सफाहोड़ आंदोलन से जुड़ा लम्बोदर मुखर्जी का नाम, आदिवासी समाज में जगाई अधिकारों की चेतना

पूर्वी चम्पारण : आज जब स्वतंत्रता दिवस पर शहरों से गांवों तक तिरंगा लहराता है, तब आजादी के उन रास्तों को भी याद करने की जरूरत है जो संसद, सभागारों और बड़े शहरों से होकर नहीं, बल्कि घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच से गुजरे थे। इन रास्तों पर न बड़े मंच थे और न इतिहास लिखने वालों की भीड़। फिर भी यहां अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ आवाज उठ रही थी। संथाल परगना की धरती पर इसी दौर में एक ऐसा नाम आदिवासी समाज के बीच उभरा, जिसे लोकस्मृतियों ने लम्बोदर मुखर्जी से आगे बढ़ाकर ‘मारंग बाबा’ की पहचान दे दी। उनके साथ कदम मिलाने वाली उषारानी मुखर्जी को लोगों ने ‘संथाल माता’ के रूप में याद किया।

यह वह समय था जब 1930 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन देश के अलग-अलग हिस्सों में नई ताकत हासिल कर रहा था। अंग्रेजी शासन के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन तेज हो रहे थे और स्वतंत्रता की आकांक्षा दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच रही थी। संथाल परगना भी इससे अछूता नहीं था। यहां सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना के साथ अंग्रेजी शासन के प्रति विरोध की भावना आकार ले रही थी।

.इसी पृष्ठभूमि में लम्बोदर मुखर्जी की सक्रियता सामने आती है। उपलब्ध ऐतिहासिक संदर्भों में उनका नाम सफाहोड़ आंदोलन से जुड़ा मिलता है। दुमका और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में इस आंदोलन के माध्यम से लोगों के बीच चेतना पैदा करने वाले व्यक्तियों में उनका उल्लेख किया जाता है। सफाहोड़ आंदोलन की अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि थी, लेकिन समय के साथ उसके भीतर औपनिवेशिक व्यवस्था के प्रति असहमति और स्वाभिमान की भावना को भी बल मिला।

लम्बोदर मुखर्जी की भूमिका को केवल अंग्रेजों के खिलाफ राजनीतिक विरोध के दायरे में देखना इस कहानी को अधूरा कर देगा। उनसे जुड़ी स्मृतियों में आदिवासी समाज को जमीन, जंगल, परंपरा और अपनी पहचान के प्रति सजग करने की कोशिशों का भी उल्लेख मिलता है। उस समय आदिवासी जीवन के लिए जंगल और जमीन केवल जीविका के साधन नहीं थे, बल्कि उनकी संस्कृति और सामाजिक अस्तित्व का आधार भी थे। इसलिए अधिकार और स्वाभिमान की चेतना उनके संघर्ष का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती गई।

वर्ष 1935 में लम्बोदर मुखर्जी के जीवन में उषारानी मुखर्जी आईं। विवाह के बाद उषारानी केवल उनकी जीवनसंगिनी बनकर नहीं रहीं, बल्कि उनसे जुड़ी सामाजिक गतिविधियों और आदिवासी समाज के बीच चल रहे प्रयासों में उनकी सहभागिता की कहानियां भी स्थानीय स्मृतियों में जगह बनाती गईं। समय बीतने के साथ संथाल समुदाय के बीच इस दंपती को लेकर कई कथाएं प्रचलित हुईं।

यही लोकस्मृतियां लम्बोदर मुखर्जी को ‘मारंग बाबा’ और उषारानी मुखर्जी को ‘संथाल माता’ के रूप में याद करती हैं। किसी व्यक्ति को समाज की ओर से ऐसा संबोधन मिलना अपने आप में उस भावनात्मक रिश्ते को दिखाता है, जो वर्षों के संपर्क और सामाजिक जुड़ाव से बना होगा। हालांकि इनसे जुड़ी अलग-अलग घटनाओं और विवरणों की ऐतिहासिक पुष्टि में स्रोतों के बीच अंतर मिल सकता है, इसलिए लोककथाओं और दस्तावेजी इतिहास के बीच अंतर को समझना भी जरूरी है।

स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी इन स्मृतियों में तिरंगे का प्रसंग भी महत्वपूर्ण है। संथाल परगना के आदिवासी क्षेत्रों में राष्ट्रीय चेतना पहुंचाने, लोगों को एकजुट करने और अंग्रेजी शासन के विरोध में खड़ा करने से संबंधित कई कथाएं स्थानीय स्तर पर सुनाई जाती रही हैं। इन्हीं में मुखर्जी दंपती के अंग्रेजी शासन से टकराव और गिरफ्तारी से संबंधित प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है।

इन कहानियों का महत्व केवल यह साबित करने में नहीं है कि कौन-सी घटना किस तारीख को और ठीक किस स्थान पर हुई थी। इनका बड़ा महत्व इसलिए है क्योंकि ये भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की उस व्यापक तस्वीर की ओर ध्यान खींचती हैं, जिसमें आदिवासी समाज केवल दर्शक नहीं था। देश के अलग-अलग आदिवासी क्षेत्रों में औपनिवेशिक नीतियों, जमीन के सवाल और सामाजिक-सांस्कृतिक हस्तक्षेप के खिलाफ प्रतिरोध की अपनी लंबी परंपरा रही है।

आजादी के इतिहास में बड़े नेताओं, प्रमुख आंदोलनों और ऐतिहासिक घटनाओं की चर्चा स्वाभाविक रूप से अधिक होती है। लेकिन स्वतंत्रता का संघर्ष केवल प्रसिद्ध चेहरों के बूते नहीं लड़ा गया। हजारों ऐसे लोग भी इस यात्रा का हिस्सा बने जिनके नाम राष्ट्रीय इतिहास की मुख्यधारा में बहुत कम जगह पा सके। किसी ने अंग्रेजों का खुला विरोध किया, किसी ने गांवों में लोगों को संगठित किया तो किसी ने समाज के भीतर स्वाभिमान और अधिकार की चेतना जगाई।

लम्बोदर मुखर्जी और उषारानी मुखर्जी से जुड़ी संथाल परगना की स्मृतियां इसी भूले-बिसरे इतिहास की एक खिड़की खोलती हैं। एक तरफ ‘मारंग बाबा’, दूसरी तरफ ‘संथाल माता’ और इनके बीच एक ऐसा आदिवासी समाज, जो अपनी मिट्टी और पहचान को बचाते हुए देश में उठ रही स्वतंत्रता की आवाज से जुड़ रहा था।

15 अगस्त को लाल किले से लेकर देश के सबसे छोटे गांव तक जब राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा, तब संथाल परगना के जंगलों में कभी पहुंची उस आजादी की पुकार को याद करना भी जरूरी है। स्वतंत्र भारत की कहानी तभी पूरी दिखाई देती है, जब उसमें महानगरों के आंदोलनों के साथ जंगल-पहाड़ों में लड़ी गई लड़ाइयों और उन गुमनाम लोगों की स्मृतियों को भी जगह मिले, जिन्होंने अपने-अपने हिस्से का प्रतिरोध किया था।