नेपाल में ग्लेशियर और पहाड़ी मलबे से आई विनाशलीला ने बढ़ाई भारत की चिंता, पानी के साथ चट्टानों और मलबे का सैलाब बना तबाही का कारण
पूर्वी चम्पारण : पहाड़ों की खूबसूरत वादियां हमेशा से इंसान को अपनी ओर खींचती रही हैं। कहीं पहाड़ काटकर सड़कें बनीं, कहीं ढलानों पर होटल और मकान खड़े हो गए तो कहीं नदियों के बिल्कुल करीब शहर फैलते चले गए। मैदानों में भी इंसान पीछे नहीं रहा। पुरानी नदियां सिकुड़ीं, तालाब पाटे गए, नालों पर मकान खड़े हुए और पानी के प्राकृतिक रास्तों पर बस्तियां बसती चली गईं। वर्षों तक सब ठीक चलता रहा तो यह भरोसा भी मजबूत होता गया कि शायद प्रकृति ने अपना पुराना रास्ता छोड़ दिया है। लेकिन नेपाल में आई विनाशलीला ने इस भ्रम को एक झटके में तोड़ दिया है।
पहाड़ से जब पानी अकेला नहीं, बल्कि अपने साथ बर्फ, पत्थर, चट्टान और भारी मलबा लेकर नीचे उतरा तो रास्ते में आने वाली बस्तियों और संरचनाओं के लिए संभलना मुश्किल हो गया। देखते ही देखते नदियों का शांत दिखाई देने वाला बहाव विनाशकारी प्रवाह में बदल गया। नेपाल की इस त्रासदी ने फिर साबित किया कि हिमालय की ऊंचाइयों पर होने वाली किसी बड़ी प्राकृतिक हलचल को केवल पहाड़ की समस्या मान लेना गंभीर भूल हो सकती है।
घटना के शुरुआती दौर में भूकंप की भी चर्चा हुई, लेकिन बाद में सामने आए वैज्ञानिक विश्लेषण ने ग्लेशियर से जुड़े पहाड़ी हिस्से के टूटने और उससे पैदा हुए विशाल मलबा-प्रवाह की ओर संकेत किया। पहाड़ से नीचे आया मलबा जलधाराओं और नदियों में मिलकर और खतरनाक होता चला गया। पानी के साथ बहती चट्टानों, मिट्टी और पत्थरों ने रास्ते में भारी तबाही मचाई।
इस आपदा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई, अनेक लोग लापता हुए और हजारों लोगों को प्रभावित इलाकों से निकालना पड़ा। मलबे और पानी का बहाव इतना भयावह था कि शव भी काफी दूर तक बहकर पहुंचे। कई स्थानों पर पहचान तक मुश्किल हो गई। राहत और बचाव दलों को दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में जिंदगी तलाशने के लिए कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
लेकिन नेपाल में जो हुआ, उसे भारत केवल पड़ोसी देश की त्रासदी समझकर भूल नहीं सकता। हिमालय से निकलने वाली नदियां राजनीतिक सीमाओं से बंधी नहीं हैं। ऊपरी क्षेत्रों में होने वाली प्राकृतिक हलचल का असर नीचे की नदी घाटियों तक पहुंच सकता है। नेपाल से निकलकर आने वाली कई नदियां बिहार के विशाल मैदानी क्षेत्रों से गुजरती हैं। इसलिए हिमालय में पैदा होने वाले असामान्य जलप्रवाह और मलबे की घटनाएं भारत के लिए भी चेतावनी हैं।
चिंता केवल पहाड़ों से आने वाले पानी की नहीं है। इससे बड़ा सवाल यह भी है कि हमने अपने शहरों और गांवों में पानी के प्राकृतिक रास्तों के साथ क्या किया है। जिन स्थानों से कभी बरसात और बाढ़ का अतिरिक्त पानी गुजरता था, वहां मकान खड़े हो रहे हैं। पुराने तालाब सिकुड़ रहे हैं। नालों की चौड़ाई कम हो रही है और नदियों की पुरानी धारों के आसपास तेजी से बसावट बढ़ रही है।
सामान्य मौसम में यह बदलाव शायद ज्यादा खतरनाक दिखाई नहीं देता। मकान सुरक्षित रहते हैं, सड़कें चलती रहती हैं और लोग धीरे-धीरे भूल जाते हैं कि जिस जमीन पर वे रह रहे हैं, वहां कभी पानी का रास्ता हुआ करता था। असली खतरा तब पैदा होता है जब किसी वर्ष असाधारण बारिश होती है या ऊपरी क्षेत्र से अचानक बहुत अधिक पानी नीचे पहुंचता है।
पूर्वी चम्पारण और मोतिहारी भी इस सवाल से अछूते नहीं हैं। मोतिहारी की रामरेखा नदी के पुराने स्वरूप और उसके आसपास बढ़ते निर्माण को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पुरानी नदी धाराओं और प्राकृतिक जलनिकासी वाले निचले इलाकों में बसावट बढ़ती दिखाई देती है। आज वहां खड़े मकान सामान्य दिनों में सुरक्षित नजर आते हैं, लेकिन सवाल भविष्य का है।
नदियों के सामने संकट दो तरफ से बढ़ रहा है। एक तरफ उनके तल में गाद और मलबा जमा होता जा रहा है, दूसरी तरफ किनारों और प्राकृतिक फैलाव वाले क्षेत्रों में इंसानी दखल बढ़ रहा है। नदी के पास पानी समेटने और फैलने की जगह जितनी कम होगी, असामान्य स्थिति में उसका दबाव उतना ही खतरनाक हो सकता है।
इंसान जमीन का नक्शा बदल सकता है, लेकिन नदी की स्मृति मिटाना आसान नहीं। कोई पुरानी जलधारा वर्षों तक सूखी रह सकती है। वहां सड़क बन सकती है, बाजार सज सकता है और पूरी कॉलोनी खड़ी हो सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रकृति ने हमेशा के लिए वह रास्ता छोड़ दिया। किसी असाधारण बारिश या अचानक आई बाढ़ में पानी फिर उसी ढलान और उसी पुराने रास्ते की ओर लौट सकता है।
तब सबसे बड़ा सवाल होगा कि पानी जाएगा कहां? जिस तालाब को भरकर मकान बना दिया गया, वहां आने वाला पानी कहां ठहरेगा? जिस नाले को संकरा कर दिया गया, वहां से बारिश का पानी कैसे निकलेगा? जिस नदी के प्राकृतिक फैलाव क्षेत्र में बस्तियां खड़ी हो गईं, वहां अचानक आए अतिरिक्त पानी के लिए जगह कहां बचेगी?
यही नेपाल की त्रासदी से मिलने वाली सबसे बड़ी चेतावनी है। प्राकृतिक आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, लेकिन उन्हें इंसानी लापरवाही से और विनाशकारी बनने से जरूर रोका जा सकता है। हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण से पहले पहाड़ों की संवेदनशीलता समझनी होगी और मैदानी क्षेत्रों में विकास की योजना बनाते समय नदी, तालाब, नाले और पुराने जलनिकासी क्षेत्रों को खाली जमीन मानने की सोच बदलनी होगी।
अब तैयारी का अर्थ केवल बाढ़ आने के बाद नाव उतारना, राहत शिविर खोलना और मुआवजा बांटना नहीं होना चाहिए। पुराने नदी मार्गों की पहचान, तालाबों और प्राकृतिक जलनिकासी क्षेत्रों का संरक्षण, नदियों के बहाव क्षेत्र को अतिक्रमण से बचाना और संवेदनशील इलाकों में निर्माण से पहले प्राकृतिक जोखिम का आकलन जरूरी है।
नेपाल में प्रकृति ने एक भयावह तस्वीर दिखा दी है। भारत के लिए यह समय उस तस्वीर को देखकर भविष्य की तैयारी करने का है। क्योंकि पानी पासपोर्ट लेकर सीमा पार नहीं करता और नदी नक्शे पर खींची इंसानी लकीरों से नहीं चलती। उसका रास्ता प्रकृति तय करती है।
आज नेपाल ने उसकी ताकत देखी है। कल वही पानी अगर हमारे शहरों और गांवों में अपना पुराना रास्ता खोजने पहुंचा, तब शायद यह सोचने का समय भी न मिले कि गलती आखिर हुई कहां थी।