बिहार में नई सरकार और नया समीकरण, मीडिया की नजर हर बयान और हर कदम पर टिकी
प्रभात कुमार
बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव सामने आया है, जहां सत्ता का चेहरा बदलते ही सियासी हलचल तेज हो गई है। भाजपा नेता सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिलने के साथ ही राज्य में नए राजनीतिक समीकरणों की चर्चा शुरू हो गई है। लंबे समय तक सत्ता में रहे नीतीश कुमार अब मुख्यमंत्री पद पर नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक भूमिका अभी खत्म नहीं मानी जा रही है। उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती अपनी पार्टी जनता दल यूनाइटेड को एकजुट बनाए रखने की है।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच मीडिया की भूमिका भी केंद्र में आ गई है। सत्ता परिवर्तन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से लेकर JDU तक, हर पक्ष को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। वहीं, पार्टी के भीतर के बड़े चेहरे जैसे ललन सिंह और संजय झा भी इस तेज होते नैरेटिव में चर्चा से पूरी तरह बाहर नहीं रह पाए हैं। हर बयान और हर गतिविधि को नए सिरे से परखा जा रहा है।
सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने को भाजपा की एक स्पष्ट सामाजिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इसे लव-कुश यानी कुर्मी और कोइरी समाज के समीकरण को साधने की कोशिश माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम न केवल पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने की दिशा में है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि पार्टी सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दे रही है। इससे उस धारणा को भी चुनौती मिली है कि नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह समीकरण कमजोर पड़ सकता था।
दूसरी ओर, नीतीश कुमार के सामने अब संगठन को संभालने की सबसे कठिन जिम्मेदारी है। भले ही वे मुख्यमंत्री नहीं हैं, लेकिन उनकी राजनीतिक पकड़ और अनुभव को देखते हुए पार्टी के भीतर उन्हें अभी भी केंद्रीय भूमिका में माना जा रहा है। JDU में किसी भी तरह की टूट सीधे उनके लंबे राजनीतिक करियर पर असर डाल सकती है, इसलिए वे लगातार पार्टी के नेताओं और विधायकों को साथ बनाए रखने की कोशिश में जुटे हैं।
इसी बीच JDU के अंदर संभावित असंतोष और खींचतान को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। कभी निशांत कुमार को लेकर अटकलें तेज होती हैं तो कभी उन्हें सरकार में शामिल किए जाने की बातें उठती हैं। इसी तरह विजेंद्र यादव को डिप्टी सीएम बनाए जाने के फैसले के बाद कुर्मी समीकरण को लेकर नई बहस छिड़ी, जिसमें श्रवण कुमार की कथित नाराजगी जैसे मुद्दों को भी हवा दी गई। इन तमाम चर्चाओं ने पार्टी के अंदरूनी माहौल को लेकर जिज्ञासा और बढ़ा दी है।
अब आने वाले समय में बिहार की राजनीति का केंद्र सिर्फ सरकार चलाना नहीं होगा, बल्कि संगठन को मजबूत बनाए रखना और सामाजिक समीकरणों को संतुलित करना भी उतना ही अहम रहेगा। मुख्यमंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी के सामने जहां प्रशासनिक चुनौतियां होंगी, वहीं नीतीश कुमार के लिए यह दौर अपनी पार्टी को टूटने से बचाने और अपने राजनीतिक कद को बनाए रखने की असली परीक्षा साबित हो सकता है।
