तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके ओपीएस अब सत्ताधारी दल के साथ खड़े हैं, विश्लेषक इसे एमके स्टालिन की बड़ी राजनीतिक चाल बता रहे हैं
पंचायत वॉयस : तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा मोड़ सामने आया है। तीन बार राज्य की कमान संभाल चुके ओ. पन्नीरसेल्वम ने सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का साथ पकड़ लिया है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुआ यह फैसला राज्य की चुनावी तस्वीर बदल सकता है। इसे जहां ओपीएस की नई राजनीतिक शुरुआत माना जा रहा है, वहीं कई विश्लेषक इसे मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं।
ओपीएस लंबे समय तक दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता के भरोसेमंद सहयोगी रहे। उन्हें अम्मा के सबसे वफादार नेताओं में गिना जाता था। जब भी जयललिता को कानूनी या स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ना पड़ा, पन्नीरसेल्वम ने अंतरिम जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने हमेशा खुद को नेतृत्व का विकल्प नहीं, बल्कि संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया।
लेकिन 2016 में जयललिता के निधन के बाद हालात बदल गए। पार्टी के भीतर नेतृत्व संघर्ष शुरू हुआ। शुरुआत में उन्होंने वी.के. शशिकला का समर्थन किया, पर बाद में सार्वजनिक विरोध कर अलग राह पकड़ी। पार्टी के अंदरूनी समीकरण बदले और एडप्पादी के. पलानीस्वामी का कद बढ़ता गया। समय के साथ ओपीएस संगठन और सत्ता, दोनों से दूर होते चले गए।
राजनीतिक जमीन सिकुड़ने के बीच चुनावी मौसम ने उन्हें नई रणनीति अपनाने पर मजबूर किया। ऐसे समय में डीएमके से जुड़ना उनके लिए सम्मानजनक वापसी का रास्ता माना जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, अगर डीएमके फिर सत्ता में लौटती है तो पन्नीरसेल्वम को विधानसभा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। यह संवैधानिक रूप से अहम और गरिमापूर्ण पद है, जो उन्हें सक्रिय प्रशासनिक टकराव से दूर रखेगा।
ओपीएस की छवि शांत और संतुलित नेता की रही है। आक्रामक राजनीति से दूर रहकर उन्होंने हमेशा सॉफ्ट पावर की शैली अपनाई। ऐसे में स्पीकर का पद उनके स्वभाव के अनुकूल माना जा रहा है। तमिलनाडु की राजनीति अब नए समीकरणों की ओर बढ़ रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि ओपीएस की यह पारी उन्हें नई पहचान दिलाती है या केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा बनकर रह जाती है।