मोतिहारी केंद्रीय कारा के निरीक्षण के दौरान प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने व्यवस्थाओं का लिया जायजा
पूर्वी चंपारण : जेल की सलाखों के पीछे बंद लोगों की जिंदगी अक्सर समाज की मुख्यधारा से कट जाती है, लेकिन मंगलवार को मोतिहारी केंद्रीय कारा में ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने न्याय व्यवस्था के मानवीय चेहरे को सामने ला दिया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष अभिषेक कुमार दास का कारा भ्रमण केवल एक औपचारिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि उन बंदियों तक न्याय, संवेदना और नए जीवन की उम्मीद पहुंचाने का प्रयास था, जो अपने जीवन के कठिन दौर से गुजर रहे हैं।
निरीक्षण के दौरान जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव नितिन त्रिपाठी भी मौजूद रहे। न्यायाधीश ने कारा परिसर की विभिन्न व्यवस्थाओं का विस्तार से अवलोकन किया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि बंदियों को उपलब्ध कराई जा रही सुविधाएं निर्धारित मानकों के अनुरूप हों। उन्होंने कारा अस्पताल की व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और वार्डों में साफ-सफाई की स्थिति की बारीकी से समीक्षा की। साथ ही बंदियों को उपलब्ध कराए जा रहे भोजन की गुणवत्ता और पोषण स्तर की भी जांच की।
निरीक्षण के क्रम में ई-मुलाकाती हेल्पडेस्क और विधिक सहायता से संबंधित व्यवस्थाओं का भी जायजा लिया गया। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि किसी भी बंदी को कानूनी सहायता प्राप्त करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं आनी चाहिए। महिला वार्ड का निरीक्षण करते हुए वहां रहने वाली महिला बंदियों की सुरक्षा, सुविधाओं और आवश्यक व्यवस्थाओं की भी विस्तृत समीक्षा की गई।
दौरे का सबसे महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक पहलू सुबह नौ बजे देखने को मिला, जब प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने जेल के सामुदायिक रेडियो ‘रेडियो दोस्ती’ के माध्यम से सभी बंदियों को संबोधित किया। अपने संदेश में उन्होंने कहा कि न्याय प्रत्येक व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जरूरतमंद बंदियों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने बंदियों को निराशा से बाहर निकलने और अपने वर्तमान समय को आत्मसुधार के अवसर के रूप में देखने की सलाह दी।
उन्होंने बंदियों से शिक्षा, कौशल विकास, सांस्कृतिक गतिविधियों और रचनात्मक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी करने का आह्वान किया। उनका कहना था कि जेल में बिताया गया समय जीवन की समाप्ति नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की तैयारी भी हो सकता है। यदि बंदी स्वयं को सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास करें, तो रिहाई के बाद वे सम्मान और आत्मविश्वास के साथ समाज की मुख्यधारा में लौट सकते हैं।
निरीक्षण के दौरान न्यायाधीश ने कारा प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिया कि बंदियों की मानवीय गरिमा की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में बंदियों को उनके कानूनी अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। बीमार बंदियों को त्वरित चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने तथा जेल को केवल बंदी गृह नहीं बल्कि सुधार और पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित करने पर विशेष बल दिया।
जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव नितिन त्रिपाठी ने भी कारा प्रशासन को हरसंभव सहयोग का आश्वासन दिया। उन्होंने कहा कि बंदियों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें न्याय उपलब्ध कराना प्राधिकरण की प्रमुख जिम्मेदारी है।
