इंस्टाग्राम, रील्स और अटेंशन इकोनॉमी के दौर में कैसे बचाएं अपना समय और ध्यान?
डॉ. प्रभात इंदौरा
एक कहानी आजकल अधिकतर युवाओं के जीवन का अहम हिस्सा बन गई है, जब भी सुबह आंख खुलती है अलार्म बंद करने के लिए हाथ मोबाइल तक जाता है। अलार्म बंद हुआ नहीं कि एक नोटिफिकेशन दिखाई देती है। फिर इंस्टाग्राम खुलता है। एक रील… फिर दूसरी… फिर तीसरी। हम सोचते हैं बस पांच मिनट और देखते हैं। इसके बाद पांच मिनट कब पच्चीस मिनट हो जाते हैं और पच्चीस मिनट कब एक घंटा पता ही नहीं चलता। फिर अचानक याद आता है कि असाइनमेंट भी पूरा करना है, परीक्षा की तैयारी भी करनी है और शायद कोई प्रेजेंटेशन भी बनानी है। इतने सारे कम याद आते ही मोबाइल रख दिया जाता है। पूरी हिम्मत जुटाकर किताब खोली जाती है। दो मिनट पढ़ने के बाद मन फिर बेचैन होने लगता है। लगता है एक बार फोन देख लेता हूं…और फिर वही कहानी। यह कहानी किसी एक विद्यार्थी की नहीं है। आज लाखों युवाओं की दिनचर्या में इसका कोई न कोई संस्करण मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि किसी के हाथ में इंस्टाग्राम है, किसी के हाथ में यूट्यूब शॉर्ट, किसी के हाथ में स्नैपचेट तो किसी के सामने लगातार नोटिफिकेशन से चमकती स्क्रीन। अब सवाल है कि हम मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं या मोबाइल हमारा इस्तेमाल कर रहा है?
समस्या मोबाइल नहीं, हमारा बिखरता हुआ ध्यान है
मोबाइल अपने आप में दुश्मन नहीं है। आज मोबाइल से हम ऑनलाइन क्लासेस कर सकते हैं, किताबें पढ़ सकते हैं, लेक्चर्स देख सकते हैं, दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय के रिसोर्सेस तक पहुंच सकते हैं, एक्सपर्ट को फॉलो कर सकते हैं, नई भाषा सीख सकते हैं और अपना कॅरिअर नेटवर्क बना सकते हैं। एक स्मार्टफोन में कभी-कभी पूरी लाईब्रेरी से ज्यादा इंफोर्मेशन होती है। लेकिन यही स्मार्टफोन हमारी प्रोडक्विटी का सबसे बड़ा बाधक भी बन सकता है। क्योंकि मोबाइल हमें सिर्फ इंफोर्मेशन नहीं देता, यह बार-बार हमारी अटेंशन भी मांगता है।
एक नॉटिफिकेशन, एक मेसेज, एक लाइक, एक कंमेंट, एक नई रील, एक ट्रेंडिंग वीडियो, एक ब्रेकिंग न्यूज या एक नया फॉलोवर। हमारा दिमाग लगातार इन उत्तेजनाओं के बीच घूमता रहता है। और धीरे-धीरे हमें लंबे समय तक एक ही काम पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल लगने लगता है। यही असली समस्या है। हमारे पास इंफोर्मेशन बहुत है, लेकिन अटेंशन सीमित है। और आज की डिजिटल दुनिया में सबसे मूल्यवान चीज शायद इंफोर्मेशन नहीं, बल्कि आपका अटेंशन यानि ध्यान है।
अटेंशन इकॉनोमी में आपका ध्यान ही असली धन है
हम अक्सर सुनते हैं कि डाटा ही नया ईंधन है। लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में ध्यान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इंस्टाग्राम, यूटूब, फेसबुक और दूसरे डिजिटल प्लेटफोर्मस् चाहते हैं कि आप उन पर ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। क्योंकि आपका समय उनके लिए कीमती है। जितनी देर आप प्लेटफॉर्म पर रहेंगे, उतने ही अधिक विज्ञापन आपको दिखाए जा सकते हैं। जितना अधिक कंटेंट आप देखेंगे, प्लेटफॉर्म को उतना अधिक डाटा मिलेगा कि आपको किस तरह का कंटेंट पसंद है। इसलिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मस् का लक्ष्य केवल आपको एक अच्छा वीडियो दिखाना नहीं है। उनका लक्ष्य है आपको अगला वीडियो भी दिखाना और उसके बाद अगला और उसके बाद फिर से अगला। यहीं से शुरू होता है हमारा अंतहीन स्क्रॉलिंग करने का व्यवहार। रील्स और शॉर्ट की सबसे बड़ी ताकत उनकी लेंथ नहीं, उनकी निरंतरता है।
पहले टेलीविजन पर कोई प्रोग्राम खत्म होता था। हम फिल्म देखते तो वो फिल्म खत्म होती थी। एक न्यूजपेपर में कोई न्यूज या लेख पढ़ते तो वो खत्म होता था। बुक पढ़ते हैं तो एक चैप्टर खत्म होता है इन सबमें हमारे पास रुकने का एक निश्चित बिंदू होता है। लेकिन शॉर्ट -वीडियो प्लेटफॉर्मस् पर कंटेंट खत्म होने के बाद तुरंत दूसरा कंटेंट शुरू हो जाता है। आपको कोई निर्णय लेने की जरूरत नहीं। बस स्क्रॉल करना है और नया कंटेंट सामने। इसका परिणाम यह है कि उपभोग का कोई स्पष्ट अंतिम बिंदू नहीं रहता। आपने कब 10 वीडियोज देखे, कब 30 और कब 60 इसका एहसास तक नहीं होता। इसलिए सबसे खतरनाक वाक्य शायद यह है कि ‘बस एक रील और देख लेता हूँ।’ उस एक रील में कोई दिक्कत नहीं है, परंतु समस्या यह है कि उसके बाद वाली रील के लिए कोई दरवाजा बंद नहीं होता।

एक छोटा-सा प्रयोग करके देखिए। जब अगली बार आप पढ़ाई कर रहे हों और अचानक फोन उठाने का मन करे, खुद से पूछिए कि मैं फोन क्यों उठा रहा हूं? अगर जवाब है कि पता नहीं। तो शायद आपको किसी मेसेज की जरूरत नहीं थी। आपका ब्रेन बस स्टिमुलेशन खोज रहा था। यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। जरूरत और आवेग अलग-अलग चीजें हैं। फोन की जरूरत हो सकती है। लेकिन हर बार फोन देखने की जरूरत नहीं होती। स्क्रॉलिंग में सबसे बड़ा नुकसान समय का नहीं, ध्यान का है। हर नॉटिफिकेशन आपके ब्रेन को टास्क स्विचिंग की ओर धकेल सकती है। आप किताब से व्हाट्स एप पर गए। व्हाट्स एप से इंस्टाग्राम। इंस्टाग्राम से वापस किताब। लेकिन आपका ब्रेन तुरंत उसी लेवल की एकाग्रता पर वापस नहीं आता। यही कारण है कि कभी-कभी विद्यार्थी चार घंटे पढ़ता है, लेकिन शाम को महसूस करता है कि आज कुछ हुआ ही नहीं।
क्या हमारी एकाग्रता सचमुच कम हो रही है?
इस विषय पर सोशल मीडिया के प्रभाव को लेकर बहुत-सी लोकप्रिय बातें कही जाती हैं, लेकिन हमारी अटेंशन स्पेन निश्चित रूप से इतने सेकंड्स रह गई है, जैसे वायरल क्लैम्स को सावधानी से लेना चाहिए। जब हम लगातार छोटे, तेज और अत्याधिक उत्तेजक कंटेंट के आदी होते जाते हैं, तो लंबा और धीमा कंटेंट शुरू में बोरिंग लग सकता है।
यही वजह है कि कुछ विद्यार्थियों को 20 मिनट का लेक्चर लंबा लगता है। 30 पेज का चैप्टर भारी लगता है। रिसर्च पेपर पढ़ना बोरिंग लगता है। लेकिन 90 मिनट तक गेमिंग या रील्स देखने में समय का पता नहीं चलता। ऐसा नहीं है कि विद्यार्थी ध्यान केंद्रित कर ही नहीं सकता। सवाल है कि उसका ध्यान किस चीज को लगातार रिवार्ड की तरह ले रहा है? किताब बोरिंग क्यों लगती है और रील इंटरेस्टिंग क्यों? क्योंकि दोनों के बीच एक बड़ा फर्क है। रील आपको इंटरटेन करने के लिए डिजाइन की जाती है वहीं बुक आपको सोचने के लिए मजबूर करती है।
डिजिटल डिस्ट्रेक्शन की असली कीमत समझें
मान लीजिए कि आप हर दिन 24 घंटे में नींद के लिए 7 घंटे, कॉलेज के लिए 7 घंटे, खाना, यात्रा, पर्सनल वर्क के 3 घंटे उपयोग करते हैं। अब आपके पास लगभग 7 घंटे बचते हैं। अगर इनमें से 2–3 घंटे बिना योजना के सोशल मिडिया में चले गए, तो आपके पास पढ़ाई, स्किल डेवेलपमेंट, व्यायाम, रीडिंग, फैमिली और पर्सनल ग्रोथ के लिए कितना समय बचा? सोशल मीडिया पर समय बिताना गलत नहीं है, लेकिन क्या वह समय आपके गोल्स के हिसाब से खर्च हो रहा है? जैसे अगर आपका गोल जर्नलिस्ट बनना है और आप मीडिया के बारे में मीनिंगफुल कंटेंट देख रहे हैं तो यह लर्निंग हो सकती है। अगर आप फिल्म मेकर बनना चाहते हैं और फिल्म मेकिंग टेकनीक्स देख रहे हैं तो यह लर्निंग हो सकती है। अगर आप कोई नई भाषा सीख रहे हैं तो यह प्रॉडक्टिव डिजिटल उपयोग है। लेकिन अगर आप एक घंटे तक रैंडम रील्स देखते रहे और अंत में पता चला कि मैंने कुछ खास नहीं समझा या सीखा तो यह पैसिव कन्जम्प्शन है। डिजिटल डिसिप्लिन का अर्थ मोबाइल छोड़ देना नहीं है। यह भी जरूरी नहीं कि आप सारे सोशल मीडिया अकाउंट्स डिलीट कर दें। बल्कि इसका का अर्थ है टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल अपने उद्देश्य के अनुसार करना, ना कि उसके डिजाइन के अनुसार। आप तय करें कि कब ऑनलाइन होना है, क्यों होना है और कितनी देर रहना है। यह सुनने में आसान है, परंतु करना थोड़ा कठिन। डिजिटल प्लेटफोर्मस् आपके ध्यान को नियंत्रित करने के लिए बेहद जटिल तरीके इस्तेमाल करते हैं। इसलिए डिजिटल अनुशासन केवल इच्छाशक्ति से नहीं बनेगा। आपको अपना डिजिटल इंवायरमेंट भी बदलना होगा।
(आगामी लेख में पढ़िये- डिजिटल अनुशासन : नियम जो आपको बनाएगा तकनीक का मालिक)

