परिसीमन के बाद कई क्षेत्रों में वोट प्रतिशत और असर बदल गया है
एनके मिश्रा
असम विधानसभा चुनाव सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि बदले हुए चुनावी नक्शे की पहली बड़ी परीक्षा बन गया है। 2023 में हुए परिसीमन ने राज्य के कई अहम निर्वाचन क्षेत्रों की सामाजिक बनावट और राजनीतिक संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। ऐसे में 9 अप्रैल को होने वाला मतदान और 4 मई को आने वाले नतीजे इस बात का फैसला करेंगे कि नई सीमाओं के बीच किसकी रणनीति भारी पड़ती है और कौन पुराने समीकरणों के टूटने का फायदा उठाता है।
नगांव जिले का बटाद्रबा क्षेत्र इस बदलाव का सबसे प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यह वही इलाका है जो 15वीं सदी के महान नव-वैष्णव संत श्रीमंत शंकरदेव की जन्मस्थली के रूप में जाना जाता है। इस सीट का राजनीतिक इतिहास भी दिलचस्प रहा है। 1978 में जब यह सीट अस्तित्व में आई थी, तब यहां मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत थी, लेकिन समय के साथ यह बढ़कर 2021 तक 50 प्रतिशत से अधिक हो गई। 2016 में इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने अप्रत्याशित जीत दर्ज की थी, जिसका मुख्य कारण मुस्लिम वोटों का बिखराव माना गया। इससे पहले यहां कांग्रेस, AGP और एक बार रिवोल्यूशनरी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के अलावा किसी अन्य दल को सफलता नहीं मिली थी।
परिसीमन ने इस पूरे समीकरण को पलट दिया। बटाद्रबा को नगांव के कुछ हिस्सों के साथ जोड़कर ‘नगांव-बटाद्रबा’ नाम का नया क्षेत्र बना दिया गया। इसके तहत मुस्लिम बहुल इलाकों को ढिंग, समगुरी और रूपाहीहाट जैसे क्षेत्रों के साथ जोड़ दिया गया, जहां पहले से ही मुस्लिम आबादी अधिक थी। इसके परिणामस्वरूप नए नगांव-बटाद्रबा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी घटकर करीब 40 प्रतिशत रह गई। इस बदलाव का असर पूरे नगांव जिले पर पड़ा। 2011 की जनगणना के अनुसार जहां जिले की लगभग 55 प्रतिशत आबादी मुस्लिम थी, वहीं परिसीमन के बाद ऐसे क्षेत्रों की संख्या, जहां इस समुदाय का निर्णायक प्रभाव था, पांच से घटकर तीन रह गई।
निचले असम के बारपेटा में भी कुछ इसी तरह का बदलाव देखने को मिला। यह क्षेत्र असमिया वैष्णव परंपरा का एक प्रमुख केंद्र है, जहां बारपेटा सत्र स्थित है, जिसकी स्थापना श्रीमंत शंकरदेव के प्रमुख शिष्य माधवदेव ने की थी। परिसीमन से पहले यहां करीब 57 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता थे, लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों को मांडिया और चेंगा में शामिल कर दिए जाने के बाद नए बारपेटा क्षेत्र में उनकी हिस्सेदारी घटकर लगभग 20 प्रतिशत रह गई।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह सीट काफी अहम रही है। पिछले 10 चुनावों में सात बार यहां मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जिनमें 2021 में कांग्रेस के अब्दुर रहीम अहमद की जीत भी शामिल है। लेकिन इस बार स्थिति बदली हुई है, जहां AGP और कांग्रेस दोनों ने हिंदू उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
परिसीमन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। बटाद्रबा क्षेत्र के धार्मिक पदाधिकारी रंजीत महंत का कहना है कि परिसीमन के साथ मंदिर से जुड़ी जमीनों को अतिक्रमण से मुक्त कराना भी एक अहम कदम रहा है। 2016 में भाजपा सरकार बनने के बाद 300 से अधिक परिवारों को हटाया गया था, जिन्हें बांग्लादेशी मूल का बताया गया। वहीं राज्य सरकार ने बटाद्रबा थान के विकास के लिए 200 करोड़ रुपये की राशि भी स्वीकृत की है।
दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार दुर्लभ चामुआ का आरोप है कि नगांव-बटाद्रबा क्षेत्र का गठन भाजपा के पक्ष में वोट संतुलन बनाने के लिए किया गया। वहीं बारपेटा से NDA उम्मीदवार दीपक कुमार दास का कहना है कि परिसीमन से असमिया सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
कामरूप जिले में भी परिसीमन के बाद बड़ा बदलाव देखने को मिला है। बोको और चायगांव जैसी सीटों को मिलाकर एक नई सीट ‘बोको-चायगांव’ बनाई गई है, जिसे अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इससे पहली बार स्थानीय राभा, गारो और बोडो समुदाय को राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना बनी है। इन क्षेत्रों के मुस्लिम बहुल हिस्सों को मिलाकर ‘चमारिया’ नाम से एक नया क्षेत्र बनाया गया है, जिसके कारण कामरूप जिले में मुस्लिम प्रभाव वाले क्षेत्रों की संख्या दो से घटकर एक रह गई है।
इसके अलावा ‘गोलपारा (पश्चिम)’ सीट को अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित कर दिया गया है, जहां अब तक कोई हिंदू विधायक नहीं चुना गया था। वहीं लखीमपुर जिले की ‘नाओबोइचा’ सीट को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया गया है। इस सीट का इतिहास भी खास रहा है।
