सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच और प्राथमिकी दर्ज कराने की गुहार पर सुनवाई से इनकार, याचिका की मंशा पर अदालत ने उठाए सवाल
नई दिल्ली : इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से कथित तौर पर बेहिसाब नकदी मिलने के चर्चित मामले में शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने FIR दर्ज कराने और अदालत की निगरानी में जांच की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को फटकार लगाते हुए इसे सस्ती लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश बताया और मामले की सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
यह याचिका वकील घनश्याम उपाध्याय ने दाखिल की थी। उन्होंने बताया कि वह स्वयं प्रैक्टिसिंग एडवोकेट हैं और इस मामले को लेकर शिकायत भी दर्ज करा चुके हैं। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनसे पूछा कि क्या वह मामले में स्वयं पक्षकार के रूप में पेश हो रहे हैं। इस पर उन्होंने हां में जवाब दिया।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील थी कि किसी न्यायाधीश के पद से इस्तीफा दे देने मात्र से कथित बेहिसाब नकदी से जुड़ी संभावित आपराधिक जवाबदेही समाप्त नहीं हो जाती। उनका कहना था कि इस्तीफे के बावजूद मामले की कानूनी जांच होनी चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर FIR दर्ज की जानी चाहिए।
घनश्याम उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से केंद्रीय जांच ब्यूरो के नेतृत्व में एक स्वतंत्र विशेष जांच दल गठित करने और पूरे मामले की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में कराने का निर्देश देने की मांग भी की थी। हालांकि पीठ ने इन मांगों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इसी तरह की एक याचिका पहले खारिज की जा चुकी है।
मामला 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में लगी भीषण आग के बाद चर्चा में आया था। उस समय जस्टिस वर्मा और उनकी पत्नी मध्य प्रदेश गए हुए थे। आग बुझाने के दौरान आवास से कथित तौर पर अधजले नोटों के बंडल मिलने की बात सामने आने के बाद विवाद खड़ा हो गया था।
नकदी से जुड़ा मामला सामने आने के समय जस्टिस वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट में न्यायाधीश थे। बाद में वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़े। कथित नकदी को लेकर उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू हुई। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया।
जस्टिस वर्मा ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताया था। उन्होंने पूरे घटनाक्रम को अपने खिलाफ गहरी साजिश करार देते हुए आरोपों से इनकार किया था। अब FIR दर्ज कराने और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका खारिज होने से इस मामले में याचिकाकर्ता को शीर्ष अदालत से राहत नहीं मिली।
