सीतामढ़ी का मॉडल बना पूरे देश की प्रेरणा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रयास को जनभागीदारी और पर्यावरण संरक्षण का उत्कृष्ट उदाहरण बताया

सीतामढ़ी : माँ जानकी की पावन धरती सीतामढ़ी ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जिस सिंगल यूज प्लास्टिक को लोग बेकार समझकर सड़कों, नालों और खुले स्थानों पर फेंक देते थे, वही अब नई उपयोगिता के साथ लोगों की सुविधा का साधन बन रहा है। प्लास्टिक कचरे से तैयार की जा रही मजबूत और आकर्षक बेंचों की यह पहल राष्ट्रीय स्तर पर सराहना बटोर रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में सीतामढ़ी के इस प्रयास का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि "रिड्यूस, रियूज़ और रीसायकल" अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि लोगों की जीवनशैली का हिस्सा बनता जा रहा है। प्रधानमंत्री की इस सराहना से न केवल सीतामढ़ी, बल्कि पूरे बिहार का सम्मान बढ़ा है।

जिले में स्थापित प्लास्टिक अपशिष्ट प्रसंस्करण इकाइयों में सिंगल यूज प्लास्टिक को आधुनिक मशीनों की सहायता से छोटे-छोटे टुकड़ों में बदला जाता है। इसके बाद विशेष तकनीक के जरिए उसे मजबूत, टिकाऊ और आकर्षक बेंच का रूप दिया जाता है। एक बेंच तैयार करने में लगभग 40 किलोग्राम प्लास्टिक कचरे का उपयोग होता है। तैयार बेंचों को सरकारी विद्यालयों, पार्कों और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर लगाया जा रहा है, जहां अब बच्चे और आम लोग उनका उपयोग कर रहे हैं।

यह पहल केवल प्लास्टिक कचरे के निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज में पर्यावरण के प्रति नई सोच विकसित करने का माध्यम बन चुकी है। जहां कभी प्लास्टिक कचरा प्रदूषण का कारण बनता था, वहीं आज उसी से बनी बेंचों पर बैठकर बच्चे अपने भविष्य की नई इबारत लिख रहे हैं। यह संदेश देता है कि सही सोच, तकनीक और सामूहिक प्रयास से बेकार समझी जाने वाली वस्तुएं भी समाज के लिए उपयोगी संसाधन बन सकती हैं।

प्रधानमंत्री की सराहना के बाद राज्य में 'वेस्ट टू वैल्यू' मॉडल को और व्यापक स्तर पर अपनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इस पहल को पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे न केवल प्लास्टिक प्रदूषण कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि लोगों में पुनर्चक्रण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।

सीतामढ़ी की यह पहल अब केवल एक जिले की उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा बन चुकी है। यह साबित करती है कि बदलाव बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि बड़े संकल्प और जनभागीदारी से आता है। यदि देश के अन्य शहर और गांव भी इस मॉडल को अपनाएं तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ, हरित और प्रदूषण मुक्त भारत की अमूल्य सौगात दी जा सकती है।