- कुलाधिपति और मुख्यमंत्री को सौंपा साक्ष्य सहित आवेदन। प्रमाण पत्रों में फर्जीवाड़े का आरोप
स्टेट ब्यूरो: राज्य में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उठे सवाल एक बार फिर तेज हो गए हैं। लंबे समय से कथित फर्जीवाड़े के खिलाफ आवाज उठा रहे अभ्यर्थियों की उम्मीदें हालिया प्रशासनिक बदलावों के बाद और मजबूत हुई हैं। इसी क्रम में बुधवार को अभ्यर्थियों के एक समूह ने कुलाधिपति और मुख्यमंत्री को शपथ पत्र और साक्ष्यों के साथ विस्तृत आवेदन सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की है।
अभ्यर्थियों का आरोप है कि बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग की सिफारिश पर विभिन्न विश्वविद्यालयों में हुई नियुक्तियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं बरती गई हैं। उनका कहना है कि कई मामलों में अनुभव प्रमाण पत्र और दिव्यांगता प्रमाण पत्र से जुड़े दस्तावेज संदिग्ध पाए गए हैं, जिससे पूरी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार आयोग ने दिसंबर 2024 में शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर इन प्रमाण पत्रों की विश्वविद्यालय स्तर पर जांच कराने का अनुरोध किया था। इसके बाद विभाग ने सभी विश्वविद्यालयों को जांच समितियां गठित करने का निर्देश भी दिया। बावजूद इसके, अभ्यर्थियों का कहना है कि करीब डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी जांच पूरी नहीं हो सकी है।
अभ्यर्थियों ने यह भी आरोप लगाया कि जब भी जांच की मांग उठती है, आयोग और विश्वविद्यालय एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामले से बचने की कोशिश करते हैं। आयोग इस प्रक्रिया को विश्वविद्यालयों के अधिकार क्षेत्र में बताता है, जबकि विश्वविद्यालय इसे आयोग की जिम्मेदारी बताकर पीछे हट जाते हैं। उनका कहना है कि यह गतिरोध जानबूझकर बनाया गया है ताकि दोषियों को बचाया जा सके।
आवेदन में अभ्यर्थियों ने यह भी कहा है कि इस स्थिति के कारण योग्य उम्मीदवार मानसिक दबाव का सामना कर रहे हैं और उनका भविष्य अधर में लटक गया है। उन्होंने कुलाधिपति और मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि दोनों संस्थाओं के बीच स्पष्ट जवाबदेही तय की जाए और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।
अभ्यर्थियों ने अपने आवेदन के साथ 58 पृष्ठों का साक्ष्य भी सौंपा है, जिसमें कथित अनियमितताओं से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। उनका कहना है कि यदि समयबद्ध जांच कराई जाए तो सच्चाई सामने आ सकती है और दोषियों पर कार्रवाई संभव हो सकेगी।