कुर्मी डाले जा रहे हैं हाशिये पर, मिलेगा विजय चौधरी को कमान

प्रभात कुमार

नीतीश कुमार जिंदाबाद, निशांत कुमार जिंदाबाद के नारे लग रहे हैं, लेकिन जनता दल यूनाइटेड ठंड पड़ गई है। इस पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग गया है। चिंता यह है कि आगे यह पार्टी बचेगी या नहीं। यह चिंता इतनी गहरी है कि प्रदेश कार्यालय से लेकर राष्ट्रीय कार्यालय की रौनक गायब है। यहां सन्नाटा है। अब यक्ष प्रश्न यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने के एक फैसले ने पूरी पार्टी को कमजोर कर दिया है।

दूसरी तरफ, निशांत कुमार की जनता दल यूनाइटेड में एंट्री सिर्फ जनता दल यूनाइटेड के भीतर पिछड़ा समाज से आने वाले नेताओं के राजनीतिक समाप्ति और बनवास के लिए हुई है। इसके पहले शिकार मनीष वर्मा हुए हैं। आगे इस तीर से कई नेताओं को निशाने पर लिया जाना है। वैसे, निशांत की एंट्री को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने का बड़ा तर्क है। दूसरी तरफ परिवारवाद का आरोप है।

बिहार के ताजा राजनीतिक चक्रव्यूह में भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस्तीफे की जरूरत है, जो उनके पद से हटते ही पूरा हो जाएगा। फिर भारतीय जनता पार्टी पीछे मुड़कर भी नहीं देखेगी। यह बात भी उतनी ही सत्य है, जितना दिन और रात का होना है।

आज की तारीख में जनता दल यूनाइटेड में पार्टी के भविष्य को लेकर चौतरफा चिंता है। विधायक से लेकर कार्यकर्ता तक चिंतित हैं। यह चिंता दिल्ली की राजनीति करने वाले नेताओं में थोड़ी कम है। दिल्ली में भी इस सवाल को लेकर सत्ता सुख भोग रहे मंत्री और सांसदों को छोड़ दें तो बाकी अपने भविष्य को लेकर चिंता में हैं।

वैसे, कुछ नेता और अधिकारी जरूर हैं, जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विदाई के साथ अब जनता दल यूनाइटेड को राजनीतिक विराम देना चाहते हैं। उनकी बड़ी इच्छा यह है कि अब भारतीय जनता पार्टी का ही मुख्यमंत्री हो और इसकी मजबूती के लिए जनता दल यूनाइटेड का विलय भाजपा में हो जाए, तो सोने पर सुहागा होगा। अब बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को कमजोर करने के बाद ऑपरेशन जनता दल यूनाइटेड जारी है। इस ऑपरेशन में सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, बल्कि जनता दल यूनाइटेड का स्लीपर सेल भी सक्रिय है। इसके साथ-साथ पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका भी पूरी ताकत से जुटा है।

सबसे मजेदार बात तो यह है कि इस ऑपरेशन में जिनसे जनता दल यूनाइटेड के कार्यकर्ता विरोध में खड़े होने की उम्मीद कर रहे हैं, वही लोग सबसे अगली पंक्ति में हिंदुत्व के छाते के नीचे अपने लिए स्थान सुरक्षित करने में जुट गए हैं। इसमें सबसे आगे नौकरशाह और नौकरशाह से नेता बने लोग शामिल हैं।

जनता दल यूनाइटेड के गिने-चुने मंत्रियों को छोड़कर अधिकांश लोग अगले मंत्रिमंडल में अपनी जगह सुरक्षित करने की जुगत में जुटे हैं। मंत्री मदन सहनी ने तो सम्राट चौधरी को भावी मुख्यमंत्री तक घोषित कर दिया है। जहां तक निशांत को बिहार का मुख्यमंत्री या डिप्टी सीएम बनाने की बात हो रही है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी इस संभावना की हवा निकाल दे तो बड़ी बात नहीं होगी।

वैसे, देश में हो रहे चार राज्यों के चुनाव के कारण वह नीतीश समर्थकों का ध्यान रखते हुए निशांत के प्रचार-प्रसार में लगी है। सवाल सबसे अहम यह है कि जिस भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के स्लीपर सेल ने एक साल के ऑपरेशन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जैसे शक्तिशाली नेता को कमजोर कर दिया, उसके लिए निशांत को किनारे करना कितना आसान होगा, यह समझा जा सकता है।

जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के स्लीपर सेल ने पार्टी के एक उभरते हुए नेता मनीष वर्मा को कमजोर कर दिया, जो इस पार्टी के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते थे और भविष्य हो सकते थे। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह के बाद जनता दल यूनाइटेड में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पार्टी के लिए सबसे उपयोगी रहे। इसके बावजूद निशांत के लिए उन्हें खतरा बताकर बाहर का रास्ता दिखाने की कोशिश जारी है। इससे साफ जाहिर होता है कि भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड का स्लीपर सेल इस पार्टी को समाप्त करना चाहता है।

इसका बड़ा प्रमाण पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामचंद्र प्रसाद सिंह की वापसी पर लगा विराम है। यह प्रकरण भी जनता दल यूनाइटेड को मजबूत होने से रोकने की बड़ी साजिश का हिस्सा रहा।

इससे भी पीछे जाएं तो जनता दल यूनाइटेड में कुर्मी समाज से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बाद सबसे मजबूत नेता रहे ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार को कभी भी दल में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं दी गई और मंत्री के रूप में भी सीमित शक्तियां दी गईं। उन्हें पार्टी संगठन में तरजीह नहीं दी गई। उनकी भूमिका अधिकतर सेवक की ही रही। इसी तरह एमएलसी संजय गांधी को भी हमेशा सीमित भूमिका में रखा गया।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को छोड़कर जनता दल यूनाइटेड में हमेशा कुर्मी नेताओं को हाशिये पर रखा गया। रामचंद्र प्रसाद सिंह के बारे में जरूर चर्चा रही कि वे पार्टी के मुख्य कर्ताधर्ता हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में भी आंतरिक तौर पर स्लीपर सेल हमेशा भारी रहा। आज भी यही स्थिति पार्टी में बनी हुई है।

सच तो यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पिछड़ा, अति पिछड़ा, महादलित और सीमित रूप से अल्पसंख्यक वर्ग का वोट लिया, लेकिन उनके पूरे शासनकाल में पार्टी और सरकार दोनों के भीतर ये समाज हाशिये पर ही रहे। पार्टी की शुरुआत से लेकर अब तक स्लीपर सेल के लोग ही ताकतवर बने रहे। अधिकारी हों या पत्रकार, वे भी उसी वर्ग के लाभार्थी रहे, जिसे स्लीपर सेल कहा जा रहा है।