डीएम और एसपी कार्यालय से चंद कदम दूर सरकारी संपत्ति को पहुंचा नुकसान, शहर के सबसे संवेदनशील इलाके में हुई घटना ने खड़े किए कई गंभीर सवाल

नीरज कुमार, पूर्वी चम्पारण

मोतिहारी का गांधी मैदान केवल एक सार्वजनिक स्थल नहीं, बल्कि शहर की पहचान, सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता है। लेकिन इन दिनों गांधी मैदान का एक दृश्य विकास और सुरक्षा के तमाम दावों पर सवाल खड़ा कर रहा है। मैदान की सुरक्षा के लिए लगाई गई मजबूत लोहे की सलाखें कई स्थानों पर कटी हुई दिखाई दे रही हैं। यह घटना महज सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का मामला नहीं है, बल्कि शहर की सुरक्षा व्यवस्था, निगरानी तंत्र और सार्वजनिक संपत्तियों के संरक्षण को लेकर भी गंभीर बहस छेड़ रही है।

विशेष बात यह है कि हाल ही में मोतिहारी पुलिस अधीक्षक स्वर्ण प्रभात ने गांधी मैदान में बढ़ती गतिविधियों और लोगों की आवाजाही को देखते हुए गांधी मैदान ओपी का शुभारंभ किया था। इसका उद्देश्य क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाना था। इसके बावजूद लोहे की मजबूत ग्रिलों का कटर मशीन से काटा जाना कई सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सुरक्षा व्यवस्था के बीच इस तरह की घटना हो सकती है तो अन्य क्षेत्रों की स्थिति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की हो रही है कि यह घटना किसी सुनसान इलाके में नहीं, बल्कि शहर के सबसे संवेदनशील और सुरक्षित माने जाने वाले प्रशासनिक क्षेत्र में हुई है। गांधी मैदान से कुछ ही दूरी पर जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के कार्यालय स्थित हैं। इसके अलावा पुलिस लाइन, केंद्रीय कारागार, डीएसपी आवास, सिविल सर्जन का सरकारी आवास तथा जिला जज का आवास भी इसी क्षेत्र में मौजूद है। ऐसे इलाके में लोहे की सलाखों को काटकर ले जाना लोगों को हैरान कर रहा है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि लोहे की ग्रिलें कोई छोटी या हल्की संरचना नहीं होतीं जिन्हें आसानी से हटाया जा सके। इन्हें काटने के लिए उपकरणों का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी गतिविधि के बावजूद किसी स्तर पर इसकी जानकारी क्यों नहीं मिली और समय रहते रोकथाम के प्रयास क्यों नहीं किए गए?

गांधी मैदान के विकास और सौंदर्यीकरण पर समय-समय पर बड़ी राशि खर्च की गई है। यहां बाउंड्री वॉल, फुटपाथ, हाई-मास्ट लाइट, बैठने की व्यवस्था और सुरक्षा के लिए मजबूत लोहे की ग्रिलें लगाई गईं। इन सभी कार्यों का उद्देश्य मैदान को सुरक्षित, आकर्षक और व्यवस्थित बनाना था। लेकिन अब कट चुकी सलाखें उन विकास कार्यों की स्थिति पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही हैं, जिन पर जनता के कर से प्राप्त धन खर्च किया गया।

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन उनके रखरखाव और सुरक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। कई लोगों का कहना है कि नई संरचनाएं बनती हैं, लेकिन समय बीतने के साथ उनकी निगरानी कमजोर पड़ जाती है। नतीजा यह होता है कि सार्वजनिक संपत्तियां धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होती रहती हैं और सरकारी धन का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

यह मामला केवल कुछ लोहे की सलाखों के कट जाने तक सीमित नहीं है। यह सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा, जवाबदेही और संरक्षण का बड़ा प्रश्न है। गांधी के नाम पर बसे इस ऐतिहासिक शहर में स्थित गांधी मैदान की स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम अपनी साझा धरोहरों की रक्षा के प्रति पर्याप्त गंभीर हैं।