इक्कीस घंटे चली बातचीत का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया, जिससे दोनों देशों के बीच अविश्वास और गहरा गया है
एनके मिश्रा
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता का असफल होना सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते तनाव का संकेत है। लगभग इक्कीस घंटे चली इस बातचीत के बाद कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। वार्ता खत्म होते ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने साफ तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि तेहरान ने किसी भी शर्त को स्वीकार नहीं किया। वहीं ईरान ने भी पलटवार करते हुए अमेरिका पर गंभीर आरोप लगाए और उसकी मंशा पर सवाल खड़े किए।
ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बकाई ने कहा कि किसी भी वार्ता की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि दोनों पक्ष कितनी ईमानदारी और संतुलन के साथ आगे बढ़ते हैं। उनके मुताबिक, अमेरिका पहले से तय एजेंडे के साथ आया था और समझौते के लिए लचीलापन दिखाने को तैयार नहीं था। इस बयानबाजी ने साफ कर दिया कि दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई अब और गहरी हो चुकी है।
वार्ता की विफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण वे चार प्रमुख मुद्दे रहे, जिन पर सहमति बन पाना संभव नहीं हो सका। पहला और सबसे अहम मुद्दा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर था। अमेरिका चाहता था कि इस महत्वपूर्ण मार्ग पर निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो, जबकि ईरान इसे अपने प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा मानता है और इस पर नियंत्रण छोड़ने को तैयार नहीं है। यह टकराव सीधे तौर पर वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
दूसरा बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम को लेकर सामने आया। अमेरिका ने ईरान से करीब 400 किलोग्राम संवर्धित यूरेनियम को हटाने की शर्त रखी, ताकि परमाणु हथियार बनाने की आशंका कम की जा सके। हालांकि ईरान ने इसे अपने अधिकार का हिस्सा बताते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह अपने संवर्धन कार्यक्रम से पीछे नहीं हटेगा, भले ही वह परमाणु हथियार बनाने से इनकार करता रहा है।
तीसरा विवाद क्षेत्रीय राजनीति को लेकर था, जहां लेबनान में संघर्ष और संभावित युद्धविराम को लेकर मतभेद सामने आए। ईरान चाहता था कि इस मुद्दे को भी शांति समझौते का हिस्सा बनाया जाए, जबकि अमेरिका इस पर सहमत नहीं हुआ।
चौथा और सबसे संवेदनशील मुद्दा आर्थिक प्रतिबंधों का रहा। ईरान ने अमेरिका से सभी प्रतिबंध हटाने, युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई करने और विदेशों में फंसी उसकी संपत्ति को वापस करने की मांग रखी। अमेरिका के लिए इन शर्तों को स्वीकार करना आसान नहीं था, जिससे बातचीत और जटिल हो गई।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही संकेत दे चुके हैं कि समझौता हो या न हो, अमेरिका अपनी रणनीति के तहत आगे बढ़ता रहेगा। यह बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि वॉशिंगटन दबाव की नीति से पीछे हटने के मूड में नहीं है।
अब सवाल यह है कि आगे क्या होगा। वार्ता भले असफल रही हो, लेकिन कूटनीति के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। अमेरिका की ओर से एक अंतिम प्रस्ताव दिए जाने की बात सामने आई है, हालांकि उसके विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।
फिलहाल हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। अगर तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति पर पड़ सकता है। साथ ही, क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज होने की आशंका भी बनी हुई है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि केवल कठोर शर्तों के आधार पर शांति स्थापित करना संभव नहीं है। जब तक दोनों पक्ष आपसी विश्वास बहाल करने और व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक हर वार्ता इसी तरह अधूरी रह जाएगी। दुनिया अब उस मोड़ पर खड़ी है, जहां एक गलत कदम बड़े संकट को जन्म दे सकता है।
