निलंबन जरूरी कदम, लेकिन निष्पक्ष जांच से यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि संबंध केवल मेलजोल तक था या मामला इससे आगे का है
बिहार में शराबबंदी को लागू हुए वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन इसकी सफलता को लेकर उठने वाले सवाल खत्म नहीं हुए। कभी शराब की बड़ी खेप पकड़ी जाती है, कभी तस्करी के नए रास्ते सामने आते हैं और कभी कानून लागू कराने वाली व्यवस्था के भीतर से ही ऐसी तस्वीर निकल आती है, जो पूरी मुहिम की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाती है। मुजफ्फरपुर में शराब कारोबार से जुड़े व्यक्ति के साथ एक सहायक अवर निरीक्षक का कथित तौर पर नाचते हुए वीडियो सामने आना ऐसी ही घटना है।
औराई थाना के डायल-112 में तैनात एएसआई विपिन सिंह का वीडियो वायरल होने और शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामले की जांच कराई। जांच में उनके साथ मौजूद व्यक्ति की पहचान दिलचंद राय के रूप में होने की बात सामने आई। पुलिस जांच के अनुसार, उसके खिलाफ शराब बरामदगी से संबंधित तीन मामलों में आरोप पत्र दाखिल होने का उल्लेख है। ऐसे व्यक्ति के साथ पुलिस अधिकारी का अनावश्यक मेलजोल यदि जांच में पाया जाता है, तो इसे केवल निजी व्यवहार कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
पुलिस और समाज के बीच सामान्य संपर्क स्वाभाविक है। किसी व्यक्ति के साथ दिखाई देना अपने आप में अपराध का प्रमाण भी नहीं है। लेकिन पुलिसकर्मी की जिम्मेदारी सामान्य नागरिक से अलग होती है। खासकर तब, जब सामने वाला व्यक्ति उसी अवैध कारोबार से जुड़े मामलों का आरोपी हो, जिसके खिलाफ कार्रवाई करना पुलिस की जिम्मेदारी है। ऐसी स्थिति में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है और पुलिस विभाग की साख प्रभावित होती है।
एसएसपी कांतेश कुमार मिश्र द्वारा एएसआई को तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है। इससे संदेश जाता है कि विभाग अपने कर्मियों के आचरण को लेकर जवाबदेही तय करने को तैयार है। लेकिन निलंबन को अंतिम समाधान नहीं माना जाना चाहिए। विभागीय जांच को यह स्पष्ट करना होगा कि दोनों के बीच संबंध की प्रकृति क्या थी और क्या इस मेलजोल का कभी पुलिस की कार्रवाई या शराब से जुड़े किसी मामले पर प्रभाव पड़ा। यदि ऐसा कोई तथ्य नहीं मिलता है तो वह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए।
यह प्रकरण बिहार की शराबबंदी के सामने मौजूद बड़ी चुनौती की ओर भी ध्यान खींचता है। कोई भी कानून केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और जब्ती के आंकड़ों से प्रभावी नहीं होता। उसकी ताकत इस भरोसे से बनती है कि उसे लागू करने वाले लोग स्वयं निष्पक्ष हैं। यदि शराब कारोबार से जुड़े लोगों और पुलिसकर्मियों के बीच संदिग्ध नजदीकी की घटनाएं सामने आती हैं तो सबसे अधिक नुकसान इसी भरोसे का होता है।
शराबबंदी जैसे कठोर कानून की सफलता के लिए पुलिस तंत्र की आंतरिक निगरानी भी उतनी ही जरूरी है, जितनी शराब तस्करों के खिलाफ कार्रवाई। संदिग्ध संपर्कों की समय रहते पहचान, शिकायतों की निष्पक्ष जांच और दोष साबित होने पर समान कार्रवाई ही व्यवस्था की विश्वसनीयता बचा सकती है।
मुजफ्फरपुर की घटना का संदेश इसलिए केवल एक एएसआई के निलंबन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। शराबबंदी की असली परीक्षा इस बात में है कि कानून सबके लिए समान दिखाई दे-शराब बेचने वाले के लिए भी और उसे रोकने की जिम्मेदारी निभाने वाले वर्दीधारी के लिए भी।