चीनी के बढ़ते दाम का असर अब घर की रसोई से चाय की दुकानों तक। एथनॉल पर सियासी बहस, मगर घटता गन्ना उत्पादन भी बड़ी चिंता
भारत में महंगाई का अहसास हमेशा बड़े आंकड़ों से नहीं होता। कभी वह सब्जी के थैले में दिखाई देती है, कभी दाल की कटोरी में और कभी सड़क किनारे मिलने वाली चाय की प्याली में। चीनी महंगी हुई तो उसकी कड़वाहट अब चाय की चुस्की तक पहुंचने लगी है। चाय दुकानदारों की लागत बढ़ी है और इसका असर चाय की कीमत पर पड़ना स्वाभाविक है। घर की रसोई का हिसाब भी बिगड़ रहा है। ऐसे में चीनी के बढ़ते दाम को बाजार का सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर छोड़ देना उचित नहीं होगा।
चीनी की महंगाई के साथ एथनॉल पर सियासी बहस भी तेज हुई है। विपक्ष का आरोप है कि पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने के लिए गन्ने और चीनी आधारित कच्चे माल का इस्तेमाल बढ़ा है, जिससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई। यह सवाल उठना स्वाभाविक है, क्योंकि गन्ना चीनी और एथनॉल दोनों का महत्वपूर्ण स्रोत है। मगर महंगाई की पूरी जिम्मेदारी केवल एथनॉल पर डाल देना समस्या की अधूरी तस्वीर पेश करना होगा।
असल चिंता खेत से शुरू होती है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022-23 में देश में करीब 59 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती थी। 2024-25 में यह रकबा घटकर लगभग 54.5 लाख हेक्टेयर रह गया। केवल दो वर्षों में करीब 4.5 लाख हेक्टेयर की कमी बड़ा संकेत है। इसी अवधि में गन्ने का उत्पादन भी करीब 49 करोड़ टन से घटकर लगभग 45.3 करोड़ टन रह गया। जब खेत में गन्ना कम पैदा होगा तो मिलों से अधिक चीनी बाजार में आने की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
इसके साथ पेराई सत्र छोटा होना, निर्यात और जमाखोरी जैसे कारण भी बाजार में उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। यदि उत्पादन घटे और व्यापारी कीमत बढ़ने की आशंका में माल रोकने लगें तो वास्तविक कमी से पहले ही बाजार में कृत्रिम दबाव पैदा हो सकता है। इसलिए सरकार को उत्पादन के साथ भंडारण और आपूर्ति शृंखला पर भी पैनी नजर रखनी होगी।
एथनॉल नीति को खारिज करना इसका समाधान नहीं है। भारत को पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता घटानी है और एथनॉल इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे किसानों और चीनी मिलों के लिए कमाई का अतिरिक्त रास्ता भी खुलता है। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा की नीति ऐसी होनी चाहिए कि उसका असर खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता और कीमतों पर असंतुलित रूप से न पड़े। पेट्रोल में एथनॉल बढ़े, लेकिन रसोई से चीनी गायब होने लगे या उसके भाव आम आदमी की पहुंच से बाहर होने लगें तो नीति की समीक्षा जरूरी हो जाती है।
सरकार को सबसे पहले यह समझना होगा कि गन्ने की खेती का रकबा क्यों घट रहा है?' किसानों की लागत, सिंचाई, फसल जोखिम और समय पर भुगतान जैसे सवालों का समाधान खेत के स्तर पर करना होगा। उत्पादन बढ़ाने के साथ जमाखोरी पर सख्ती और घरेलू मांग तथा निर्यात के बीच संतुलन भी आवश्यक है।
चीनी केवल मिठाई और त्योहारों की जरूरत नहीं है। गांव के मजदूर से लेकर शहर के कर्मचारी तक करोड़ों लोगों की दिनचर्या चाय की प्याली से जुड़ी है। इसलिए चीनी की महंगाई को केवल टन और प्रतिशत में नहीं देखा जा सकता। इसका असली पैमाना उस परिवार की रसोई है, जो पहले ही रोजमर्रा की बढ़ती लागत से जूझ रहा है।
देश को ऊर्जा आत्मनिर्भरता चाहिए, किसान को बेहतर आमदनी और उद्योग को मजबूती भी चाहिए। मगर इन सबके बीच आम आदमी की चाय की मिठास बचाए रखना भी जरूरी है। अच्छी नीति वही है जिसमें विकास की मिठास आंकड़ों से निकलकर आम आदमी की चाय की प्याली तक पहुंचे।