अमेरिकी सैन्य नेतृत्व का दावा, हजारों ठिकानों पर हमले कर ईरान की रक्षा प्रणाली को लगभग निष्क्रिय कर दिया गया
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर अब अमेरिका की ओर से ऐसे दावे सामने आए हैं, जिन्होंने इस युद्ध की दिशा और परिणाम दोनों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि सीमित समय में ही उन्होंने ईरान की सैन्य क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है और उसके कई महत्वपूर्ण तंत्र अब प्रभावहीन हो चुके हैं।
अमेरिकी जनरल डैनियल केन ने जानकारी देते हुए कहा कि इस अभियान में अमेरिका को अपने क्षेत्रीय सहयोगियों का पूरा समर्थन मिला। सऊदी अरब, कतर और बहरीन जैसे देशों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा है कि इन देशों ने सुरक्षा और रक्षा के मोर्चे पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भविष्य में भी ऐसे सहयोग की उम्मीद बनी रहेगी।
सैन्य अभियान की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि अब तक हजारों लक्ष्यों को निशाना बनाया गया है, जिनमें स्थायी ठिकानों के साथ-साथ युद्ध के दौरान अचानक सामने आने वाले लक्ष्यों पर भी तुरंत कार्रवाई की गई। इस रणनीति ने ईरान की रक्षा तैयारियों को बुरी तरह प्रभावित किया। अमेरिकी पक्ष का दावा है कि इस अभियान के दौरान ईरान की वायु रक्षा प्रणाली का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया गया है। साथ ही मिसाइल भंडारण केंद्रों और ड्रोन ठिकानों को भी निशाना बनाकर उसकी आक्रामक क्षमता को काफी हद तक सीमित कर दिया गया है।
इसके अलावा कमांड और नियंत्रण तंत्र पर भी बड़े पैमाने पर हमले किए गए, जिससे ईरान की सैन्य समन्वय क्षमता कमजोर पड़ गई। लॉजिस्टिक नेटवर्क को भी नुकसान पहुंचाया गया, जिससे युद्ध के दौरान उसकी प्रतिक्रिया क्षमता प्रभावित हुई। समुद्री मोर्चे पर भी अमेरिका ने बड़ी सफलता का दावा किया है। बताया गया कि ईरान के नौसैनिक बेड़े का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय हो चुका है और कई युद्धपोत तथा अन्य जहाज नष्ट कर दिए गए हैं। इससे क्षेत्रीय समुद्री संतुलन पर भी असर पड़ा है।
इसी बीच अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने इस पूरे अभियान को निर्णायक बताते हुए कहा कि ईरान अब युद्ध की स्थिति में नहीं है और उसने संघर्ष विराम की दिशा में कदम बढ़ाया है। उन्होंने इसे एक ऐतिहासिक सैन्य सफलता करार दिया और कहा कि इतने कम समय में इतनी बड़ी उपलब्धि पहले कभी नहीं देखी गई। रक्षा मंत्री ने अमेरिकी नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि इस बार केवल रणनीति नहीं, बल्कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति भी देखने को मिली। उनके अनुसार, पिछले वर्षों में जिन मुद्दों को टाला जाता रहा, इस बार उन पर सीधे और सख्त कार्रवाई की गई है।
हालांकि इन दावों के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता भी बढ़ी है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे बयान और सैन्य कार्रवाइयां क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकती हैं। यदि हालात नियंत्रण से बाहर होते हैं, तो इसका असर केवल मध्य पूर्व ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह संघर्ष यहीं थमेगा या फिर आने वाले दिनों में कोई नया मोड़ लेकर और बड़े संकट का कारण बनेगा।