नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. बीएस झा ने दी चेतावनी। 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित नेत्र जांच कराने की सलाह


अरुण शाही


मुजफ्फरपुर : आंखें इंसान के शरीर का सबसे अनमोल अंग हैं। इनके बिना दुनिया की खूबसूरती, अपने लोगों के चेहरे और जीवन की सामान्य गतिविधियां सब कुछ अधूरा हो जाता है। चिंता की बात यह है कि आंखों की कुछ बीमारियां ऐसी होती हैं, जो बिना किसी शुरुआती संकेत के धीरे-धीरे रोशनी छीन लेती हैं। जब तक मरीज को बीमारी का अहसास होता है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। इसलिए समय पर जांच ही आंखों की रोशनी बचाने का सबसे प्रभावी उपाय है।

शहर के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. बीएस झा ने बताया कि आंखों की सबसे गंभीर बीमारियों में ग्लूकोमा यानी काला मोतिया, डायबिटिक रेटिनोपैथी, मैकुलर डिजनरेशन और रेटिनल डिटैचमेंट शामिल हैं। इनमें सबसे खतरनाक और घातक बीमारी ग्लूकोमा यानी काला मोतिया है। इसे साइलेंट थीफ ऑफ साइट यानी दृष्टि का छिपा चोर भी कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती चरण में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। इस बीमारी में आंख की ऑप्टिक नस धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होने लगती है। सबसे गंभीर बात यह है कि इस बीमारी के कारण जितनी दृष्टि चली जाती है, उसे किसी भी दवा, ऑपरेशन या अन्य इलाज से वापस नहीं लाया जा सकता। इसलिए समय रहते इसकी पहचान होना बेहद जरूरी है।

उन्होंने बताया कि डायबिटिक रेटिनोपैथी मधुमेह के मरीजों में होने वाली गंभीर बीमारी है। लंबे समय तक रक्त में शुगर का स्तर अधिक रहने से आंख की रेटिना की महीन रक्त वाहिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। यदि समय पर इसका उपचार नहीं कराया जाए तो यह स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती है। इसलिए मधुमेह से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से आंखों की जांच करानी चाहिए।

डॉ. झा ने बताया कि मैकुलर डिजनरेशन मुख्य रूप से बढ़ती उम्र के साथ होने वाली बीमारी है। इसमें आंख के उस हिस्से पर असर पड़ता है, जो साफ और सीधा देखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार होता है। इसके कारण व्यक्ति की केंद्रीय दृष्टि धीरे-धीरे कम होने लगती है। पढ़ने, लिखने, मोबाइल देखने और किसी व्यक्ति का चेहरा पहचानने में कठिनाई होने लगती है।

उन्होंने कहा कि रेटिनल डिटैचमेंट आंखों की आपातकालीन स्थिति है। इस बीमारी में आंख का पर्दा यानी रेटिना अपनी सामान्य जगह से अलग हो जाता है। यदि तत्काल उपचार नहीं कराया जाए तो आंख की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है। ऐसे में आंखों के सामने अचानक चमक दिखना, काले धब्बे दिखाई देना या पर्दा गिरने जैसा महसूस होना जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए।

डॉ. बीएस झा ने कहा कि 40 वर्ष की आयु के बाद प्रत्येक व्यक्ति को नियमित रूप से आंखों की व्यापक जांच करानी चाहिए, भले ही उसे किसी प्रकार की परेशानी महसूस न हो रही हो। समय रहते बीमारी का पता चल जाए तो समुचित और समय पर इलाज के माध्यम से आंखों की गंभीर बीमारियों से बचाव किया जा सकता है तथा दृष्टि को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि आंखों से जुड़ी किसी भी समस्या को हल्के में न लें और नियमित नेत्र परीक्षण को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।