीरी की परंपरा का संदेश देती हैं—
अगर कुछ मरतबा चाहे तो खिदमत कर फकीरी की,
बला को टाल देती है दुआ रोशन जमीरों की।
इन पंक्तियों में खिदमत को प्रतिष्ठा से ऊपर रखने और निर्मल अंत:करण की दुआ को मनुष्य का संबल मानने का भाव निहित है। यही विचार दरगाह को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि निष्काम सेवा, इंसानियत और नैतिक आचरण से भी जोड़ता है।
दरगाह मौजा फरीदपुर खेमा, गीता नगरी, सिविल लाइन द्वितीय, मिलकियत राजपूत रागड़ान, बिजनौर क्षेत्र में स्थित है। जजी चौक के निकट होने के कारण शहर के विभिन्न हिस्सों से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। शहर के प्रमुख इलाके में मौजूद होने के बावजूद दरगाह का आध्यात्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को अलग तरह का सुकून देता है।
बिजनौर की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता में कप्तान साहब की दरगाह की अपनी विशिष्ट पहचान है। यहां उमड़ने वाली आस्था यह बताती है कि धार्मिक स्थल केवल इबादत तक सीमित नहीं होते। जब उनकी चौखट पर अलग-अलग समुदायों के लोग एक ही विश्वास और उम्मीद के साथ सिर झुकाते हैं तो वे समाज को जोड़ने वाली कड़ी भी बन जाते हैं। कप्तान साहब की दरगाह इसी साझा संस्कृति, खिदमत और कौमी एकता की परंपरा को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।
