विश्व हाथी दिवस पर प्रधानमंत्री मोदी ने देश के संरक्षण प्रयासों को सराहा

नई दिल्ली : जंगल में चलता एक हाथी सिर्फ एक विशाल जीव नहीं होता, उसके कदमों के साथ जंगल का भविष्य भी आगे बढ़ता है। वह मीलों चलते हुए बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाता है, नए पौधों के जन्म की जमीन तैयार करता है और अपने पूरे सफर में प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने में भूमिका निभाता है। यही वजह है कि हाथियों की घटती संख्या दुनिया के लिए चिंता है, लेकिन विश्व हाथी दिवस पर भारत के पास बताने के लिए एक बड़ी संरक्षण कहानी भी है। दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक जंगली एशियाई हाथियों का बसेरा आज भारत में है और इन्हें सुरक्षित रखने के लिए देश में 33 हाथी अभयारण्य के साथ 150 वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हाथी गलियारे मौजूद हैं।

विश्व हाथी दिवस 2026 के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के हाथी संरक्षण प्रयासों को रेखांकित करते हुए कहा कि हाथी देश की पर्यावरण विरासत का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक जंगली एशियाई हाथी भारत में रहते हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के 33 हाथी अभयारण्य इन विशाल जीवों को प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराने के साथ उनके दीर्घकालिक संरक्षण के प्रयासों को मजबूत कर रहे हैं। हाथियों की सुरक्षा की इस मुहिम के पीछे जमीन पर काम करने वाले हजारों लोगों की भूमिका को भी उन्होंने याद किया। मोदी ने वन कर्मियों, वैज्ञानिकों, पशु चिकित्सकों, महावतों और स्थानीय समुदायों के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि इन सभी की भागीदारी हाथी संरक्षण के प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

विश्व हाथी दिवस पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने भी हाथियों और मनुष्यों के साझा भविष्य को सुरक्षित करने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने बताया कि देश के 14 राज्यों में 33 हाथी अभयारण्य हैं। इसके अलावा हाथियों के आवागमन के लिए 150 गलियारों को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया गया है।

हाथियों के संरक्षण की चुनौती केवल उनके लिए सुरक्षित जंगल तैयार करने तक सीमित नहीं है। जंगलों के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों के बीच मानव और हाथी का आमना-सामना भी बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। कई इलाकों में हाथियों का आबादी और खेतों की ओर आना दोनों के लिए खतरा पैदा करता है। इसी को देखते हुए भारत में हाथियों की आबादी की उन्नत निगरानी के साथ मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के उपायों को मजबूत किया जा रहा है।

भूपेंद्र यादव ने हाथी संरक्षण को जंगलों के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि हाथियों के भविष्य को सुरक्षित करना वास्तव में हमारे जंगलों, जैव विविधता और पर्यावरण विरासत को सुरक्षित करना है। उन्होंने ऐसे प्रयास जारी रखने का आह्वान किया, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी देश के जंगलों और प्राकृतिक क्षेत्रों में हाथियों को स्वतंत्र रूप से विचरण करते देख सकें।

हाथी जंगल में जहां से गुजरता है, वहां केवल अपने पैरों के निशान नहीं छोड़ता। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने हाथियों की इसी पारिस्थितिक भूमिका की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि घूमते हुए हाथी बीजों को दूर-दूर तक फैलाते हैं। इन बीजों से नए पौधे जन्म लेते हैं और इस तरह हाथियों की गतिविधियां जंगलों के प्राकृतिक विस्तार और संतुलन में मदद करती हैं।

कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा कि भारत पृथ्वी के सबसे समृद्ध और विविध प्राकृतिक भूदृश्यों वाले देशों में शामिल है। दुनिया के जंगली एशियाई हाथियों की इतनी बड़ी आबादी का भारत में होना देश की पारिस्थितिक विरासत की अहम पहचान है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकसित किए जा रहे हाथी अभयारण्यों को संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण बताया।

हाथी भारतीय समाज में केवल वन्यजीव के रूप में भी नहीं देखा जाता। सदियों से उसकी मौजूदगी भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं, लोककथाओं और जंगलों से जुड़े समुदायों के जीवन का हिस्सा रही है। यही सांस्कृतिक जुड़ाव अब आधुनिक वैज्ञानिक संरक्षण प्रयासों के साथ मिलकर हाथियों के भविष्य को सुरक्षित करने की बड़ी जिम्मेदारी में बदल रहा है।

भारत के सामने चुनौती अब इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने की है। 33 हाथी अभयारण्य और 150 प्रमाणित गलियारे इस दिशा में मजबूत आधार जरूर हैं, लेकिन बढ़ती आबादी और जंगलों पर दबाव के बीच हाथियों के प्राकृतिक रास्तों को सुरक्षित रखना तथा मानव-हाथी संघर्ष को कम करना लगातार जरूरी होता जा रहा है।