विश्व शेर दिवस : भूपेंद्र यादव ने वन अधिकारियों, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों के प्रयासों को दिया श्रेय

नई दिल्ली : कभी सीमित क्षेत्र में सिमटती जा रही एशियाई शेरों की आबादी अब भारत में नई ताकत के साथ अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है। पिछले एक दशक में इनकी संख्या में करीब 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2015 में देश में 523 एशियाई शेर थे, जबकि 2025 में इनकी संख्या बढ़कर 891 हो गई। यानी महज दस वर्षों में 368 शेर बढ़े हैं। विश्व शेर दिवस पर सामने आए ये आंकड़े न सिर्फ वन्यजीव संरक्षण की बड़ी उपलब्धि की कहानी कहते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि बेहतर पर्यावास, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से विलुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण में बड़े बदलाव संभव हैं।

विश्व शेर दिवस के अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने एशियाई शेरों के संरक्षण में मिली इस सफलता की सराहना की। उन्होंने वन्यजीव और जैव-विविधता संरक्षण के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए इस उपलब्धि का श्रेय वन अधिकारियों, संरक्षणवादियों, स्थानीय समुदायों और शेरों की सुरक्षा में जुटे लोगों को दिया।

आंकड़ों पर नजर डालें तो एक दशक में एशियाई शेरों की आबादी में लगभग 70 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। संख्या बढ़ने के साथ उनका दायरा भी लगातार विस्तृत हुआ है। वर्ष 2020 के बाद शेरों का क्षेत्र करीब 30 हजार वर्ग किलोमीटर से बढ़कर लगभग 35 हजार वर्ग किलोमीटर हो गया है। करीब पांच हजार वर्ग किलोमीटर का यह विस्तार शेर संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।

भूपेंद्र यादव ने कहा कि एशियाई शेरों के संरक्षण में भारत की सफलता वन्यजीवों और जैव-विविधता की रक्षा के प्रति देश की गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उन्होंने प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखने और आने वाली पीढ़ियों तक एशियाई शेरों की मौजूदगी सुनिश्चित करने के संकल्प को दोहराया।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने भी विश्व शेर दिवस पर भारत के संरक्षण प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया। उनके मुताबिक महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा, संरक्षण कार्यक्रमों को मजबूत करने और इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने के प्रयासों ने दिखाया है कि विकास और प्रकृति को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सकता है।

एशियाई शेरों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में केंद्र सरकार ने 2020 में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2020 को शेरों के दीर्घकालिक संरक्षण के उद्देश्य से प्रोजेक्ट लायन की घोषणा की थी। इसके बाद संरक्षण को केवल शेरों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रखने के बजाय उनके पूरे प्राकृतिक क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ाया गया।

प्रोजेक्ट लायन के तहत शेरों के पर्यावास में सुधार के साथ रोगों की निगरानी और पशु चिकित्सा सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। शेरों की संख्या और गतिविधियों की वैज्ञानिक तरीके से निगरानी, आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल, जैव-विविधता की सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को संरक्षण रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।

संरक्षण में स्थानीय आबादी की भूमिका को भी विशेष महत्व दिया गया है। वन्यजीवों के साथ सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने और संरक्षण से मिलने वाले लाभ में समुदायों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है। यही कारण है कि शेरों की बढ़ती संख्या को केवल सरकारी परियोजना की सफलता नहीं, बल्कि वन विभाग, वैज्ञानिकों, संरक्षणवादियों और स्थानीय समुदायों के साझा प्रयास का परिणाम माना जा रहा है।