- अरब सागर की धीमी हवाएं, हिंद महासागर में कमजोर मौसमीय गतिविधियां और अल नीनो की आहट बनी देरी की वजह
नई दिल्ली : देशभर में भीषण गर्मी और उमस के बीच दक्षिण-पश्चिम मानसून ने आखिरकार आज भारत में आधिकारिक दस्तक दे दी। इसके साथ ही लंबे इंतजार का अंत हो गया। मौसम विभाग को उम्मीद है कि अगले 24 घंटों के दौरान मानसून दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत के अन्य हिस्सों में भी आगे बढ़ेगा। हालांकि मानसून के आगमन के साथ एक सवाल भी चर्चा में है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिन्होंने इस बार मानसून की रफ्तार को थामे रखा और उसे तय समय पर भारत पहुंचने से रोक दिया।
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार मानसून की प्रगति कई मौसमीय कारणों से प्रभावित हुई। सबसे बड़ा कारण अरब सागर के ऊपर हवाओं की गति का सामान्य से कम रहना था। मानसून को आगे बढ़ाने में इन हवाओं की अहम भूमिका होती है। जब हवाएं कमजोर पड़ती हैं तो समुद्र से नमी लेकर आने वाले बादलों की रफ्तार भी धीमी हो जाती है। इसके अलावा हिंद महासागर के ऊपर पर्याप्त संख्या में कम दबाव वाले सिस्टम विकसित नहीं हो सके, जिससे मानसून को वह ताकत नहीं मिल पाई जिसकी उसे आगे बढ़ने के लिए जरूरत होती है।
दरअसल, मौसम विभाग ने मई के अंतिम सप्ताह में ही केरल में मानसून पहुंचने की संभावना जताई थी। उस समय अनुमान लगाया गया था कि मानसून 26 मई के आसपास भारत में प्रवेश कर सकता है। लेकिन बाद में मौसमीय परिस्थितियां बदल गईं और इसका आगमन टलता चला गया। अब जाकर मानसून ने केरल में प्रवेश किया है और आगे बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हुई है।
भारत में मानसून का सफर हजारों किलोमीटर लंबा होता है। इसकी शुरुआत हिंद महासागर और अरब सागर से होती है। इसके बाद मानसून केरल पहुंचता है और फिर देश के विभिन्न हिस्सों की ओर बढ़ता है। एक शाखा पश्चिमी तट से होते हुए महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर-पश्चिम भारत की ओर जाती है, जबकि दूसरी शाखा बंगाल की खाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों से होकर बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल और दिल्ली समेत उत्तर भारत के बड़े हिस्से तक पहुंचती है। सामान्य परिस्थितियों में एक जून के आसपास केरल में मानसून का आगमन हो जाता है और इसके बाद अगले कुछ सप्ताह में देश का अधिकांश भाग बारिश के दायरे में आ जाता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून वास्तव में हवा की दिशा में होने वाला एक विशाल मौसमी परिवर्तन है। इसकी पूरी प्रक्रिया जमीन और समुद्र के बीच तापमान तथा वायुदाब के अंतर पर आधारित होती है। गर्मियों के दौरान भारतीय भूभाग समुद्र की तुलना में अधिक तेजी से गर्म हो जाता है। इससे जमीन पर कम दबाव का क्षेत्र बनता है, जबकि समुद्र के ऊपर अपेक्षाकृत अधिक दबाव बना रहता है। हवा हमेशा उच्च दबाव वाले क्षेत्र से कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर बहती है। इसी कारण समुद्र से नमी से भरी हवाएं भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने लगती हैं। यही हवाएं बाद में घने बादलों का रूप लेकर व्यापक वर्षा कराती हैं।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार लक्षद्वीप और उसके आसपास के समुद्री क्षेत्र में बने स्थानीय मौसमीय प्रभावों ने भी मानसून की गति को प्रभावित किया। इसके कारण अरब सागर शाखा की हवाएं अपेक्षित ताकत हासिल नहीं कर सकीं और मानसून कुछ समय के लिए लगभग ठहर-सा गया। यही वजह रही कि केरल में इसके आधिकारिक आगमन में देरी दर्ज की गई।
मानसून के विकास में हिंद महासागर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। मौसम वैज्ञानिक इसे मानसून की ऊर्जा का प्रमुख स्रोत मानते हैं। इस क्षेत्र के गर्म समुद्री जल से लगातार बादल और कम दबाव वाले क्षेत्र बनते हैं, जो मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। लेकिन हाल के दिनों में हिंद महासागर और अरब सागर में मौसमीय हलचल सामान्य से कम रही। कम दबाव वाले सिस्टम पर्याप्त संख्या में नहीं बन सके, जिससे बारिश वाले बादलों का विकास भी प्रभावित हुआ। कई समुद्री क्षेत्रों में अपेक्षाकृत साफ मौसम बना रहा, जिसका असर मानसून की गति पर पड़ा।
इसके साथ ही वैज्ञानिक प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो जैसी परिस्थितियों पर भी नजर रखे हुए हैं। अल नीनो एक वैश्विक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम चक्रों पर पड़ता है। अल नीनो के दौरान हवाओं की दिशा और गति में बदलाव आ सकता है, जिससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ सकता है या उसकी प्रगति प्रभावित हो सकती है।
संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि अल नीनो की परिस्थितियां दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगाड़ सकती हैं। इसके कारण कुछ देशों में सामान्य से कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति बन सकती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। भारत में भी मौसम वैज्ञानिक इस पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि मानसून के आगे के व्यवहार का बेहतर अनुमान लगाया जा सके।
फिलहाल किसानों, जलाशयों और भीषण गर्मी से राहत की उम्मीद कर रहे करोड़ों लोगों के लिए अच्छी खबर यह है कि मानसून ने भारत में प्रवेश कर लिया है। अब इसकी आगे की रफ्तार और सक्रियता पर सबकी नजर रहेगी। यदि मौसमीय परिस्थितियां अनुकूल बनी रहीं तो आने वाले दिनों में देश के कई हिस्सों में बारिश की गतिविधियां तेज हो सकती हैं, जिससे गर्मी से राहत मिलने के साथ-साथ खरीफ फसलों की बुवाई को भी गति मिलेगी।
