- घरेलू गैस की वास्तविक लागत और बाजार कीमत के बीच बड़ा अंतर। उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों पर सरकार दे रही अतिरिक्त राहत
नई दिल्ली : देश में रसोई गैस को लेकर एक बड़ा आर्थिक दबाव उभरकर सामने आया है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण एलपीजी की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसका असर अब सीधे भारत के घरेलू गैस बाजार पर दिखाई देने लगा है। तेल कंपनियों का दावा है कि घरेलू गैस सिलेंडर बेचने पर उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है और यह घाटा लगातार तेजी से बढ़ रहा है।
इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड के वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार मई 2026 में घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर कंपनियों का नुकसान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। बताया गया है कि 14.2 किलो वाले घरेलू सिलेंडर की वास्तविक लागत करीब 1530 रुपये तक पहुंच चुकी है, जबकि आम उपभोक्ताओं को यह सिलेंडर लगभग 913 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। यानी एक सिलेंडर पर करीब 617 रुपये का सीधा घाटा तेल कंपनियों को झेलना पड़ रहा है।
स्थिति प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के मामले में और अधिक गंभीर बताई जा रही है। उज्ज्वला योजना के तहत लाभुकों को और कम कीमत पर सिलेंडर दिया जा रहा है, जिससे कंपनियों और सरकार पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया है। तेल कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात और आयात लागत बढ़ने के कारण यह दबाव लगातार गहराता जा रहा है।
जानकारी के अनुसार अप्रैल 2026 में प्रति सिलेंडर नुकसान करीब 171 रुपये था, लेकिन मई में यह बढ़कर 617 रुपये तक पहुंच गया। इससे पहले जनवरी से मार्च तिमाही के दौरान भी प्रति सिलेंडर लगभग 100 रुपये का घाटा दर्ज किया गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और सप्लाई संकट के कारण आने वाले दिनों में स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में घरेलू एलपीजी बिक्री पर कुल नुकसान का आंकड़ा 60 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। वहीं अप्रैल और मई 2026 के दौरान ही यह नुकसान 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहने का अनुमान जताया जा रहा है। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियां इस बढ़ते घाटे का सामना कर रही हैं। माना जा रहा है कि इसका कुछ हिस्सा केंद्र सरकार वहन कर सकती है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक देश माना जाता है। देश में होने वाली कुल गैस खपत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। वर्ष 2025 में देश में करीब 33 मिलियन टन से अधिक एलपीजी की खपत हुई थी, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत गैस आयात की गई थी। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत का करीब 90 प्रतिशत एलपीजी आयात मिडिल ईस्ट के देशों पर निर्भर है।
इधर अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव के कारण होर्मुज स्ट्रेट प्रभावित हुआ है। यह समुद्री मार्ग दुनिया में तेल और गैस सप्लाई का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। वहां आवाजाही बाधित होने से एलपीजी और कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई चेन पर गंभीर असर पड़ा है। इसी वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी देखी जा रही है।
तेल कंपनियों ने घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडरों के दाम में हाल ही में बढ़ोतरी भी की है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी कई शहरों में इजाफा दर्ज किया गया है। हालांकि सरकार फिलहाल घरेलू उपभोक्ताओं पर अचानक बड़ा बोझ डालने से बचने की कोशिश कर रही है।
इंडियन ऑयल ने स्थिति को देखते हुए अब मिडिल ईस्ट पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है। कंपनी दूसरे देशों से कच्चे तेल और एलपीजी की खरीद बढ़ाने पर काम कर रही है। साथ ही रिफाइनरियों के संचालन और सप्लाई सिस्टम में भी बदलाव किए जा रहे हैं, ताकि देश में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
