विपक्ष के विरोध में अटक गया फैसला, मुद्दा अब संसद से निकलकर जनता तक पहुंचा
सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली
आज संसद के भीतर जो हुआ, उसका असर अब सीधे चुनावी मैदान में दिखाई देगा। महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने और लोकसभा सीटों के विस्तार से जुड़े 131वें संविधान संशोधन विधेयक का गिरना अब सिर्फ संसदीय घटना नहीं रहा, बल्कि यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका हैखासकर पश्चिम बंगाल के चुनाव में।
लोकसभा में शुक्रवार को जब इस बिल पर वोटिंग हुई, तो सरकार जरूरी आंकड़ा नहीं जुटा सकी। समर्थन में 298 वोट मिले, विरोध में 230 सांसद खड़े हुए और कुल 528 सदस्यों ने हिस्सा लिया। संविधान संशोधन के लिए जरूरी 352 वोटों का आंकड़ा पार न होने के कारण बिल खारिज हो गया। इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े दो अन्य विधेयकों को वापस लेने का फैसला किया।
यह विधेयक सिर्फ महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने तक सीमित नहीं था। इसके जरिए लोकसभा की सीटों को 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक करने का प्रस्ताव रखा गया था, जो 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन के बाद लागू होना था। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी इसी तरह सीटें बढ़ाने की योजना थी, ताकि 2029 से पहले महिला आरक्षण को जमीन पर उतारा जा सके। लेकिन विपक्ष के तीखे विरोध ने इस पूरे प्लान को संसद में ही रोक दिया और यहीं से राजनीति ने नया मोड़ ले लिया।
पश्चिम बंगाल का चुनाव इस बार अलग दिशा में जाता दिख रहा है। यहां पारंपरिक मुद्दे-जाति और धर्म पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और केंद्र में आ गई हैं महिलाएं। राज्य में करीब 3.16 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो कुल वोटर्स का लगभग आधा हिस्सा हैं। यानी सत्ता की चाबी अब सीधे महिला वोट बैंक के हाथ में है। और यही वजह है कि संसद में बिल गिरने के बाद इस मुद्दे ने चुनावी मैदान में आग पकड़ ली है।
भारतीय जनता पार्टी ने इस मौके को तुरंत राजनीतिक हथियार में बदल दिया है। पार्टी खुलकर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके और समाजवादी पार्टी को जिम्मेदार ठहरा रही है और यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि महिलाओं को राजनीतिक अधिकार देने में असली बाधा कौन है।
यह सिर्फ आरोप नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है-जिसका सीधा निशाना महिला मतदाता हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस भी लंबे समय से महिला केंद्रित योजनाओं और राजनीति के जरिए अपनी मजबूत पकड़ बनाए हुए है। ऐसे में मुकाबला अब और सीधा हो गया है-एक तरफ आरोप, दूसरी तरफ जवाब और बीच में महिला वोटर। यानी बंगाल में इस बार लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि भरोसे की है।
संसद में बिल गिरना जहां सरकार के लिए झटका माना जा रहा है, वहीं चुनावी रणनीति के लिहाज से यह एक नया मौका भी बन गया है। राजनीतिक दल अब इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से पेश कर रहे हैं-कोई इसे अधिकार की लड़ाई बता रहा है तो कोई इसे राजनीतिक असफलता।
2026 के चुनाव में महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभाने जा रही हैं। उनकी संख्या, उनकी भागीदारी और उनके मुद्दे-तीनों मिलकर चुनाव का रुख तय कर सकते हैं। अब सवाल यह नहीं है कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि यह है कि कौन महिलाओं का भरोसा जीत पाता है।