• आमगोला स्थित शुभानंदी में पुण्यात्मा प्रतिभा सिन्हा की स्मृति में हुआ विशेष आयोजन। साहित्यकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने मां के महत्व पर रखे अपने विचार


मुजफ्फरपुर : आमगोला स्थित शुभानंदी में पुण्यात्मा प्रतिभा सिन्हा की स्मृति में नमन-वंदन के अंतर्गत श्रद्धा-संवाद एवं काव्यांजलि का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और बुद्धिजीवियों ने मां के स्वरूप, उसकी ममता और जीवन में उसकी भूमिका पर अपने विचार व्यक्त किए।


अध्यक्षीय उद्गार व्यक्त करते हुए डॉ पूनम सिन्हा ने कहा कि मां की शक्ति और संस्कृति संतान के संस्कारों में दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि संजय पंकज की अनुपम काव्यकृति ‘मां है शब्दातीत’ मां के विराट स्वरूप को प्रभावी ढंग से उजागर करती है।

चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद मुख्य अतिथि डॉ रामप्रवेश सिंह ने कहा कि मां की ममता अतुलनीय होती है। मां कभी मरती नहीं, बल्कि अपनी संतानों में निरंतर विस्तार पाती रहती है। करुणा, ममता, दया और क्षमा जैसे मानवीय गुणों से मां संतान के जीवन को समृद्ध बनाती है। उन्होंने कहा कि कवि संजय पंकज की माता प्रतिभा सिन्हा एक विदुषी महिला थीं और उनकी साहित्यिक प्रतिभा की विरासत पंकज को मिली है। मां पर उनका लेखन अत्यंत व्यापक और संवेदनशील है।

बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग की अध्यक्ष डॉ अनिता सिंह ने कहा कि मां अनुभव, अनुभूति और ज्ञान का अनमोल भंडार होती है। वहीं प्राचार्य डॉ अमिता शर्मा ने कहा कि मां भले ही देह रूप में हमारे बीच न हो, लेकिन उसके स्नेह और भावनाओं की उपस्थिति हमेशा बनी रहती है।


अपने भावोद्गार व्यक्त करते हुए संजय पंकज ने कहा कि हमारी सांसों, धड़कनों और दृष्टि में मां ही बसती है। साहित्यिक संस्कार उन्हें अपनी मां से ही मिले हैं। उन्होंने कहा कि धैर्य, साहस, विश्वास और दृढ़ संकल्प के रूप में मां निरंतर अपनी संतानों में विस्तृत होती रहती है। जब हम संवेदनाओं और स्मृतियों को सहेजकर रचनात्मक सृजन करते हैं, तो उसके पीछे मां की ही शक्ति होती है। मां की कोई निश्चित परिभाषा या व्याख्या संभव नहीं है। वास्तव में मां शब्दातीत होती है।


डॉ रामेश्वर द्विवेदी ने कहा कि मां की सकारात्मक उपस्थिति हमारे प्रत्येक अच्छे कर्म में दिखाई देती है। सेंट्रल बैंक के अवकाशप्राप्त राजभाषा अधिकारी विमल कुमार परिमल ने कहा कि मां का महत्व तब समझ में आता है जब वह हमारे बीच नहीं रहती। डॉ रणवीर राजन ने कहा कि मां ही सृजन करती है और जीवन को संवारती है। डॉ वंदना विजय लक्ष्मी ने मां को ईश्वर का स्वरूप बताया, जबकि डॉ देवव्रत अकेला ने कहा कि हमारे जीवन की हर अच्छी बात मां की ही देन होती है।


इस अवसर पर एच.एल. गुप्ता, डॉ अशोक शर्मा, अर्चना सिंह, डॉ कामाख्या नारायण सिंह, डॉ केशव किशोर कनक, प्रभात कुमार, अनिल कुमार मिश्रा, अमर कुमार, प्रणव चौधरी, ब्रजभूषण शर्मा, चैतन्य चेतन, अनुराग आनंद, विभु कुमारी, डॉ राजीव कुमार, डॉ मीनू नारायण, आग्नेय, पूर्व उपमहापौर विवेक कुमार, अविनाश तिरंगा, प्रेमभूषण और सुगंध सहित अनेक लोगों ने अपने विचार व्यक्त किए।


श्रद्धा-संवाद के बाद आयोजित काव्यांजलि में कवियों और साहित्यकारों ने मां को समर्पित रचनाओं का पाठ किया। कुमार राहुल ने अपने गीत “यादें कड़वी, खट्टी-मीठी, सुलग रही सी एक अंगीठी...” के माध्यम से जीवन के यथार्थ को अभिव्यक्त किया। डॉ राकेश कुमार मिश्र ने “मां के चरणों में सारी सृष्टि है, रीति है और मेरी प्रीति है” सुनाकर श्रोताओं को भावुक कर दिया। प्रवीण कुमार मिश्र ने “मेरा जीवन मधुर हुआ, तुम आए पावस रीत में” का पाठ कर वातावरण को संवेदनशील बना दिया।


पंकज कर्ण ने “किसे खबर कि यहां किसकी कब तलक मां है, है खुशनसीब बहुत जिनकी आज तक मां है” सुनाकर खूब सराहना बटोरी। डॉ भावना ने “कुछ दिन का एकांत हुआ है सहना मुश्किल, मां की पीर घनी थी कितनी कहना मुश्किल” प्रस्तुत किया। गोपाल फलक ने “ख्यालों के दीप जगमगाते रहे, तुम न आए मगर याद आते रहे” के माध्यम से स्मृतियों को स्वर दिया।


रंजीत पटेल ने “तू नहीं मां, तेरी सूरत जीवित है”, श्यामल श्रीवास्तव ने “मां अपनी उम्र से लड़ रही है और मैं बेबस हूं”, सविता राज ने “मां प्यारी है, सुंदर भी है, रिश्तों का एक सागर भी है”, सुप्रिया सोनी ने “मंजिलें तुमसे ही हैं, तुमसे ही है सफर अपना” और हेमा सिंह ने “मैं रोई तो मां भी मेरे दर्द से रोई थी” सुनाकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।


लोकनाथ मिश्र ने “जिंदगी की उलझन में या अपनी काबिलियत में, कुछ ऐसा उलझा रहता हूं, सिर्फ एक औपचारिकता का निर्वहन करता जाता हूं, मां-मां कह देता हूं” प्रस्तुत किया। डॉ मनोज कुमार ने “विचारों का नंगापन उभरने लगता है...” और डॉ रामेश्वर द्विवेदी ने “अचानक पसरा था पतझड़...” के माध्यम से मां के वियोग की वेदना को अभिव्यक्त किया।


संजय पंकज ने अपने दोहे “दुनिया भागमभाग है, दुनिया एक तनाव, दुनिया में ही मां मिली, दुनिया भर की छांव” सुनाकर खूब प्रशंसा पाई। डॉ पुष्पा गुप्ता ने “मां तेरे आंचल में मेरा रचा-बसा संसार है” प्रस्तुत कर आयोजन को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की।


गीत, गजल, दोहे और कविताओं की भावधारा में मां का स्वरूप पूरे आयोजन के दौरान जीवंत बना रहा। कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन डॉ रणवीर राजन ने किया।

आभार व्यक्त करते हुए संजय पंकज ने भावुक स्वर में कहा कि जहां निष्कलुष संबंध, निश्छल प्रेम, पवित्र भाव, निस्वार्थ त्याग और नैसर्गिक उदात्तता है, वहीं मां है।


 उन्होंने कहा कि मां के स्मरण और वंदन में उपस्थित होकर सभी लोगों ने जो सम्मान और स्नेह दिया है, वह उनके लिए सौभाग्य और रचनात्मक संबल है। उन्होंने सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि मां की यही सार्वभौमिक उपस्थिति उसे शब्दों से परे और अनंत बनाती है।