शराबबंदी को प्रभावी बनाने के लिए जागरूकता, निगरानी और एजेंसियों के समन्वय पर जोर

रक्सौल (पूर्वी चंपारण) : बिहार में करीब एक दशक से लागू शराबबंदी ने समाज को कितना बदला, परिवारों को इसका कितना फायदा मिला और कानून के बावजूद शराब की बरामदगी तथा तस्करी की खबरें क्यों आती रहती हैं? इन सवालों के बीच इन दिनों इंटरनेट मीडिया पर शराबबंदी खत्म होने की चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं। लेकिन इन चर्चाओं में कितना दम है? भारत-नेपाल सीमा से जुड़े रक्सौल जैसे इलाके में इस कानून को लागू करने की असली चुनौती क्या है?

इन्हीं सवालों पर सीनियर रिपोर्टर विजय कुमार गिरि ने इंडो-नेपाल बॉर्डर के प्रमुख व्यापारी एवं सामाजिक कार्यकर्ता ई. आलोक श्रीवास्तव से एक्सक्लूसिव बातचीत की।

आलोक श्रीवास्तव ने शराबबंदी के मूल उद्देश्य को सामाजिक सुधार से जोड़ते हुए कहा कि परिवारों को शराब के दुष्प्रभाव से बचाने की सोच निश्चित रूप से सकारात्मक है। लेकिन किसी कानून की वास्तविक सफलता केवल उसे लागू कर देने से तय नहीं होती। उसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि जमीन पर उसका क्रियान्वयन कितना प्रभावी और पारदर्शी है।

शराबबंदी से हुए फायदे और नुकसान के सवाल पर उन्होंने कहा कि इसके दोनों पहलुओं को समझना जरूरी है। शराब की उपलब्धता कम होने से कई परिवारों को लाभ मिला और परिवार की आय शराब पर खर्च होने से बची। दूसरी तरफ मांग बने रहने की स्थिति में अवैध शराब के कारोबार और तस्करी का खतरा भी पैदा होता है। ऐसे में कानून के साथ सामाजिक जागरूकता और लगातार सख्त निगरानी जरूरी है।

बिहार में शराबबंदी वास्तव में पूरी तरह प्रभावी है या नहीं, इस सवाल पर बातचीत का केंद्र सीमावर्ती इलाके रहे। रक्सौल की भौगोलिक स्थिति का जिक्र करते हुए श्रीवास्तव ने कहा कि नेपाल और बिहार के बीच लगातार लोगों की आवाजाही के कारण सीमा क्षेत्र की चुनौतियां अलग हैं। शराब की तस्करी और बरामदगी की घटनाओं को कानून की पूरी विफलता मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन ये घटनाएं निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत जरूर बताती हैं।

उन्होंने कहा कि सीमा पर केवल छोटे वाहकों को पकड़ने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। अवैध कारोबार के पीछे सक्रिय पूरे नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी है। इसके लिए खुफिया तंत्र को मजबूत करने के साथ विभिन्न सुरक्षा और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है।

इन दिनों इंटरनेट मीडिया पर बिहार में शराबबंदी खत्म होने की चर्चाओं को लेकर पूछे गए सवाल पर आलोक श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि सरकार की ओर से जब तक कोई आधिकारिक घोषणा या नीति सामने नहीं आती, ऐसी बातों को अटकलों से अधिक महत्व नहीं दिया जाना चाहिए। शराबबंदी जैसा फैसला सामाजिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर व्यापक असर डालता है, इसलिए इससे जुड़े किसी बदलाव को आधिकारिक जानकारी के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।

व्यापार और अर्थव्यवस्था पर शराबबंदी के असर को लेकर उन्होंने कहा कि हर बड़ी नीति के आर्थिक परिणाम होते हैं। शराबबंदी से सरकार के राजस्व का एक हिस्सा प्रभावित हुआ, लेकिन केवल राजस्व के पैमाने पर इसके प्रभाव का आकलन करना सही नहीं होगा। परिवारों की आय के दुरुपयोग में कमी और सामाजिक स्तर पर होने वाले सकारात्मक बदलाव को भी इसके साथ जोड़कर देखना होगा।

इस एक्सक्लूसिव बातचीत में शराबबंदी को केवल समर्थन या विरोध के नजरिए से नहीं, बल्कि इसके सामाजिक प्रभाव, आर्थिक पहलू, जमीनी क्रियान्वयन और भारत-नेपाल सीमा की व्यावहारिक चुनौतियों के बीच समझने की कोशिश की गई।