नेपाल में 826 लोगों के लापता होने की सूचना, पर्यटन बोर्ड की नई सूची में 644 पर्यटक और यात्री संपर्क से बाहर, तिब्बत के ग्यिरोंग में अलग से 558 लोग लापता, पांच हजार से अधिक सुरक्षाकर्मी राहत और बचाव अभियान में जुटे
नेपाल-चीन सीमा के ऊंचे पहाड़ों से अचानक उतरे पानी, बर्फ, चट्टानों और मलबे ने भोटेकोशी और उससे जुड़े नदी क्षेत्र में ऐसी तबाही मचाई कि एक दिन बाद भी विनाश की पूरी तस्वीर सामने नहीं आ सकी है। नेपाल में अब तक 270 शव बरामद किए जाने की रिपोर्ट है, जबकि सैकड़ों लोगों की तलाश जारी है। नेपाल पर्यटन बोर्ड की गुरुवार दोपहर की नवीनतम सूची के मुताबिक 644 पर्यटक और यात्री अब भी लापता अथवा संपर्क से बाहर हैं। इनमें 517 विदेशी नागरिक हैं। भारतीय नागरिकों की संख्या सबसे अधिक 178 है। इससे पहले राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट में नेपाल में कुल 826 लोगों के लापता या संपर्क से बाहर होने की जानकारी दी गई थी।
लापता लोगों में केवल पर्यटक ही नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों के जवान और स्थानीय नागरिक भी शामिल हैं। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक नेपाली सेना के 44 जवान, नेपाल पुलिस के 28 और सशस्त्र पुलिस बल के 13 जवानों का भी पता नहीं चल पाया था। रसुवा और नुवाकोट जिलों से भी बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों के संपर्क से बाहर होने की सूचना मिली है।
पर्यटन बोर्ड के आंकड़े लगातार अपडेट हो रहे हैं। पहले 590 पर्यटकों के संपर्क से बाहर होने की जानकारी सामने आई थी, लेकिन आज दोपहर जारी नई सूची में यह संख्या बढ़कर 644 हो गई। इनमें 127 नेपाली और 517 विदेशी नागरिक हैं। भारत के 178 नागरिकों के अलावा अमेरिका के 65, यूक्रेन के 53, मलेशिया के 51, ऑस्ट्रेलिया के 35 और ब्रिटेन के 33 नागरिकों का भी पता नहीं चल पाया है। अधिकारियों और पर्यटन एजेंसियों की टीमें यात्रियों की सूची का मिलान कर रही हैं, इसलिए इन आंकड़ों में आगे भी बदलाव संभव है।
आपदा का दायरा केवल नेपाल तक सीमित नहीं है। सीमा पार चीन के तिब्बत स्थित ग्यिरोंग काउंटी में 558 लोगों के लापता होने की सूचना है। इनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं। तिब्बत में कम से कम तीन लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। नेपाल और तिब्बत के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो 1,300 से अधिक लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं।
तबाही उस पहाड़ी गलियारे में हुई है, जो तिब्बत के ल्हासा को नेपाल की राजधानी काठमांडू से जोड़ता है। इस मार्ग का इस्तेमाल बड़ी संख्या में पर्यटक, ट्रेकर्स और कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्री करते हैं। यही वजह है कि आपदा की चपेट में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक भी आए हैं।
वायरल हो रहे वीडियो में पानी और मलबे की विशाल धारा ग्यिरोंग सीमा क्षेत्र में लोगों, वाहनों और निर्माणों को अपने साथ बहाती दिखाई दी। नेपाल की ओर घर, सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कई स्थानों पर सड़क संपर्क टूट जाने और मोटी कीचड़ जमा होने के कारण राहत दलों को आगे बढ़ने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
नेपाल में पांच हजार से अधिक सेना और पुलिसकर्मियों को राहत एवं बचाव अभियान में लगाया गया है। हेलीकॉप्टरों की मदद से दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को निकाला जा रहा है और भोजन, टेंट, दवाइयां तथा अन्य आवश्यक सामग्री पहुंचाई जा रही है। गुरुवार को 100 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाले जाने की सूचना है। भारत की ओर से भी नेपाल को टेंट, भोजन और अन्य आपात राहत सामग्री उपलब्ध कराई गई है।
इस आपदा की वजह को लेकर शुरुआती तस्वीर भी अब अधिक स्पष्ट हो रही है। पहले इलाके में भूकंप आने और उसके कारण ग्लेशियर टूटने की आशंका जताई गई थी। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बाद में स्पष्ट किया कि दर्ज हुई भूकंपीय गतिविधि वास्तविक भूकंप नहीं, बल्कि ग्लेशियर, चट्टान और बर्फ के विशाल हिस्से के ढहने से पैदा हुई ऊर्जा थी। इसके बाद भारी मात्रा में मलबा नदी की ओर बढ़ा और विनाशकारी बाढ़ की स्थिति बनी।
विशेषज्ञों के मुताबिक पानी का उफान असाधारण रूप से तेज था। त्रिशूली नदी में कुछ स्थानों पर करीब आधे घंटे में जलस्तर नौ मीटर तक बढ़ने की बात सामने आई है। इससे नदी किनारे बसे लोगों को संभलने और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के लिए बेहद कम समय मिला।
नेपाल में आई इस भीषण आपदा के बाद बिहार के नेपाल सीमा से सटे क्षेत्रों में भी सतर्कता बढ़ा दी गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी के साथ बगहा, वाल्मीकिनगर, बेतिया और मोतिहारी के सीमावर्ती क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति का सर्वेक्षण किया। सुरक्षा, राहत-बचाव और प्रशासनिक तैयारियों की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को पूरी मुस्तैदी के साथ आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं।
फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती लापता लोगों तक पहुंचने की है। मलबे से पटे रास्ते, टूटे पुल और दुर्गम पहाड़ तलाशी अभियान को कठिन बना रहे हैं। इसके बावजूद नेपाल और तिब्बत दोनों तरफ बचाव अभियान जारी है। हर गुजरते घंटे के साथ आंकड़े बदल रहे हैं और सैकड़ों परिवार अपने लोगों की खबर का इंतजार कर रहे हैं।