गोवा में कल होगा बड़ा ऊर्जा सम्मेलन, पवन ऊर्जा को महत्वाकांक्षा से क्रियान्वयन तक ले जाने पर होगा राष्ट्रीय मंथन

सेंट्रल डेस्क, नई दिल्ली

जलवायु परिवर्तन की चुनौती, ऊर्जा सुरक्षा की जरूरत और स्वच्छ बिजली की बढ़ती मांग के बीच भारत अब पवन ऊर्जा को नई रफ्तार देने की तैयारी में है। विश्व वायु दिवस के अवसर पर सोमवार को गोवा में होने वाला राष्ट्रीय सम्मेलन केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं होगा, बल्कि यह भारत की 100 गीगावाट और उससे आगे की पवन ऊर्जा यात्रा का रोडमैप तय करने वाला अहम मंच बनेगा। “विंड एनर्जी: एम्बिशन टू एक्सेलरेशन” थीम के साथ होने वाले इस सम्मेलन में देश की पवन ऊर्जा क्षमता को महत्वाकांक्षा से तेज क्रियान्वयन की दिशा में ले जाने पर विस्तार से मंथन होगा।

हर साल 15 जून को विश्व वायु दिवस पवन ऊर्जा के महत्व को रेखांकित करने और जलवायु परिवर्तन से मुकाबले में इसकी भूमिका को सामने लाने के लिए मनाया जाता है। इस बार भारत में इसका महत्व इसलिए और बढ़ गया है, क्योंकि देश 2030 तक 100 गीगावाट और 2036 तक 156 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है। गोवा सम्मेलन में केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण, सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, इंडियन रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट एजेंसी, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ विंड एनर्जी, ग्रिड इंडिया, प्रमुख राज्य सरकारों, उद्योग जगत और विभिन्न एसोसिएशन के वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल होंगे।

सम्मेलन में भारत की पवन ऊर्जा यात्रा के अगले चरण को आकार देने वाली प्रमुख प्राथमिकताओं पर चर्चा होगी। इनमें संसाधनों की पर्याप्तता, ग्रिड की तैयारी, क्षमता विस्तार, घरेलू विनिर्माण प्रतिस्पर्धा, निर्यात अवसर, फोरकास्टिंग व्यवस्था और नवीकरणीय ऊर्जा को मजबूत करने वाली नई तकनीकें शामिल हैं। इसी दौरान उद्योग रिपोर्ट “एलिवेटिंग इंडियाज विंड टर्बाइन एक्सपोर्ट फॉर ग्लोबल मार्केट्स” भी जारी की जाएगी, जो भारत की विंड टर्बाइन निर्यात क्षमता और वैश्विक बाजारों में उसकी संभावनाओं को सामने रखेगी।

भारत के पास पवन ऊर्जा का विशाल आधार मौजूद है। देश में 120 मीटर ऊंचाई पर अनुमानित सकल पवन ऊर्जा क्षमता 695.5 गीगावाट और 150 मीटर ऊंचाई पर 1,163.9 गीगावाट आंकी गई है। 150 मीटर पर सबसे अधिक पवन ऊर्जा क्षमता आठ राज्यों में केंद्रित है। राजस्थान में 284.2 गीगावाट, गुजरात में 180.8 गीगावाट, महाराष्ट्र में 173.9 गीगावाट, कर्नाटक में 169.3 गीगावाट, आंध्र प्रदेश में 123.3 गीगावाट, तमिलनाडु में 95.1 गीगावाट, मध्य प्रदेश में 55.4 गीगावाट और तेलंगाना में 54.7 गीगावाट की क्षमता आंकी गई है। ऊर्जा संसाधनों की सही पहचान के लिए देशभर में 900 से अधिक विंड मॉनिटरिंग स्टेशन लगाए गए हैं। 50 मीटर, 80 मीटर, 100 मीटर, 120 मीटर और 150 मीटर हब ऊंचाई पर विंड पोटेंशियल मैप तैयार किए गए हैं।

स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत दुनिया में चौथे स्थान पर है। मार्च 2014 में देश की स्थापित पवन ऊर्जा क्षमता 21.04 गीगावाट थी, जो मार्च 2026 तक बढ़कर 56.09 गीगावाट हो गई। यह करीब 2.66 गुना बढ़ोतरी है। इसके अलावा 28 गीगावाट क्षमता की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। वर्ष 2025-26 में भारत ने 6.05 गीगावाट की अब तक की सबसे अधिक सालाना क्षमता वृद्धि दर्ज की, जिसने 2024-25 के 4.15 गीगावाट के पिछले रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। खास बात यह है कि करीब 45 प्रतिशत पवन ऊर्जा उत्पादन उच्च मांग के समय होता है, जिससे यह सौर ऊर्जा की पूरक बनती है और ग्रिड की विश्वसनीयता को मजबूती देती है।

घरेलू उत्पादन के मोर्चे पर भी भारत तेजी से आगे बढ़ा है। विंड टर्बाइन उत्पादन क्षमता 2014 के 10 गीगावाट से बढ़कर मार्च 2026 तक लगभग 24 गीगावाट हो गई है। इस क्षेत्र ने प्रमुख घटकों में 70 से 80 प्रतिशत तक स्वदेशीकरण हासिल कर लिया है। ब्लेड, टावर, गियरबॉक्स और अन्य आवश्यक उपकरणों के लिए देश में मजबूत घरेलू सप्लाई चेन विकसित हो चुकी है। यही वजह है कि पवन ऊर्जा अब भारत की ऊर्जा प्रणाली का अधिक स्थायी और एकीकृत हिस्सा बनती जा रही है।

सरकार ने पवन ऊर्जा क्षेत्र को गति देने के लिए कई अहम पहल की हैं। गुजरात और तमिलनाडु के तटों पर 500-500 मेगावाट की ऑफशोर पवन परियोजनाओं सहित कुल 1,000 मेगावाट क्षमता के लिए 6,853 करोड़ रुपये की वायबिलिटी गैप फंडिंग को मंजूरी दी गई है। वर्ष 2025-26 के दौरान उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के तहत 500 करोड़ रुपये दिए गए हैं। इसके साथ ही कॉन्ट्रैक्ट्स फॉर डिफरेंस के तहत 500 मेगावाट का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसका उद्देश्य कीमतों के उतार-चढ़ाव को कम करना और नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर्स को राजस्व की निश्चितता देना है।

जनवरी 2026 में रेगुलेटरी, जमीन, ट्रांसमिशन और क्रियान्वयन से जुड़ी चुनौतियों को हल करने के लिए एक टास्क फोर्स बनाई गई। लगातार मांग सुनिश्चित करने के लिए रिन्यूएबल परचेज ऑब्लिगेशन के तहत समर्पित विंड घटक शुरू किया गया है। उद्योगों द्वारा नवीकरणीय ऊर्जा की सीधी खरीद को आसान बनाने के लिए ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस नियम लागू किए गए हैं। मॉडल्स और मैन्युफैक्चरर्स की अप्रूव्ड लिस्ट, पारदर्शी बोली दिशा-निर्देश और विलंब से भुगतान अधिभार नियमों को लागू करने से निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है।

सरकार अब पवन ऊर्जा के विस्तार को केवल परंपरागत राज्यों तक सीमित नहीं रखना चाहती। मध्य प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा जैसे उभरते राज्यों में विंड डिप्लॉयमेंट बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। गुजरात और तमिलनाडु में पहचाने गए लीजिंग क्षेत्रों के जरिए भारत के ऑफशोर पवन क्षेत्र को शुरू करने की तैयारी है। पवन ऊर्जा को स्टोरेज आधारित व्यापार मॉडल और राउंड-द-क्लॉक नवीकरणीय ऊर्जा समाधानों से जोड़ने पर भी काम हो रहा है। ग्रिड आधुनिकीकरण और नवीकरणीय ऊर्जा प्रबंधन के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित फोरकास्टिंग साधनों के इस्तेमाल को भी प्राथमिकता दी जा रही है।

वैश्विक स्तर पर भी भारत पवन ऊर्जा क्षेत्र में अपनी भागीदारी को मजबूत कर रहा है। यूनाइटेड किंगडम, डेनमार्क और बेल्जियम के साथ भारत का सहयोग ऑफशोर विंड डिप्लॉयमेंट, उन्नत तकनीक हस्तांतरण, बेहतर ग्रिड इंटीग्रेशन, वित्तीय मॉडल और परियोजना क्रियान्वयन पर केंद्रित है। भारत-यूनाइटेड किंगडम ऑफशोर विंड टास्कफोर्स को फरवरी 2026 में विजन 2035 और चौथे इंडिया-यूके एनर्जी डायलॉग के तहत शुरू किया गया था। इसके फोकस क्षेत्रों में मार्केट डिजाइन, पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, सप्लाई चेन और ब्लेंडेड फाइनेंस शामिल हैं।

भारत और बेल्जियम ने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम 2026 में ऑफशोर विंड, अनुसंधान एवं विकास और ग्रीन टैक्सोनॉमी में सहयोग की पुष्टि की। इससे भारत के स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में यूरोप की बढ़ती रुचि का संकेत मिलता है। वहीं भारत ने 2019 में डेनमार्क के ऊर्जा, यूटिलिटीज और क्लाइमेट मंत्रालय के साथ ऑफशोर पवन क्षमता निर्माण के लिए सहयोग समझौता किया था। इस समझौते का मई 2025 में नवीकरण किया गया। अब इसमें पावर सिस्टम मॉडलिंग, वेरिएबल नवीकरणीय ऊर्जा का एकीकरण और संयुक्त विशेषज्ञ प्रशिक्षण भी शामिल है।