पुक्कलम से सजे आंगन, केले के पत्तों पर परोसे गए पारंपरिक व्यंजन। राष्ट्रपति मुर्मु ने बताया प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और भाईचारे का अवसर
नई दिल्ली : फूलों से सजे आंगन, केले के पत्तों पर सजी व्यंजनों की लंबी कतार और पारंपरिक परिधानों में लोक संस्कृति की झलक। बुधवार को केरल में कुछ ऐसा ही नजारा रहा। दस दिनों से चली आ रही खुशियां थिरुवोणम के साथ अपने चरम पर पहुंचीं। देश के दूसरे हिस्सों और विदेशों में बसे मलयाली समुदाय ने भी अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़े इस खास दिन को उल्लास के साथ मनाया।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने इस अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अपने संदेश में नई फसल के आगमन को प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर बताया। साथ ही कहा कि यह केरल की समृद्ध संस्कृति और भाईचारे की झलक पेश करता है तथा विविधता में एकता को मजबूत करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोगों को बधाई देते हुए इसकी वैश्विक पहचान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। उन्होंने कामना की कि यह अवसर समाज में खुशी, एकजुटता और समृद्धि को और मजबूती दे।
मलयालम सौर कैलेंडर के चिंगम महीने में थिरुवोणम नक्षत्र के दौरान इसका मुख्य आयोजन होता है। हिंदी पंचांग में थिरुवोणम को श्रवण नक्षत्र कहा जाता है। दस दिनों तक चलने वाले इस आयोजन की शुरुआत अथम नक्षत्र से होती है और थिरुवोणम के साथ इसका प्रमुख चरण पूरा होता है।
इन दस दिनों में घरों के सामने ताजे फूलों से आकर्षक रंगोली बनाई जाती है, जिसे पुक्कलम कहते हैं। जैसे-जैसे मुख्य दिन करीब आता है, इसकी सजावट और भव्य होती जाती है। इसके पीछे राजा महाबली के स्वागत की मान्यता जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा महाबली अत्यंत लोकप्रिय और प्रजापालक शासक थे। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर उनसे तीन पग भूमि मांगी। वामन ने तीन पग में सब कुछ नाप लिया और महाबली को पाताल जाना पड़ा। प्रजा के प्रति उनके लगाव को देखते हुए उन्हें वर्ष में एक बार धरती पर लौटने का वरदान मिला। मान्यता है कि थिरुवोणम के दिन महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। इसी विश्वास के साथ घरों को सजाकर उनका स्वागत किया जाता है।
खुशियों के इस मौके पर भोजन भी केरल की संस्कृति की कहानी कहता है। विशेष दावत को ओणसद्या कहा जाता है। केले के पत्ते पर चावल, सांबर, रसम, अवियल समेत कई तरह के शाकाहारी पकवान परोसे जाते हैं। भोजन का समापन मीठे पायसम के साथ होता है। कई जगह ओणसद्या में 26 से 64 प्रकार तक के व्यंजन शामिल किए जाते हैं।
केरल की प्रसिद्ध वल्लम कली यानी नौका दौड़ भी इस आयोजन का बड़ा आकर्षण है। लंबी नौकाओं पर ताल से ताल मिलाते नाविक जब पानी को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं तो किनारों पर मौजूद लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। थिरुवाथिरकली और पुलिकली जैसे लोकनृत्य सांस्कृतिक रंग को और गहरा कर देते हैं।
महिलाएं सफेद या क्रीम रंग के सुनहरी किनारी वाले पारंपरिक परिधान में नजर आती हैं, जबकि पुरुष मुंडू पहनते हैं। फूलों की सजावट, पारंपरिक भोजन, लोकनृत्य, नौका दौड़ और महाबली से जुड़ी आस्था इसे खास बनाती है। केरल की मिट्टी से निकली यह सांस्कृतिक विरासत आज दुनिया के अनेक हिस्सों में बसे मलयाली समुदाय को अपनी जड़ों से जोड़ती है।