सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की लेथल इंजेक्शन की मांग। बड़ी पीठ के पास मामला भेजने से भी इनकार
नई दिल्ली : भारत में मौत की सजा पाए दोषियों को फांसी देने की दशकों पुरानी व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह लेथल इंजेक्शन या अन्य कथित रूप से कम पीड़ादायक तरीकों से मृत्युदंड देने की मांग वाली जनहित याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मौजूदा व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराने से इनकार करते हुए पुराने फैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग भी स्वीकार नहीं की।
अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा ने वर्ष 2017 में दाखिल जनहित याचिका में तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 354(5) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। अब इसके अनुरूप प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 393(5) में है, जिसमें मौत की सजा को फांसी के जरिए लागू करने का प्रावधान है। याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के अधिकार का हवाला देते हुए मौजूदा तरीके को अधिक पीड़ादायक बताया था।
याचिका में फांसी के विकल्प के रूप में लेथल इंजेक्शन, गोली मारने, इलेक्ट्रोक्यूशन यानी बिजली के जरिए मृत्युदंड और गैस चैंबर जैसे तरीके सुझाए गए थे। दलील दी गई थी कि फांसी के बाद मौत घोषित करने में करीब 40 मिनट तक लग सकते हैं, जबकि कुछ वैकल्पिक तरीकों से लगभग पांच मिनट में प्रक्रिया पूरी हो सकती है। याचिकाकर्ता ने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों का हवाला देते हुए मृत्युदंड की प्रक्रिया में कम से कम पीड़ा और मानवीय गरिमा सुनिश्चित करने की मांग की थी।
सुनवाई के दौरान प्रोजेक्ट 39ए सहित विभिन्न पक्षों की ओर से वैश्विक अनुभव और वैकल्पिक तरीकों से जुड़े पहलू अदालत के सामने रखे गए। लेथल इंजेक्शन सहित दूसरे तरीकों से जुड़ी चिकित्सकीय, व्यावहारिक और कानूनी चुनौतियों पर भी विचार हुआ। अदालत के सामने फांसी की प्रक्रिया से जुड़े मानवीय पहलुओं को भी रखा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका जरूर खारिज कर दी, लेकिन भविष्य के लिए रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया। पीठ ने कहा कि यदि आगे ठोस वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आते हैं तो मृत्युदंड लागू करने के तरीके की संवैधानिक समीक्षा दोबारा हो सकती है। केंद्र सरकार भी विशेषज्ञों के जरिए मौजूदा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करा सकती है। अदालत ने कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस और क्रिमिनोलॉजी जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों के जरिए विकल्पों का अध्ययन किए जाने की गुंजाइश बताई।
केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने मामले में सरकार का पक्ष रखा। पूर्व की सुनवाई में दोषियों को फांसी या किसी दूसरे तरीके में से विकल्प देने का सवाल भी उठा था, जबकि केंद्र मृत्युदंड लागू करने के तरीके को नीतिगत विषय बताता रहा है।फैसले के बाद फिलहाल स्थिति साफ है कि भारत में मौत की सजा को लागू करने के लिए फांसी की मौजूदा कानूनी व्यवस्था जारी रहेगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य में बेहतर वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर दूसरे विकल्पों की समीक्षा की संभावना खुली रखी है।
