FIR रद कराने की मांग नहीं मानी, कानूनी मुश्किलें बरकरा, हाई कोर्ट के फैसले पर भी सुप्रीम कोर्ट ने लगाई मुहर
नई दिल्ली। बिहार के चर्चित ‘नौकरी के बदले जमीन’ प्रकरण में राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू प्रसाद यादव को शीर्ष अदालत से बड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके और परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को निरस्त करने की मांग वाली याचिका को सोमवार को अस्वीकार कर दिया, जिससे इस मामले में उनकी कानूनी चुनौतियां और बढ़ गई हैं।
हालांकि अदालत की पीठ, जिसमें जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह शामिल थे, ने कुछ राहत देते हुए यह स्पष्ट किया कि ट्रायल के दौरान उन्हें व्यक्तिगत रूप से हर सुनवाई में उपस्थित रहने की अनिवार्यता नहीं होगी।
इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट भी 24 मार्च को इसी मामले में प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर चुका था। हाई कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी थी कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति के अभाव में जांच एजेंसी की कार्रवाई अमान्य हो जाती है।
यह पूरा मामला उस अवधि से जुड़ा है जब 2004 से 2009 के बीच लालू यादव रेल मंत्री थे। आरोप है कि उस दौरान भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य क्षेत्र, खासकर मध्य प्रदेश के जबलपुर में, ग्रुप D की नियुक्तियों के बदले कुछ लोगों से जमीन ली गई। बाद में यह जमीन यादव परिवार या उनके करीबी लोगों के नाम पर ट्रांसफर की गई।
यादव की ओर से अदालत में यह तर्क रखा गया था कि जांच की प्रक्रिया, प्राथमिकी और बाद में दायर आरोपपत्र, सभी धारा 17A के प्रावधानों का पालन किए बिना तैयार किए गए हैं, इसलिए उन्हें कानूनी मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
इससे पहले जनवरी 2026 में दिल्ली की राउज एवेन्यू स्पेशल कोर्ट ने इस मामले में 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय किए थे। केंद्रीय जांच एजेंसी ने इस प्रकरण में यादव परिवार पर गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं।
अब शीर्ष अदालत के ताजा फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि मामले की सुनवाई निचली अदालत में जारी रहेगी, और आने वाले समय में इस केस की कानूनी दिशा और भी अहम हो सकती है।
