1917 में गांधी को चंपारण छोड़ने का मिला था अंग्रेजी हुकूमत का आदेश, मगर सत्याग्रह ने झुका दी सत्ता। गांव-गांव तक पहुंची आजादी की लड़ाई

पूर्वी चंपारण : तारीख थी 16 अप्रैल 1917। अंग्रेजी हुकूमत ने महात्मा गांधी को साफ आदेश दिया कि वह चंपारण में न रहें और अगली उपलब्ध ट्रेन से जिला छोड़ दें। तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट डब्लू.बी. हेडकॉक को आशंका थी कि गांधी की मौजूदगी से लोक शांति को खतरा हो सकता है और गंभीर उपद्रव हो सकता है। लेकिन अंग्रेज जिस गांधी को चंपारण से बाहर भेजना चाहते थे, उन्हीं गांधी ने यहां किसानों की आवाज बनकर ऐसा सत्याग्रह खड़ा किया, जिसने अंग्रेजी सत्ता को झुकने पर मजबूर कर दिया। चंपारण में 1917 में उठी संघर्ष की यही चिंगारी आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन की बड़ी ताकत बनी और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहार विद्रोह की आग में धधक उठा।

चंपारण के किसान उस समय अंग्रेज नीलहे साहबों के अत्याचार से त्रस्त थे। किसानों को अपनी जमीन के 3/20 हिस्से पर नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था। तीनकठिया प्रथा के नाम से कुख्यात इस व्यवस्था में मेहनत और जमीन किसानों की थी, लेकिन उन्हें फसल का उचित मूल्य नहीं मिलता था। लगातार आर्थिक शोषण ने उनकी कमर तोड़ दी थी।

किसानों की इसी पीड़ा को लेकर राजकुमार शुक्ल महात्मा गांधी तक पहुंचे और उनसे चंपारण आने का आग्रह किया। अप्रैल 1917 में गांधी चंपारण पहुंचे और किसानों की समस्याएं सुननी शुरू कीं। उनके साथ डॉ. राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद और जे.बी. कृपलानी सहित कई प्रमुख नेता जुड़े। किसानों के बयान दर्ज होने लगे और अंग्रेजी व्यवस्था के खिलाफ सत्य और अहिंसा के रास्ते संघर्ष आकार लेने लगा।

गांधी की गतिविधियों से अंग्रेजी प्रशासन बेचैन हो उठा। 16 अप्रैल 1917 को तत्कालीन जिला मजिस्ट्रेट डब्लू.बी. हेडकॉक ने उन्हें चंपारण छोड़ने का आदेश जारी कर दिया। गांधी के सामने रास्ता साफ था या तो सरकारी आदेश मानकर किसानों को छोड़कर चले जाएं या फिर परिणाम की चिंता किए बिना उनके साथ खड़े रहें। गांधी ने दूसरा रास्ता चुना। उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई का सामना किया, लेकिन किसानों की लड़ाई छोड़कर चंपारण से जाने को तैयार नहीं हुए।

यही वह मोड़ था, जिसने चंपारण के किसानों की लड़ाई को राष्ट्रीय महत्व दे दिया। गांधी ने किसानों की समस्याओं और अंग्रेज नीलहे साहबों के शोषण को सामने लाया। संगठित और अहिंसक आंदोलन का दबाव बढ़ा और आखिरकार अंग्रेजी शासन को तीनकठिया प्रथा समाप्त करने की दिशा में कदम उठाने पड़े। चंपारण ने देश को दिखा दिया कि संगठित जनशक्ति बिना हथियार उठाए भी सत्ता को झुकने पर मजबूर कर सकती है।

करीब 25 वर्ष बाद 1942 में गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया तो बिहार फिर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष की अग्रिम पंक्ति में खड़ा था। इस बार आंदोलन शहरों तक सीमित नहीं रहा। इसकी लहर गांव-गांव पहुंच गई। किसानों ने कई क्षेत्रों में लगान देने से इनकार किया, विद्यार्थियों ने शिक्षण संस्थानों का बहिष्कार किया और युवाओं ने भूमिगत होकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया।

9 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद अंग्रेजों को लगा कि आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन बिहार में इसका उलटा असर हुआ। नेताओं के जेल जाने के बावजूद विरोध की आग और तेज होती चली गई। इसके दो दिन बाद पटना में हुई एक घटना ने पूरे बिहार को झकझोर दिया।

11 अगस्त को पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने के लिए निकले छात्रों पर पुलिस ने गोलियां चला दीं। उमाकांत प्रसाद, रामानंद सिंह, सतीश प्रसाद झा, जगतपति कुमार, देवीपद चौधरी, राजेंद्र सिंह और रामगोविंद सिंह शहीद हो गए। सात नौजवानों की इस शहादत ने आंदोलन को नई आग दे दी। विरोध विद्यार्थियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गांवों और आम जनता के बीच जनविद्रोह का रूप लेने लगा।

जगह-जगह प्रदर्शन हुए, सरकारी संस्थानों का बहिष्कार किया गया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ता गया। आंदोलन को दबाने के लिए गिरफ्तारियों और दमन का सहारा लिया गया, लेकिन बिहार में आजादी की आवाज लगातार बुलंद होती रही।

इसी दौर में जयप्रकाश नारायण ने हजारीबाग सेंट्रल जेल से निकलकर भूमिगत आंदोलन को नई धार दी। उन्होंने साथियों के साथ आजाद दस्ता संगठित किया। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में भूमिगत गतिविधियां तेज हुईं और अंग्रेजी शासन के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई। कई स्थानों पर संचार व्यवस्था बाधित हुई और सरकारी तंत्र के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ा।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बिहार में 33,813 गिरफ्तारियों, 1,817 लोगों के शहीद होने और 2,804 लोगों के घायल होने का उल्लेख मिलता है। इन आंकड़ों के पीछे हजारों परिवारों की पीड़ा और आजादी के लिए दी गई कुर्बानियों की लंबी कहानी छिपी है।

1917 का चंपारण सत्याग्रह हो या 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, बिहार की धरती ने स्वतंत्रता संघर्ष को निर्णायक ताकत दी। चंपारण ने गांधी के सत्याग्रह को जमीन दी तो 1942 में बिहार के विद्यार्थियों, किसानों, युवाओं और आम लोगों ने आजादी की लड़ाई को व्यापक जनप्रतिरोध में बदल दिया।

आजादी के इतिहास में चंपारण इसलिए केवल गांधी के पहले सत्याग्रह की धरती नहीं, बल्कि उस जनशक्ति का प्रतीक भी है जिसने अंग्रेजी हुकूमत को बता दिया था कि भारत को अब ज्यादा दिनों तक गुलाम रखना संभव नहीं है।