सुप्रीम कोर्ट ने संयुक्त परिवारों के खत्म होने से रिश्तों की नींव कमजोर पड़ने की आशंका व्यक्त की
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी केवल एक न्यायिक टिप्पणी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आई गंभीर चेतावनी है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि बच्चों के जीवन में माता-पिता और परिवार की जगह मोबाइल तथा अन्य गैजेट्स लेने लगेंगे तो इसके परिणाम दूरगामी और विनाशकारी होंगे। यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब पारिवारिक रिश्तों में बढ़ती दूरियां, दांपत्य जीवन में तनाव और संवेदनहीनता से जुड़ी घटनाएं लगातार समाज को झकझोर रही हैं। हाल के वर्षों में सामने आए कई चर्चित अपराधों ने भी यह सवाल खड़ा किया है कि क्या आधुनिक जीवन की दौड़ में हम रिश्तों की बुनियाद खोते जा रहे हैं।
भारतीय समाज की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसका संयुक्त परिवार रहा है। यह केवल साथ रहने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि संस्कार, अनुशासन, सहनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी की पहली पाठशाला थी। दादा-दादी की सीख, बड़ों का अनुभव और परिवार के बीच होने वाला संवाद बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ता था। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, व्यस्त जीवनशैली और एकल परिवारों के विस्तार ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया है। आज अनेक घरों में बच्चों को समय देने के बजाय मोबाइल थमा देना आसान समाधान माना जाने लगा है। यह सुविधा भले कुछ समय के लिए माता-पिता का काम आसान कर दे, लेकिन लंबे समय में बच्चे के भावनात्मक और सामाजिक विकास पर इसका गंभीर असर पड़ता है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक और महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान दिलाया कि आज की पीढ़ी पहले से अधिक शिक्षित, तकनीकी रूप से सक्षम और सूचनाओं से संपन्न है, लेकिन मानसिक दबाव और रिश्तों की जटिलताओं को संभालने की क्षमता कमजोर होती दिखाई दे रही है। छोटी-छोटी असहमतियां बड़े विवादों में बदल रही हैं। धैर्य, संवाद और समझौते की भावना कम होती जा रही है। यही कारण है कि पारिवारिक विवाद अब कई बार भयावह घटनाओं का रूप ले लेते हैं। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का भी विषय है।
अदालत की यह चिंता भी पूरी तरह उचित है कि आज सोशल मीडिया और व्हाट्सएप जैसे माध्यमों पर प्रसारित हर जानकारी को बिना जांचे-परखे सच मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सूचना और ज्ञान में अंतर होता है। इंटरनेट जानकारी दे सकता है, लेकिन विवेक, संवेदना और जीवन मूल्यों का निर्माण केवल परिवार, समाज और शिक्षा मिलकर करते हैं। यदि बच्चे का अधिकांश समय स्क्रीन के साथ बीतेगा और परिवार के साथ संवाद सीमित रह जाएगा, तो उसके व्यक्तित्व में स्वाभाविक रूप से भावनात्मक रिक्तता पैदा होगी।
तकनीक आधुनिक जीवन की आवश्यकता है और उससे दूरी बनाना न तो संभव है और न ही उचित। लेकिन तकनीक का उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, जीवन का विकल्प बनने के लिए नहीं। माता-पिता यदि बच्चों के साथ प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल के बिताएं, परिवार में साथ बैठकर भोजन करने और खुलकर बातचीत करने की परंपरा को जीवित रखें, तो यह किसी भी डिजिटल उपकरण से अधिक प्रभावी निवेश होगा। स्कूलों और समाज को भी बच्चों में सहानुभूति, धैर्य, संवाद और पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने की दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे।
सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी को केवल एक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करना बड़ी भूल होगी। यह उस समाज का आईना है, जहां सुविधाएं बढ़ रही हैं, लेकिन रिश्ते सिकुड़ते जा रहे हैं। यदि परिवारों में संवाद, विश्वास और साथ रहने की संस्कृति को बचाने के लिए अभी प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढ़ियां आधुनिक तकनीक की हर सुविधा तो हासिल कर लेंगी, लेकिन रिश्तों की गर्माहट, अपनापन और सामाजिक संवेदनाओं से वंचित रह जाएंगी। किसी भी सभ्य समाज की असली ताकत उसकी तकनीक नहीं, बल्कि उसके परिवार और मानवीय रिश्ते होते हैं।