• 15 मई 2026 की समयसीमा गुजरने के बाद भी नहीं पूरा हुआ काम, मानसून से पहले निर्माण कार्यों पर मंडरा रहा है खतरा


पूर्वी चंपारण : मिथिला के प्रतापी राजा शिव सिंह की गौरवशाली विरासत का प्रतीक पताही का ऐतिहासिक घोड़दौर पोखर आज अपनी उपेक्षा और बदहाली की कहानी खुद कहता नजर आ रहा है। जिस पोखर का निर्माण जनकल्याण, जल संरक्षण और लोकआस्था को ध्यान में रखकर कराया गया था, वही धरोहर आज विभागीय सुस्ती, पारदर्शिता पर उठते सवालों और विकास कार्यों की धीमी गति के कारण चर्चा में है। 9.31 करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना के बावजूद धरातल पर अपेक्षित प्रगति नहीं दिख रही, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ती जा रही है।


करीब 700 वर्ष पुराना घोड़दौर पोखर केवल एक जलाशय नहीं, बल्कि मिथिला के इतिहास का जीवंत दस्तावेज माना जाता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार 15वीं शताब्दी में, लगभग 1413 से 1416 ईस्वी के बीच, राजा शिव सिंह ने एक विशाल यज्ञ के उपरांत इसका निर्माण कराया था। स्थानीय किंवदंती के अनुसार पोखर की सीमा तय करने के लिए राजा ने अपने प्रिय घोड़े को खुला छोड़ दिया था। जहां तक घोड़ा दौड़ा, उसी क्षेत्र को पोखर के रूप में विकसित किया गया। इसी घटना के कारण इसका नाम घोड़दौर पोखर पड़ा। आज भी यह कथा क्षेत्र के लोगों के बीच श्रद्धा और गौरव के साथ सुनाई जाती है।


इस ऐतिहासिक जलाशय का महत्व केवल इतिहास तक सीमित नहीं है। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां दुर्लभ औषधीय वनस्पतियां और जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। वर्षों से भारत और नेपाल के वैद्य इस क्षेत्र में औषधीय पौधों की खोज के लिए पहुंचते रहे हैं। यही कारण है कि घोड़दौर पोखर को सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक विरासत के रूप में देखा जाता है।


24 दिसंबर 2024 को मुख्यमंत्री की प्रगति यात्रा के दौरान जब इस ऐतिहासिक धरोहर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की घोषणा हुई, तब क्षेत्र में उत्साह का माहौल बन गया था। लंबे समय से इस धरोहर के संरक्षण के लिए प्रयासरत प्रोफेसर राम निरंजन पांडेय, श्याम निरंजन पांडेय और पत्रकार प्रकाश सिंह सहित अनेक प्रबुद्धजनों को लगा कि अब वर्षों पुराना सपना पूरा होगा। सरकार ने 9.31 करोड़ रुपये की लागत से इसे पर्यटन और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना स्वीकृत की।


योजना के अनुसार यहां भव्य घाटों का निर्माण, पक्की सीढ़ियां, पेवर ब्लॉक ट्रैक, रंग-बिरंगी एलईडी लाइटें, हाई-मास्ट लाइट, म्यूजिकल फाउंटेन, औषधीय उद्यान और आधुनिक पर्यटन सुविधाएं विकसित की जानी थीं। इसके साथ ही इस परियोजना से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित होने और पताही को पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान मिलने की उम्मीद थी।


लेकिन डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी तस्वीर उम्मीदों के अनुरूप नहीं दिख रही। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्य की रफ्तार बेहद धीमी है और करोड़ों रुपये की योजना के बावजूद धरातल पर बदलाव नगण्य दिखाई देता है। ग्रामीणों का कहना है कि लंबे समय तक कार्यस्थल पर न तो कोई स्पष्ट सूचना बोर्ड लगाया गया और न ही कार्यदायी एजेंसी की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराई गई। इतनी बड़ी परियोजना में पारदर्शिता का अभाव लोगों के बीच संदेह पैदा कर रहा है।


ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि 9.31 करोड़ रुपये की यह परियोजना फिलहाल धरातल से अधिक कागजों और सरकारी दावों में दिखाई देती है। लोगों का कहना है कि जिस गति से काम होना चाहिए था, वैसी प्रगति कहीं नजर नहीं आती। यही वजह है कि अब लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद परिणाम क्यों नहीं दिख रहे।


परियोजना को 15 मई 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। लेकिन निर्धारित समयसीमा बीत जाने के बाद भी काम अधूरा है। वर्तमान में पोखर से मिट्टी निकालने और सीमित स्तर पर कुछ कार्य किए जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह काम भी इतना सतही है कि पहली ही तेज बारिश में इसके बह जाने की आशंका है। स्थानीय लोगों के अनुसार यदि मानसून से पहले सुरक्षा और संरचनात्मक कार्य पूरे नहीं किए गए तो अब तक हुआ कार्य भी प्रभावित हो सकता है।


यह इलाका हर वर्ष नेपाल से आने वाले पानी और जलजमाव की समस्या से जूझता है। जुलाई आते ही कई क्षेत्रों में पानी भर जाता है। ऐसे में लोगों का मानना है कि यदि निर्माण कार्यों में तेजी नहीं लाई गई तो परियोजना को भारी नुकसान हो सकता है। ग्रामीण इसे जनता के पैसे की बर्बादी बताते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।


स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि योजना समय पर पूरी हो गई होती तो आज घोड़दौर पोखर के किनारे भव्य घाट दिखाई देते, पक्की सीढ़ियां लोगों को आकर्षित करतीं, रंग-बिरंगी एलईडी लाइटों और हाई-मास्ट लाइटों से पूरा परिसर जगमगाता, म्यूजिकल फाउंटेन पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बनता और औषधीय उद्यान इस क्षेत्र को नई पहचान देते। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यह स्थल पूर्वी चंपारण के प्रमुख पर्यटन केंद्रों में शामिल होकर स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का बड़ा माध्यम बन चुका होता।


मामले को लेकर पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल ने सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना जल संसाधन विभाग के अधीन है। पिछले दिनों विसूत्री की बैठक में भी जनप्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद पकड़ीदयाल अनुमंडल पदाधिकारी को जांच के निर्देश दिए गए हैं। जिलाधिकारी ने स्पष्ट कहा कि कार्य में तेजी लाई जाए और इस ऐतिहासिक धरोहर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने में किसी भी प्रकार की शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।


आज घोड़दौर पोखर एक चौराहे पर खड़ा है। एक ओर उसका गौरवशाली इतिहास है, जो राजा शिव सिंह और लोककल्याण की गाथा सुनाता है। दूसरी ओर वर्तमान है, जहां करोड़ों रुपये की योजना के बावजूद विकास अधूरा दिखाई देता है। अब लोगों की निगाहें प्रशासन और संबंधित विभागों पर टिकी हैं।