मुजफ्फरपुर में कुलपति के आवास के बाहर बम फेंके जाने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल

डाॅ. प्रवाल

बिहार के मुजफ्फरपुर में बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति आवास पर देर रात बम फेंके जाने की घटना ने बिहार की कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब थाना के सामने ही यह दुस्साहस हो तो आम नागरिकों की सुरक्षा की स्थिति का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है।

मुजफ्फरपुर में देर रात जो घटना घटी, वह केवल एक विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार की सुरक्षा व्यवस्था की परतें खोलती है। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो दिनेश चंद्र राय के सरकारी आवास के बाहर नकाबपोश बदमाशों द्वारा दो सुतली बम फेंकना इस बात का संकेत है कि अपराधियों के मन में अब कानून का भय लगातार कम होता जा रहा है। सौभाग्य से इस घटना में किसी प्रकार की जनहानि नहीं हुई, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक असर कहीं अधिक गहरा है।

घटना की गंभीरता इस तथ्य से और बढ़ जाती है कि कुलपति आवास के ठीक सामने विश्वविद्यालय थाना स्थित है। इसके बावजूद अपराधियों का बेखौफ आना, बम फेंकना और फरार हो जाना यह दर्शाता है कि सुरक्षा व्यवस्था केवल औपचारिकता बनकर रह गई है। यदि कानून के संरक्षण में रहने वाले उच्च पदस्थ अधिकारी ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम आदमी की सुरक्षा किस भरोसे टिकी है?

सोमवार सुबह एफएसएल की टीम घटनास्थल पर पहुंची और बम के अवशेष बरामद किए गए। पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है और वरीय अधिकारियों ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या हर घटना के बाद केवल जांच और औपचारिक कार्रवाई ही समाधान है? क्या बिहार में अब कानून का भय समाप्त हो चुका है?

इस घटना को व्यापक संदर्भ में देखा जाए तो यह भी सामने आता है कि इसे असिस्टेंट प्रोफेसर बहाली में हुई गड़बड़ियों की जांच से जोड़कर देखा जा रहा है। विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा 2020 से हो रही नियुक्तियों को लेकर पहले से ही विवाद और अदालती मामले चल रहे हैं। कुलपति द्वारा की गई जांच में कई फर्जी प्रमाणपत्र उजागर हुए और कई नियुक्तियों पर रोक लगाई गई। ऐसे में यदि यह घटना किसी प्रकार का दबाव बनाने की कोशिश है तो यह न केवल एक व्यक्ति बल्कि पूरी व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है।

कुलपति प्रो. दिनेश चंद्र राय का यह स्पष्ट बयान कि वे किसी दबाव में काम नहीं करेंगे और सभी निर्णय नियमानुसार होंगे, एक सकारात्मक संदेश जरूर देता है। लेकिन केवल व्यक्तिगत दृढ़ता से व्यवस्था नहीं चलती, इसके लिए मजबूत सुरक्षा और प्रभावी कानून व्यवस्था की आवश्यकता होती है।

बिहार में बीते वर्षों में अपराध को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। यह घटना उस चिंता को और गहरा करती है। यह कोई अलग-थलग घटना नहीं लगती, बल्कि एक ऐसी प्रवृत्ति का हिस्सा प्रतीत होती है, जहां अपराधी अब सीधे सत्ता और व्यवस्था के प्रतीकों को चुनौती देने लगे हैं।

आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कुलपति जैसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति का आवास ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक किस भरोसे अपने घरों में सुरक्षित महसूस करे? क्या पुलिस केवल घटनाओं के बाद सक्रिय होगी, या फिर अपराध को रोकने के लिए भी कोई ठोस रणनीति बनेगी?

जरूरत इस बात की है कि इस घटना को एक सामान्य आपराधिक घटना मानकर छोड़ न दिया जाए, बल्कि इसे चेतावनी के रूप में लिया जाए। अपराधियों की शीघ्र गिरफ्तारी, कठोर कार्रवाई और सुरक्षा व्यवस्था की जमीनी समीक्षा ही इस बढ़ते भय के माहौल को खत्म कर सकती है।

यदि अब भी व्यवस्था नहीं चेती तो यह डर केवल एक परिसर या एक शहर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे बिहार में फैल जाएगा। और तब सवाल केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि शासन की विश्वसनीयता का होगा।