दुनिया के बाजार तक पहुंचेगी भारतीय बुनाई। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संत कबीर और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार किए प्रदान
नई दिल्ली : सदियों पुराने भारतीय करघे को अब आधुनिक तकनीक, नए डिजाइन और दुनिया के बाजार से जोड़ने की जरूरत है। इसी सोच के साथ राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में आज राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने देश के बुनकरों की कला और परंपरा को सम्मानित करते हुए भविष्य के हथकरघा क्षेत्र की तस्वीर भी सामने रखी। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के उद्यमी, डिजाइनर और स्टार्टअप पारंपरिक शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़कर रोजगार और कारोबार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। तकनीक का सही इस्तेमाल और ई-कॉमर्स की बढ़ती ताकत भारतीय हथकरघा को दुनिया के बाजार में और मजबूत पहचान दिला सकती है।
राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस समारोह में राष्ट्रपति ने संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 प्रदान किए। भारत की समृद्ध और विविध हथकरघा बुनाई परंपराओं के सम्मान में इस अवसर पर चार स्मारक डाक टिकट भी जारी किए गए।
समारोह को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने हथकरघा को भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक विकास यात्रा का अभिन्न हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि देश की असाधारण विविधता हथकरघा में दिखाई देती है और इस परंपरा ने अलग-अलग क्षेत्रों की विशिष्ट पहचान को भी संरक्षित रखा है। यह क्षेत्र केवल कपड़ा उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजगार, महिला सशक्तीकरण, कला-संस्कृति और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन और आत्मनिर्भरता की भारत की यात्रा में भी हथकरघा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के ऐतिहासिक महत्व का उल्लेख करते हुए बताया कि स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत 7 अगस्त 1905 को हुई थी। बंगाल विभाजन के विरोध से निकले इस आंदोलन ने स्वदेशी वस्तुओं और उद्योगों के साथ देश के हथकरघा बुनकरों को प्रोत्साहित करने का संदेश दिया था। इसी ऐतिहासिक विरासत के सम्मान में केंद्र सरकार वर्ष 2015 से 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के रूप में मनाती आ रही है।
उन्होंने हथकरघा क्षेत्र से जुड़े लोगों को बधाई देते हुए इसे भारत की विविधता और सांस्कृतिक एकात्मता का उत्सव बताया। राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार और बुनकर समुदाय के साझा प्रयास भारतीय हथकरघा की प्रीमियम गुणवत्ता वाली पहचान विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
राष्ट्रपति के अनुसार हथकरघा क्षेत्र में भारत की ग्रामीण प्रीमियम अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख मानव-केंद्रित उदाहरण बनने की मजबूत क्षमता है। महत्वपूर्ण हथकरघा क्लस्टरों को आधुनिक प्रौद्योगिकी और नई प्रशिक्षण पद्धतियों से जोड़ा जा रहा है। बुनकरों की आय बढ़ाने के लिए भी सरकार विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही है। इन पहलों के कारण भारतीय हथकरघा की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होने और इसके प्रमाणित सांस्कृतिक अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित होने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
राष्ट्रपति ने विशेष रूप से युवाओं की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक और नए डिजाइन के साथ कई प्रतिभाशाली युवा उद्यमी हथकरघा क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। सरकारी योजनाओं और संस्थानों के माध्यम से ऐसे युवाओं को सक्रिय सहयोग और मार्गदर्शन दिया जाना चाहिए, ताकि उनकी प्रतिभा और उत्साह इस क्षेत्र की दीर्घकालिक सफलता में योगदान दे सके।
युवा उद्यमी, डिजाइनर और स्टार्टअप पारंपरिक भारतीय शिल्प को आधुनिक ट्रेंड, नए ब्रांड और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़कर बाजार के नए रास्ते खोल सकते हैं। राष्ट्रपति ने भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थानों और बुनकर सेवा केंद्रों के अंतर्गत संचालित डिजाइन संसाधन केंद्रों द्वारा युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ने के प्रयासों की भी सराहना की।
बदलते बाजार के बीच राष्ट्रपति ने तकनीक को हथकरघा के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के सतत विकास के लिए नई प्रौद्योगिकियों का उचित इस्तेमाल आवश्यक है। डिजिटल समाधानों से बुनकरों और उनके उत्पादों की बाजार तक पहुंच अधिक प्रभावी बनाई जा सकती है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म भारतीय हथकरघा उत्पादों को वैश्विक ग्राहकों तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।
समारोह में प्रदान किया गया संत कबीर हथकरघा पुरस्कार देश में हथकरघा बुनकरों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है। यह उत्कृष्ट कारीगरी, हथकरघा के प्रति जीवनभर के समर्पण और भारत की बुनाई परंपराओं के संरक्षण तथा संवर्धन में निरंतर योगदान के लिए प्रदान किया जाता है। वहीं राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार पारंपरिक कौशल को संरक्षित रखते हुए आधुनिक तकनीक अपनाने और रचनात्मकता, गुणवत्ता, नवाचार तथा उत्कृष्टता का प्रदर्शन करने वाले बुनकरों एवं अन्य हितधारकों को सम्मानित करता है।
राष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि परंपरा की ताकत को तकनीक और आधुनिक बाजार से जोड़कर भारतीय हथकरघा न केवल दुनिया में अपनी पहचान और मजबूत करेगा, बल्कि देश के समावेशी विकास और आत्मनिर्भरता का भी सशक्त आधार बनेगा।
