दीपक श्रीवास्तव✍️


पूजा, ध्यान और कुछ विशेष अवसरों पर इसे वर्जित भी माना गया है। सनातन परंपरा में चरण स्पर्श को सम्मान और संस्कार का प्रतीक माना गया है।


भारतीय संस्कृति में बड़ों के चरण स्पर्श की परंपरा सदियों पुरानी है। घर के बुजुर्ग हों, माता-पिता हों, गुरुजन हों या सम्माननीय व्यक्ति, उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेना हमारे संस्कारों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि शास्त्रों और धार्मिक परंपराओं में कुछ ऐसे अवसर भी बताए गए हैं, जब चरण स्पर्श करने से बचना चाहिए। केवल पैर छू लेना ही पर्याप्त नहीं माना गया है, बल्कि इसके पीछे भाव, परिस्थिति और विधि का भी विशेष महत्व बताया गया है।


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पूजा-पाठ, जप, ध्यान या किसी आध्यात्मिक साधना में लीन हो, तो उसके चरण स्पर्श नहीं करने चाहिए। माना जाता है कि उस समय उसका मन पूरी तरह ईश्वर की आराधना में केंद्रित होता है। ऐसे में चरण स्पर्श करने से उसकी साधना और एकाग्रता में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। इसी कारण मंदिर के गर्भगृह या देवस्थान के आसपास भी किसी व्यक्ति के पैर छूने से बचने की सलाह दी जाती है।


इसी तरह कुछ अन्य परिस्थितियां भी ऐसी मानी गई हैं, जहां चरण स्पर्श करना उचित नहीं माना जाता। धार्मिक परंपराओं के अनुसार लेटे हुए व्यक्ति के पैर नहीं छूने चाहिए। इसके पीछे तर्क यह माना जाता है कि सम्मान हमेशा जागरूक और सजग अवस्था में व्यक्त किया जाना चाहिए। वहीं अत्यधिक बीमार व्यक्ति के चरण स्पर्श से भी परहेज करने की बात कही गई है। इसके अलावा श्मशान से लौटे व्यक्ति के चरण स्पर्श करने से भी बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि ऐसे समय में कुछ विशेष धार्मिक नियमों और शुद्धता संबंधी परंपराओं का पालन किया जाता है।


चरण स्पर्श का महत्व केवल शारीरिक क्रिया तक सीमित नहीं है। धर्मग्रंथों और परंपराओं में इसके पीछे छिपे भाव को सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि यदि मन में सम्मान, श्रद्धा और विनम्रता का भाव नहीं है, तो केवल औपचारिक रूप से पैर छू लेने का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। इसलिए चरण स्पर्श करते समय व्यक्ति को अहंकार छोड़कर आदर और कृतज्ञता की भावना के साथ झुकना चाहिए।


परंपरा के अनुसार चरण स्पर्श करते समय दोनों हाथों से बड़ों के पैर छूने की विधि को श्रेष्ठ माना गया है। यह केवल सम्मान व्यक्त करने का तरीका नहीं, बल्कि स्वयं को विनम्र बनाने का अभ्यास भी माना जाता है। भारतीय संस्कृति में यह विश्वास लंबे समय से प्रचलित है कि बड़ों का आशीर्वाद जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सफलता और शुभ फल प्रदान करता है।


सनातन धर्म में चरण स्पर्श को संस्कारों की पहचान माना गया है। यह केवल सामाजिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच सम्मान और आदर के भाव को जीवित रखने वाली परंपरा भी है। मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति अपने माता-पिता, गुरुजनों और बुजुर्गों के प्रति श्रद्धा प्रकट करता है, तो उसे उनके अनुभव, शुभकामनाओं और आशीर्वाद का लाभ मिलता है।


धार्मिक ग्रंथों में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। रामायण के अनेक प्रसंगों में भगवान श्रीराम द्वारा माता-पिता और गुरुजनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का वर्णन किया गया है। इन प्रसंगों को भारतीय संस्कृति में आदर्श आचरण का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि आज भी चरण स्पर्श को केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि विनम्रता, सम्मान और पारिवारिक मूल्यों का जीवंत प्रतीक माना जाता है।


हालांकि परंपरा यह भी सिखाती है कि हर कार्य का एक उचित समय और तरीका होता है। इसलिए चरण स्पर्श करते समय केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक नियमों का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक माना गया है।