अब रसुवा की विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल को फिर दिया ऐसा जख्म, जिससे उबरने में लग सकता है लंबा वक्त

नेपाल से विजय कुमार गिरि : कभी राजमहल के भीतर चली गोलियों से पूरा देश सन्न रह गया, कभी लोकतंत्र की मांग लेकर लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। कभी कुछ मिनट तक कांपी धरती ने हजारों परिवार उजाड़ दिए तो कभी दिखाई न देने वाले एक विषाणु ने पूरे देश की रफ्तार रोक दी। इन जख्मों से नेपाल संभलता रहा, लेकिन समय ने उसे बार-बार नई परीक्षा के सामने खड़ा किया। पिछले वर्ष युवा पीढ़ी के आंदोलन ने सरकार तक बदल दी और अब रसुवा से निकले विनाशकारी जलप्रवाह ने नेपाल को एक बार फिर मातम, मलबे और अपनों की तलाश के बीच लाकर खड़ा कर दिया है।

पिछले करीब ढाई दशक में नेपाल ने राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों, सत्ता परिवर्तन, जनआंदोलन, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं के कई दौर देखे हैं। इनमें सात घटनाएं ऐसी हैं, जिनका असर केवल उस समय हुई मौतों या नुकसान तक सीमित नहीं रहा। इन्होंने नेपाल की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन पर गहरी छाप छोड़ी। राजदरबार हत्याकांड, लोकतंत्र के लिए जनआंदोलन, 2015 का विनाशकारी भूकंप, कोरोना महामारी, जाजरकोट भूकंप, युवा आंदोलन और अब रसुवा की बाढ़ नेपाल की सामूहिक स्मृति में ऐसे अध्याय बन चुके हैं, जिन्हें भुलाना आसान नहीं है।

एक जून 2001 की वह रात नेपाल शायद कभी नहीं भूल पाएगा। काठमांडू के नारायणहिटी राजदरबार में शाही परिवार के सदस्यों की हत्या ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या सहित राजपरिवार के कई सदस्यों की मौत ने नेपाल की राजशाही को गहरा आघात पहुंचाया। अचानक हुए इस हत्याकांड ने सत्ता और राजशाही के भविष्य को लेकर भी कई सवाल खड़े कर दिए। वर्षों बाद भी यह घटना नेपाल के इतिहास के सबसे दर्दनाक अध्यायों में गिनी जाती है।

इसके करीब पांच वर्ष बाद अप्रैल 2006 में नेपाल की सड़कें लोकतंत्र की मांग से गूंज उठीं। छह से 24 अप्रैल तक चले व्यापक जनआंदोलन में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतरे। राजशाही के प्रत्यक्ष शासन के खिलाफ बढ़ते जनदबाव के बीच तत्कालीन राजा ज्ञानेंद्र ने 24 अप्रैल को प्रतिनिधि सभा बहाल करने की घोषणा की। इस आंदोलन ने नेपाल की राजनीतिक दिशा बदलने में निर्णायक भूमिका निभाई और आगे चलकर राजशाही की समाप्ति तथा देश के संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनने का रास्ता तैयार हुआ।

नेपाल राजनीतिक बदलाव के इस दौर से गुजर ही रहा था कि 25 अप्रैल 2015 को प्रकृति ने ऐसा प्रहार किया, जिसने पूरे देश को हिला दिया। शक्तिशाली भूकंप ने काठमांडू घाटी सहित कई क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई। हजारों लोगों की जान गई, बड़ी संख्या में लोग घायल हुए और लाखों लोगों के घर प्रभावित हुए। सदियों पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरें भी मलबे में बदल गईं। भूकंप के बाद पुनर्निर्माण और विस्थापित परिवारों को फिर बसाना नेपाल के सामने लंबे समय तक बड़ी चुनौती बना रहा।

इसके करीब पांच वर्ष बाद 23 जनवरी 2020 को नेपाल में कोरोना संक्रमण के पहले मामले की पुष्टि हुई। शुरुआत में यह स्वास्थ्य संकट तक सीमित दिखाई दिया, लेकिन देखते ही देखते महामारी ने पूरे देश के जनजीवन को प्रभावित कर दिया। आवाजाही पर पाबंदियां लगीं, बाजार बंद हुए, रोजगार प्रभावित हुआ और स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा। पर्यटन पर काफी हद तक निर्भर नेपाल की अर्थव्यवस्था को भी महामारी के कारण बड़ा झटका लगा। बीमारी का असर कम होने के बाद भी इसके आर्थिक और सामाजिक प्रभाव लंबे समय तक महसूस किए गए।

महामारी के दौर से उबरने की कोशिश कर रहे नेपाल को तीन नवंबर 2023 की रात एक और प्राकृतिक आपदा ने झकझोर दिया। पश्चिमी नेपाल के जाजरकोट क्षेत्र में आए भूकंप ने बड़ी संख्या में परिवारों को उजाड़ दिया। जाजरकोट और रुकुम पश्चिम सहित आसपास के क्षेत्रों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ और हजारों मकान प्रभावित हुए। इस भूकंप ने एक बार फिर नेपाल की भौगोलिक संवेदनशीलता और भूकंपरोधी निर्माण की जरूरत को सामने ला दिया।

आठ और नौ सितंबर 2025 को नेपाल ने एक अलग तरह की उथल-पुथल देखी। इस बार सड़कों पर नई पीढ़ी थी। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और सामाजिक माध्यमों पर प्रतिबंध जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन तेजी से व्यापक हो गया। प्रदर्शन के दौरान हिंसा और मौतों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस आंदोलन ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि नेपाल की नई पीढ़ी शासन में जवाबदेही और अपने भविष्य को लेकर अब अधिक मुखर है।

इन पुराने जख्मों के बीच 26 अगस्त 2026 ने नेपाल के इतिहास में एक और भयावह तारीख जोड़ दी। रसुवा से शुरू हुई विनाशकारी बाढ़ ने देखते ही देखते कई जिलों में तबाही मचा दी। पानी के साथ आए मलबे ने घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को अपनी चपेट में ले लिया। तेज बहाव शवों और मलबे को घटनास्थल से काफी दूर निचले इलाकों तक ले गया।

आपदा की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एक सितंबर तक नेपाल में 987 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 3,916 लोग अब भी लापता बताए गए हैं। शव रसुवा के अलावा नुवाकोट, चितवन, नवलपरासी सहित कई जिलों से बरामद किए गए हैं। दूरदराज के क्षेत्रों और जलविद्युत परियोजनाओं में फंसे लोगों की तलाश जारी रहने के कारण मृतकों की संख्या में बदलाव की आशंका बनी हुई है।

बाढ़ ने केवल लोगों की जान ही नहीं ली, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका और वर्षों में तैयार हुई बुनियादी संरचनाओं को भी तहस-नहस कर दिया है। कई जलविद्युत परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं और बड़ी संख्या में कर्मचारी तथा मजदूर लापता लोगों में शामिल हैं। बचाव दल सुरंगों और मलबे में फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। 31 अगस्त तक 939 शव मिलने और 11 हजार से अधिक लोगों को बचाए जाने की जानकारी दी गई थी।

रसुवा की इस त्रासदी ने नेपाल के सामने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा किया है कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते प्राकृतिक खतरों के मुकाबले उसकी चेतावनी और आपदा प्रबंधन व्यवस्था कितनी तैयार है। शुरुआती अध्ययनों और रिपोर्टों में हिमनद क्षेत्र में बर्फ, चट्टान और मलबे के बड़े हिस्से के टूटने को विनाशकारी जलप्रवाह से जोड़ा गया है। हालांकि आपदा के कारणों को लेकर विस्तृत अध्ययन अभी जारी हैं।

इन सातों घटनाओं की प्रकृति अलग-अलग रही है। राजदरबार हत्याकांड सत्ता के शीर्ष पर हुई अभूतपूर्व त्रासदी थी तो जनआंदोलन राजनीतिक परिवर्तन की लड़ाई। कोरोना वैश्विक महामारी थी, जबकि भूकंप और बाढ़ ने नेपाल की भौगोलिक संवेदनशीलता को सामने रखा। युवा आंदोलन ने नई पीढ़ी की बेचैनी और बदलती राजनीतिक अपेक्षाओं को आवाज दी।

हर संकट के बाद नेपाल के सामने खुद को फिर खड़ा करने की चुनौती आई और वहां के लोगों ने उसका सामना किया। नारायणहिटी राजदरबार की गोलियों से लेकर रसुवा में पानी और मलबे के सैलाब तक इन सात अध्यायों ने नेपाल को बदला भी है और कई ऐसे सवाल भी छोड़े हैं, जिनके जवाब उसे आने वाले वर्षों में तलाशने होंगे।