स्वेच्छा से त्यागपत्र देने वाले दोनों, परिस्थितियां अलग रहीं, ज्योति बसु ने स्वास्थ्य कारणों से पद छोड़ा, नीतीश कुमार के फैसले के पीछे राजनीतिक बदलाव दिखा
प्रभात कुमार
भारतीय राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दूसरे ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने स्वेच्छा से अपने पद का त्याग किया है। उनसे पहले यह उदाहरण पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने पेश किया था, लेकिन ज्योति बसु का इस्तीफा स्वास्थ्य कारणों से हुआ था। वे निमोनिया से पीड़ित थे और राज्य में विधानसभा चुनाव निकट था। उस समय उनकी उम्र लगभग 86 वर्ष थी। उनके बाद पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ही नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य अगले मुख्यमंत्री बने। उस समय पश्चिम बंगाल में वाम दलों की संयुक्त सरकार थी।
बिहार की स्थिति पश्चिम बंगाल से भिन्न है और नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देने की परिस्थितियां अलग रही हैं। बिहार में नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद जनता दल यूनाइटेड से मुख्यमंत्री की कुर्सी भारतीय जनता पार्टी को मिली। राज्य में एक दल से दूसरे दल में सत्ता का हस्तांतरण हुआ। बिहार में विधानसभा चुनाव नवंबर 2025 में नीतीश कुमार के चेहरे पर लड़ा गया और नारा दिया गया था, 25 से 30 फिर से नीतीश। ऐसे में चुनाव के केवल पांच महीने बाद ही सत्ता का हस्तांतरण हो गया। यह सही है कि बिहार में भी गठबंधन की सरकार थी, लेकिन सत्ता का हस्तांतरण ऐसे दल को हुआ, जिसकी नीतियां और सिद्धांत अलग रहे हैं।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि नीतीश कुमार के त्यागपत्र का कारण स्वास्थ्य नहीं था, हालांकि उनके स्वास्थ्य को लेकर चर्चा जरूर होती रही है। उनके इस्तीफे का कारण राज्यसभा जाने की इच्छा को बताया गया। एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जब नीतीश कुमार ने पद छोड़ा, तब उनकी उम्र ज्योति बसु से लगभग 10 वर्ष कम थी। उनकी आयु लगभग 76 वर्ष रही।
ये कुछ प्रमुख अंतर हैं पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच। यदि दोनों नेताओं की तुलनात्मक चर्चा करें तो यह भी स्पष्ट होता है कि पश्चिम बंगाल और बिहार विकास के दृष्टिकोण से अलग रहे हैं। पश्चिम बंगाल ऐतिहासिक रूप से बिहार से अधिक विकसित रहा है। ज्योति बसु ने अपने शासनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर ध्यान दिया। वहीं नीतीश कुमार ने अपेक्षाकृत कम समय में बिहार के समग्र विकास के लिए काम किया। बिहार के गांव कई मामलों में पश्चिम बंगाल के गांवों से आगे दिखाई देते हैं। हालांकि ऐतिहासिक कारणों से दोनों राज्यों की तुलना पूरी तरह समान आधार पर नहीं की जा सकती, क्योंकि कोलकाता कभी देश की राजधानी रहा है।
आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो बिहार कई क्षेत्रों में आगे बढ़ता दिखाई देता है। सड़क, बिजली, पानी और रोजगार जैसे मुद्दों पर बिहार ने उल्लेखनीय प्रगति की है। महिलाओं के सशक्तिकरण के मामले में भी बिहार ने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वहीं पश्चिम बंगाल निवेश, उद्योग और खनिज संसाधनों के मामले में पहले से ही मजबूत रहा है।
ज्योति बसु और उनकी पार्टी को पश्चिम बंगाल में लंबे समय तक बहुमत और स्थिर शासन का लाभ मिला, जिससे विकास के लिए बेहतर अवसर मिले। इसके विपरीत बिहार में गठबंधन सरकारों के कारण कई बार राजनीतिक अस्थिरता देखी गई। जनता दल यूनाइटेड, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों के साथ अलग-अलग समय में सरकार बनने से नीति निरंतरता एक चुनौती रही।
एक और महत्वपूर्ण अंतर यह है कि ज्योति बसु की सरकार पर उनके पुत्र को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, जबकि नीतीश कुमार व्यक्तिगत रूप से ऐसे आरोपों से काफी हद तक दूर रहे।
भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार उन मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं, जिन्होंने लंबे समय तक पद संभाला। देश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग के नाम है, जिन्होंने 12 दिसंबर 1994 से 27 मई 2019 तक लगभग 24 वर्ष 5 महीने तक शासन किया। उनके बाद ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का स्थान आता है, जिन्होंने 5 मार्च 2000 से 5 जून 2024 तक करीब 24 वर्ष 3 महीने तक शासन किया।
इसके बाद ज्योति बसु का नाम आता है, जिन्होंने 21 जून 1977 से 12 जनवरी 2000 तक पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। त्रिपुरा के माणिक सरकार ने 11 मार्च 1998 से 9 मार्च 2018 तक मुख्यमंत्री पद संभाला। इसके बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का स्थान है, जिन्होंने 27 नवंबर 2005 से 14 अप्रैल 2026 तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया, हालांकि वे 14 मई 2014 से 14 फरवरी 2015 तक इस पद पर नहीं थे।
पवन कुमार चामलिंग ने अपने लंबे कार्यकाल में सिक्किम के समग्र विकास का प्रयास किया। सिक्किम एक छोटा पहाड़ी राज्य है, जो पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। ओडिशा, जो पहले पिछड़े राज्यों में गिना जाता था, वहां नवीन पटनायक के नेतृत्व में उल्लेखनीय विकास हुआ। माणिक सरकार के नेतृत्व में त्रिपुरा में भी विकास हुआ, लेकिन बिहार की परिस्थितियां और चुनौतियां अलग रही हैं।
