प्रसूता की चीख से खुली साजिश, जांच में डॉक्टर दंपति पर गंभीर आरोप, सिस्टम पर उठे बड़े सवाल
बिहार : पूर्वी चंपारण के रक्सौल अनुमंडल अस्पताल से जुड़ा एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी की विस्तृत जांच में अस्पताल के भीतर चल रहे कथित ‘रेफरल सिंडिकेट’ का खुलासा हुआ है, जहां गरीब मरीजों की मजबूरी को मुनाफे के साधन में बदला जा रहा था। जांच के बाद अस्पताल की उपाधीक्षक डॉ. स्वाति सपन और उनके पति डॉ. विजय कुमार को गंभीर अनियमितताओं का दोषी मानते हुए उनके खिलाफ ‘प्रपत्र क’ के तहत विभागीय आरोप पत्र गठित करने और तत्काल रक्सौल से हटाने का आदेश दिया गया है।
इस पूरे मामले की शुरुआत 2 जनवरी 2026 की एक घटना से हुई, जिसने पूरे सिस्टम की पोल खोल दी। सहदेवा निवासी जगरूप साह की बेटी कविता कुमारी प्रसव पीड़ा में सरकारी अस्पताल पहुंची थी। आरोप है कि वहां इलाज देने के बजाय आशा कार्यकर्ता और अस्पताल से जुड़े लोगों ने परिजनों को डरा-धमकाकर उपाधीक्षक के निजी नर्सिंग होम भेज दिया। वहां ऑपरेशन के नाम पर 37,000 रुपये की मांग की गई। जब गरीब परिवार ने असमर्थता जताई, तो उन्हें वहां से भगा दिया गया। बाद में उसी महिला का दूसरे अस्पताल में सामान्य प्रसव हुआ, जिससे पूरे मामले की गंभीरता उजागर हो गई।
जिलाधिकारी के निर्देश पर गठित उच्चस्तरीय जांच टीमों ने जब अस्पताल की कार्यप्रणाली की जांच की, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। रिपोर्ट के अनुसार, मरीजों को योजनाबद्ध तरीके से निजी अस्पतालों की ओर भेजा जा रहा था। ‘भव्या पोर्टल’ पर डेटा दर्ज करने के बजाय मैनुअल रजिस्टर का उपयोग किया जा रहा था, ताकि इस पूरे नेटवर्क को छिपाया जा सके। जांच में बायोमेट्रिक फर्जीवाड़े की भी पुष्टि हुई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सिस्टम के साथ संगठित छेड़छाड़ की जा रही थी।
अस्पताल में दवाओं की उपलब्धता होने के बावजूद मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा था। यह सीधे तौर पर दवाओं की कालाबाजारी की ओर इशारा करता है। वहीं एक्स-रे विभाग से जुड़े मामले में भी गंभीर आरोप सही पाए गए, जिसमें महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और आपत्तिजनक गतिविधियों की पुष्टि हुई है।
जांच के दौरान एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया, जब प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. राजीव रंजन कुमार ने खुद को जांच से अलग करने की मांग करते हुए कहा कि उन्हें जान-माल का खतरा है। इससे इस पूरे नेटवर्क की गहराई और प्रभाव का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं शिकायतकर्ता द्वारा अचानक आवेदन वापस लेने को भी जांच प्राधिकरण ने संदिग्ध माना और इसे दबाव से जोड़कर देखा।
जिला लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी ने अपने फैसले में इस पूरे प्रकरण को मानवता के खिलाफ अपराध करार दिया और स्पष्ट कहा कि गरीब मरीजों के अधिकारों के साथ इस तरह का खिलवाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सिविल सर्जन को 30 दिनों के भीतर अस्पताल की व्यवस्था सुधारने और दोषियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
यह मामला सिर्फ एक अस्पताल का नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए चेतावनी है। जब सरकारी अस्पताल, जो गरीबों की आखिरी उम्मीद होते हैं, वहीं उनके साथ सौदेबाजी होने लगे, तो यह व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर संकेत है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि प्रशासन इस मामले में कितनी तेजी और सख्ती से कार्रवाई करता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो सके।