छंटनी, एआई और कमजोर तकनीकी शिक्षा ने बढ़ाई इंजीनियरिंग छात्रों की मुश्किल। सरकार, शिक्षण संस्थानों और उद्योग को मिलकर तलाशना होगा रोजगार का नया रास्ता

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र लंबे समय से बेहतर रोजगार और आकर्षक वेतन का पर्याय रहा है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले लाखों युवाओं की पहली पसंद आज भी आईटी क्षेत्र है। मगर इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पहलू चिंताजनक होता जा रहा है। एक ओर बड़ी कंपनियों में कर्मचारियों की संख्या घटने और छंटनी की खबरें हैं, दूसरी ओर इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकल रहे युवाओं के सामने नौकरी हासिल करना पहले से कठिन हो गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।

इसका सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जिनके लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई महज शिक्षा नहीं, बेहतर भविष्य में किया गया बड़ा निवेश है। निजी इंजीनियरिंग कॉलेजों की फीस लाखों रुपये तक पहुंचती है। सामान्य और निम्न आय वाले परिवार बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेते हैं, बचत खर्च करते हैं और कई बार जेवर या जमीन तक बेच देते हैं। ऐसे परिवारों के लिए चार वर्ष बाद बेरोजगार इंजीनियर का घर लौटना केवल आर्थिक नुकसान नहीं, वर्षों से संजोए सपनों का टूटना भी है।

समस्या की एक बड़ी जड़ इंजीनियरिंग शिक्षा और उद्योग की जरूरतों के बीच बढ़ती दूरी है। तकनीक तेजी से बदल रही है, लेकिन अनेक शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई उसी गति से नहीं बदली। कंपनियां अब केवल डिग्री नहीं देखतीं। उन्हें ऐसा इंजीनियर चाहिए जो नई तकनीक समझता हो, समस्याओं का समाधान कर सके और बदलती जरूरतों के अनुसार स्वयं को लगातार तैयार रखे। यही कारण है कि कैंपस प्लेसमेंट में कुछ विद्यार्थी आसानी से आगे निकल जाते हैं, जबकि बड़ी संख्या में छात्र शुरुआती दौर में ही छंट जाते हैं।

एआई ने इस अंतर को और स्पष्ट कर दिया है। जिन सामान्य तकनीकी कामों के लिए पहले कई कर्मचारियों की जरूरत पड़ती थी, उनमें से अनेक काम अब एआई की सहायता से कम समय और कम मानव संसाधन में किए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इंजीनियरों की जरूरत समाप्त हो रही है। जरूरत का स्वरूप बदल रहा है। कंपनियों को अब ऐसे कर्मचारी चाहिए जो एआई का उपयोग करने के साथ जटिल समस्याओं को समझने और बेहतर समाधान विकसित करने में सक्षम हों। इसलिए सबसे अधिक दबाव शुरुआती स्तर की नौकरियों और सीमित कौशल वाले कर्मचारियों पर दिखाई देता है।

बड़ी आईटी कंपनियों में छंटनी और कर्मचारियों की संख्या में कमी की खबरों को भी इसी बदलाव के संदर्भ में देखने की जरूरत है। संसद में आईटी क्षेत्र के रोजगार को लेकर चिंता जताई गई थी। सरकार इस प्रश्न को केवल निजी कंपनियों का आंतरिक मामला मानकर नहीं छोड़ सकती। नौकरी जाने का असर एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रहता। उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा, कर्ज, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी सामाजिक जिम्मेदारियां भी इससे जुड़ी होती हैं।

उच्च तकनीकी शिक्षा की जवाबदेही तय करने की भी जरूरत है। जब कोई निजी कॉलेज लाखों रुपये फीस लेता है तो उसकी जिम्मेदारी केवल डिग्री देने तक सीमित नहीं हो सकती। पाठ्यक्रम की नियमित समीक्षा, उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों की भागीदारी, व्यावहारिक प्रशिक्षण और नई तकनीक की शिक्षा आवश्यक होनी चाहिए। साथ ही इंजीनियरिंग की सीटों का निर्धारण भी रोजगार बाजार की वास्तविक मांग को ध्यान में रखकर होना चाहिए। जिन क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं बढ़ रही हैं, वहां शिक्षा और प्रशिक्षण की क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।

युवाओं को भी यह समझना होगा कि अब केवल बीटेक की डिग्री अच्छे कॅरियर की गारंटी नहीं है। सीखने की प्रक्रिया कॉलेज के अंतिम सेमेस्टर के साथ समाप्त नहीं होती। नई तकनीक सीखना और लगातार अपने कौशल को बेहतर करना अब पेशेवर जीवन की अनिवार्यता है।

भारत के आईटी क्षेत्र का संकट दरअसल तकनीकी बदलाव और हमारी तैयारी के बीच बढ़ती दूरी का संकेत है। इसका समाधान न केवल युवाओं को दोष देने में है और न कंपनियों की छंटनी पर चिंता जताकर रह जाने में। सरकार, उद्योग और शिक्षण संस्थानों-तीनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। वरना लाखों रुपये की फीस देकर हासिल की गई इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में होगी और नौकरी की उम्मीद लगातार दूर होती जाएगी।