बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 : सत्तारूढ़ एनडीए ने झोंक दी अपनी पूरी शक्ति, विपक्ष अपने शक्ति प्रदर्शन से अलग, कई जगहों पर एनडीए का मुकाबला सीधे स्वतंत्र उम्मीदवारों से, पार्टी से नहीं

प्रभात कुमार

बिहार में संभवतः पहली बार विधान परिषद के चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी है। यह स्थिति सम्राट सरकार के बिहार में कमान संभालने के बाद बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मिली करारी हार के भय के कारण है अथवा इसका कारण एनडीए का शक्ति प्रदर्शन है, इस पर सियासी गलियारों में दो तरह की चर्चा है। पहली चर्चा कहती है कि बांकीपुर में पूरी कैबिनेट उतारने के बाद भी एनडीए हार गया, इसलिए डर से इस बार परिषद में पूरी सरकार उतार दी गई है। दूसरी चर्चा कहती है कि यह शक्ति प्रदर्शन है, सम्राट चौधरी दिखाना चाहते हैं कि परिषद की आठों सीटें जीतकर वह नीतीश मॉडल से बड़ा मॉडल हैं।

सच चाहे जो हो, लेकिन यह पहला ऐसा विधान परिषद चुनाव है, जिसमें आचार संहिता ताक पर है और सरकार मैदान में है। इस चुनाव में सबसे रोचक बात यह है कि विपक्ष अपने शक्ति प्रदर्शन से अलग है। विपक्षी दल के जो भी उम्मीदवार हैं, वह अपनी शक्ति और साधन से मैदान में मुकाबला कर रहे हैं। कई जगहों पर एनडीए का मुकाबला सीधे स्वतंत्र उम्मीदवारों से है, पार्टी से नहीं।

वैसे, स्नातक और शिक्षक क्षेत्र के लिए विधान परिषद सदस्य का यह चुनाव शिक्षित और बुद्धिजीवियों का होने के बावजूद धनबल के महासंग्राम के रूप में होने जा रहा है। यह टिप्पणी और चर्चा आम लोगों के बीच जमकर जारी है। यही कारण है कि इस चुनाव में चाहे उम्मीदवार किसी दल का हो अथवा स्वतंत्र उम्मीदवार हो, आमतौर पर सामान्य वर्ग से अपवाद के तौर पर ही नहीं, बल्कि धनाढ्य वर्ग से उम्मीदवार मैदान में है। गरीब शिक्षक चुनाव ही नहीं लड़ पा रहा। चर्चा है कि चुनाव में मतदान के लिए उम्मीदवारों ने शिक्षकों के बीच थैला बांटे हैं, जिसमें कपड़े, कलम और डायरी के साथ लिफाफे भी हैं। कोई बताता है कि धार्मिक पुस्तकों के बीच लिफाफे डालकर पैकेट बांटे गए हैं। यह कितना सत्य है और या गलत, यह दावा तो मैं नहीं कर सकता लेकिन चर्चा जोरों पर है। पटना, तिरहुत, सारण, मिथिला और कोसी हर जगह यही चर्चा है।

अगर सत्य है तो शिक्षक की कीमत चाहे कोई पार्टी हो या उम्मीदवार हो, लेकिन नैतिक रूप से इनकी कीमत 5000 से 7000 लगाई गई है तो यह उनकी गरिमा पर प्रश्न चिन्ह है। स्नातक मतदाताओं का मत भी इस प्रक्रिया से नहीं खरीदा जा रहा होगा, ऐसा सोच पाना संभव नहीं लगता। यह प्रक्रिया बिहार के आठ विधान परिषद सदस्यों के चुनाव में चल रही है। यह संभव है कि कहीं किसी क्षेत्र में कुछ कम और कहीं कुछ अधिक हो सकता है, फिर भी पटना, तिरहुत, सारण और कोसी के स्नातक और शिक्षक दोनों सीटों के लिए हो रहे चुनाव में इस खेल से इनकार नहीं किया जा सकता।

सबसे दिलचस्प चुनाव पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का हो रहा है। जहां जनता दल यूनाइटेड के तीन बार से विधान पार्षद रहे नीरज कुमार सिंह को लेकर जदयू में ही आर-पार की लड़ाई हो रही है। पार्टी के विधायक अनंत सिंह ने खुलकर मोर्चा ले लिया है। अनंत सिंह नीरज कुमार सिंह के खिलाफ जन सुराज पार्टी के उम्मीदवार अनुज कुमार सिंह के सारथी बने हैं। अनंत उनके पक्ष में न सिर्फ प्रचार बल्कि विधानसभा चुनाव की तरह पूरे क्षेत्र में रोड शो कर रहे हैं। मोकामा, बाढ़, बख्तियारपुर में अनंत का अपना जनाधार है, वह भूमिहार वोट को काट रहे हैं।

दूसरी तरफ जनता दल यूनाइटेड ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बनाया है। मुकाबले के लिए जदयू ने मैदान में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को भी अप्रत्यक्ष रूप से उतारा है। निशांत का प्रचार में जाना, कार्यकर्ताओं से मिलना - इसे नीतीश परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि निशांत को ही भविष्य का नेता बताया जा रहा है, इसलिए यह सीट जितनी जरूरी है।

पार्टी उम्मीदवार नीरज कुमार सिंह के खिलाफ मैदान में मुख्य रूप से दो उम्मीदवार हैं, जन सुराज के अनुज कुमार सिंह और महागठबंधन के दिलीप पटेल। अनुज को अनंत का बाहुबल और जन सुराज का युवा वोट, दिलीप पटेल को राजद-कांग्रेस का MY समीकरण मिलने की उम्मीद है।

यहां त्रिकोणीय नहीं, चतुष्कोणीय लड़ाई है और सबसे बड़ी बात यह कि पूरे अभियान को पार्टी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा और प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के साथ तमाम मंत्री, विधायक, विधान पार्षद संभाल रहे हैं। चुनाव में उम्मीदवारों को जिताने के लिए सरकार की पूरी शक्ति लगी है, वैसे इन तमाम शक्तियों के बावजूद पार्टी कार्यकर्ताओं का दमखम नहीं दिखता। कार्यकर्ता पूछ रहा है - जब हमारा विधायक ही उम्मीदवार के खिलाफ है तो हम किसके लिए वोट मांगें?

खास तौर पर इस चुनाव को लेकर जिस तरह से पार्टी में मतभेद खुलकर सामने आया है, पार्टी के केंद्रीय मंत्री ललन सिंह को चुनाव प्रचार तक से अलग रखा गया है। चर्चा है कि ललन सिंह नीरज कुमार सिंह के पक्ष में हैं और संजय झा उन्हें किनारे कर रहे हैं। इसलिए पटना स्नातक में संजय झा के साथ निशांत की प्रतिष्ठा दांव पर है, दूसरी तरफ तटस्थ चल रहे केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का भविष्य भी इसके परिणाम पर टिका है। अगर नीरज हारे तो संजय झा की रणनीति फेल, अगर जीते तो संजय झा जदयू के सबसे शक्तिशाली नेता।

दूसरा मोर्चा-पटना शिक्षक, प्रोफेसर का किला

पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में लड़ाई मुख्य रूप से भाजपा के प्रो. नवल किशोर यादव और राजद के डॉ. संजीव कुमार के बीच है। वैसे, जन सुराज की दिव्या ज्योति भी मैदान में हैं। नवल किशोर कई दशक से इस क्षेत्र से लगातार प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह शिक्षक नेता से भाजपा नेता बने हैं। उनका नेटवर्क मजबूत है, लेकिन इस बार नियोजित शिक्षकों की नाराजगी उनके खिलाफ है। राज्यकर्मी का दर्जा, ट्रांसफर-पोस्टिंग, वेतन विसंगति - शिक्षक सरकार से नाराज हैं। डॉ. संजीव कुमार राजद के शिक्षक प्रकोष्ठ के पुराने नेता हैं, उन्हें महागठबंधन के शिक्षकों का वोट मिलेगा।

तीसरा मोर्चा-तिरहुत, जहां जदयू चौथे पर था

तिरहुत स्नातक और शिक्षक में लड़ाई काफी रोचक है। फिलहाल एनडीए के लिए आसान नहीं दिख रहा। कोई एक साल पहले तिरहुत स्नातक उपचुनाव में जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी अभिषेक झा चौथे स्थान पर थे। यह एनडीए के लिए खतरे की घंटी थी। इसके पहले वर्तमान सीतामढ़ी के सांसद देवेश चंद्र ठाकुर लगातार यहां से जीतते रहे। अब फिर अभिषेक झा का मुकाबला निर्दलीय वर्तमान विधान पार्षद बंशीधर ब्रजवासी और राजद की प्रत्याशी रश्मि विनायक गौतम से है। यहां जन सुराज की उम्मीदवार डॉ. वी. मोहन हैं। फिलहाल त्रिकोणात्मक लड़ाई है। बंशीधर ब्रजवासी का अपना शिक्षक-स्नातक नेटवर्क है, वह निर्दलीय रहते हुए भी जीतते आए हैं। रश्मि गौतम को महिला और महागठबंधन का वोट मिलेगा। तिरहुत शिक्षक में वर्तमान विधान पार्षद डॉ. संजय कुमार सिंह की लड़ाई भूषण झा के साथ-साथ भाजपा के उम्मीदवार पूर्व विधान पार्षद नरेंद्र प्रसाद सिंह से भी है। जन सुराज से श्याम नंदन यादव और निर्दलीय बच्चा राय भी उम्मीदवार हैं। यहां एनडीए का वोट दो उम्मीदवारों में बंट रहा है - संजय कुमार सिंह जदयू से और नरेंद्र सिंह भाजपा से। इसका फायदा महागठबंधन या निर्दलीय को मिल सकता है।

चौथा मोर्चा-मिथिला, जहां कांग्रेस का किला

मिथिला स्नातक एवं शिक्षक में भी एनडीए को कांटे के संघर्ष से जूझना पड़ रहा है। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू के उम्मीदवार डॉ. घनश्याम राय लड़ाई को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वैसे, यहां से वर्तमान विधान पार्षद और कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. मदन मोहन झा और जन सुराज के उम्मीदवार सुरेश कुमार राय के बीच टक्कर है। मदन मोहन झा मिथिला में कांग्रेस का बड़ा चेहरा हैं, शिक्षकों में पकड़ है, पांच बार से जीत रहे हैं। उन्हें हराना आसान नहीं। स्नातक में भाजपा के उम्मीदवार सर्वेश कुमार और राजद की उम्मीदवार अनिल कुमार झा के बीच मुख्य लड़ाई है। यहां जन सुराज के उम्मीदवार और कांग्रेस ने रजनीकांत पाठक को मैदान में उतारा है। मिथिला में मैथिल वोट निर्णायक है।

पांचवां मोर्चा-सारण और कोसी, पिछड़ों की परीक्षा

सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए जन सुराज के अफाक अहमद और जदयू के पुष्कर आनंद के बीच लड़ाई है। वैसे यहां राजद के उम्मीदवार प्रो. जयराम यादव मैदान में हैं। सारण लालू का गढ़ रहा है, शिक्षकों में भी यादव वोट निर्णायक है। कोसी स्नातक में भाजपा के डॉ. एनके यादव और राजद के नितेश कुमार के बीच संघर्ष है। यहां जन सुराज के रजनीश रंजन भी मैदान में हैं। कोसी में बाढ़, गरीबी और शिक्षकों की बदहाली मुद्दा है।

इस चुनाव का एनडीए और जदयू पर क्या असर होगा? : इस चुनाव का असर सिर्फ आठ सीटों तक सीमित नहीं रहेगा, इसका असर बिहार की पूरी राजनीति पर पड़ेगा...

1. सम्राट सरकार की पहली बड़ी परीक्षा : सम्राट चौधरी ने बिहार में कमान संभाली है। बांकीपुर उपचुनाव में हार के बाद यह उनकी दूसरी परीक्षा है। अगर विधान परिषद में एनडीए 8 में से 5 से कम सीट लाती है तो यह माना जाएगा कि सम्राट मॉडल फेल है। भाजपा आलाकमान सवाल पूछेगा कि पूरी सरकार उतारने के बाद भी शिक्षक वोट क्यों नहीं मिला।

2. जदयू में टूट की पटकथा लिखी जाएगी : यह चुनाव जदयू के भविष्य का चुनाव है। पटना स्नातक में अगर नीरज हारे तो दो बातें होंगी - संजय झा की रणनीति फेल और ललन सिंह की वापसी। अनंत सिंह और मजबूत होंगे और जदयू में समानांतर सत्ता बन जाएगी। अगर नीरज जीते भी तो अनंत बनाम नीरज की लड़ाई विधानसभा तक जाएगी। 2025 में मोकामा से अनंत निर्दलीय लड़ सकते हैं। और अगर दो-तीन सीटों पर जदयू हारा तो मनीष वर्मा, आरसीपी सिंह जैसे किनारे किए गए नेता फिर से सक्रिय होंगे। कुर्मी समाज की नाराजगी खुलकर सामने आएगी।

3. धनबल बनाम जनबल का फैसला : अगर 5000-7000 की चर्चा सच है और इसके बावजूद शिक्षक-स्नातक वोटर एनडीए के खिलाफ वोट करता है तो यह बिहार में नई राजनीति की शुरुआत होगी। जन सुराज इसी मुद्दे पर लड़ रहा है - पैसा नहीं, व्यवस्था बदलो। अगर जन सुराज एक भी सीट निकालता है तो वह 2029 लोकसभा के लिए बड़ा संदेश होगा कि शिक्षित वोटर बिकाऊ नहीं है।

4. जातीय समीकरण का टूटना : इस चुनाव में सामान्य वर्ग के उम्मीदवार ही ज्यादा हैं। पिछड़ा, अतिपिछड़ा उम्मीदवार लगभग नहीं है। यह दिखाता है कि ज्ञान की सीट भी अब पैसे वालों की सीट बन गई है। इससे लोहिया-कर्पूरी के पिछड़ा वोटर में गुस्सा है। इसका असर विधानसभा में दिखेगा।

अंत में, बिहार विधान परिषद का यह चुनाव अब शिक्षक-स्नातक का नहीं रहा, यह सत्ता की प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया है। एनडीए ने पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन कार्यकर्ता का दमखम नहीं दिखता। पैसा बांटा जा रहा है, लेकिन भरोसा नहीं बंट रहा। बांकीपुर में जनता ने पैसे को हराया था, क्या परिषद में शिक्षक भी वही करेंगे?, अगर शिक्षक बिका तो लोकतंत्र हारा, अगर शिक्षक टिका तो लोकतंत्र जीता। यही इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल है और इसी सवाल पर जदयू और एनडीए का भविष्य टिका है।