• 2013 में दुनिया छोड़ गए गोपाल जी प्रसाद, आज भी दोस्त की याद में भावुक हो उठते हैं 94 वर्षीय राम कैलाश भगत


पूर्वी चंपारण : आज के दौर में जब रिश्ते अक्सर स्वार्थ, सुविधा और लाभ-हानि के हिसाब से तय होते दिखाई देते हैं, तब पूर्वी चंपारण से आई दो दोस्तों की यह कहानी इंसानियत का सिर ऊंचा कर देती है। यह केवल दोस्ती की कहानी नहीं, बल्कि उस रिश्ते की गवाही है जो जाति, खून, संपत्ति और सामाजिक भेदभाव से कहीं ऊपर खड़ा दिखाई देता है। यह दास्तान है 94 वर्षीय राम कैलाश भगत और उनके दिवंगत मित्र गोपाल जी प्रसाद की, जिन्होंने 66 साल तक ऐसा साथ निभाया कि लोग आज भी उनकी मित्रता को उदाहरण की तरह याद करते हैं।


इस अनोखे रिश्ते की शुरुआत जिहुली हाई स्कूल की बेंच से हुई थी। एक तरफ राम कैलाश भगत थे और दूसरी तरफ गोपाल जी प्रसाद। समाज उन्हें अलग-अलग जातीय पहचान से देखता था। एक वैश्य समाज से थे और दूसरे कोरी जाति से संबंध रखते थे, लेकिन इन दोनों युवकों के बीच जाति की कोई दीवार कभी खड़ी नहीं हो सकी। उनके लिए सबसे बड़ा परिचय मनुष्य होना था और सबसे बड़ा रिश्ता दोस्ती।


स्कूल की पढ़ाई के बाद भी यह साथ टूटा नहीं। दोनों ने 1966 में सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज से कॉमर्स की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद जीवन की राह में भी दोनों ने अलग-अलग दिशा नहीं चुनी। मैट्रिक के परिणाम की खुशी से लेकर भविष्य की चिंता तक, हर पल दोनों ने मिलकर जिया। संघर्ष, उम्मीद, जिम्मेदारी और मेहनत...सब कुछ साझा रहा।


पढ़ाई पूरी करने के बाद राम कैलाश भगत और गोपाल जी प्रसाद ने रेडीमेड कपड़ों के व्यवसाय में कदम रखा। धीरे-धीरे यह साझेदारी केवल व्यापार तक सीमित नहीं रही। दोनों का जीवन एक-दूसरे में इस तरह रच-बस गया कि आसपास के लोग उनकी दिनचर्या को किसी फिल्मी कहानी जैसा बताते हैं। एक ही छत के नीचे रहना, एक ही थाली में भोजन करना और कारोबार की हर चुनौती का मिलकर सामना करना, उनकी दोस्ती को साधारण मित्रता से बहुत आगे ले गया।


राम कैलाश भगत के जीवन में अपनी कोई संतान नहीं थी, लेकिन उन्होंने इसे कभी अपने जीवन की खाली जगह नहीं बनने दिया। उन्होंने गोपाल जी प्रसाद के बच्चों को ही अपनी संतान मान लिया। बच्चों की पढ़ाई, करियर, विवाह और परिवार की जिम्मेदारियों में उन्होंने उसी भाव से भूमिका निभाई, जैसे कोई पिता अपने बच्चों के लिए निभाता है। यही कारण है कि गोपाल जी के बड़े पुत्र संतोष गुप्ता, जो पचपकड़ी पंचायत के मुखिया हैं और छोटे पुत्र सत्यम कुमार गुप्ता, जो रेलवे टेक्नीशियन हैं, आज भी राम कैलाश भगत को पिता के समान सम्मान देते हैं।


दोस्ती की असली परीक्षा तब हुई जब गोपाल जी प्रसाद बीमार पड़े। उस दौर में राम कैलाश भगत केवल मित्र नहीं रहे, बल्कि एक सेवादार, परिजन और छाया की तरह उनके साथ खड़े रहे। उन्होंने अपने मित्र को नहलाने-धुलाने से लेकर कपड़े बदलने तक की सेवा स्वयं की। बीमारी ने शरीर को कमजोर किया, लेकिन दोनों मित्रों के बीच का भावनात्मक रिश्ता और मजबूत होता गया।


15 मई 2013 को गोपाल जी प्रसाद ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। सामान्य तौर पर मृत्यु रिश्तों की उपस्थिति को खत्म कर देती है, लेकिन इस दोस्ती में ऐसा नहीं हुआ। राम कैलाश भगत आज भी अपने मित्र की तस्वीर को हृदय से लगाकर रखते हैं। उनके लिए गोपाल जी केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि आज भी जीवन का हिस्सा हैं। गोपाल जी के बच्चे भी इस रिश्ते की गरिमा को समझते हैं और हर महीने राम कैलाश भगत को सहयोग राशि भेजते हैं। यह सहयोग केवल आर्थिक नहीं, बल्कि उस पवित्र मित्रता के प्रति सम्मान का प्रतीक है।


94 वर्ष की उम्र में राम कैलाश भगत की अब एक ही अंतिम इच्छा बची है। वह चाहते हैं कि उनकी और गोपाल जी प्रसाद की मूर्ति एक साथ स्थापित की जाए। उनका कहना है कि इस निर्माण का पूरा खर्च वह स्वयं उठाने को तैयार हैं। उनकी इच्छा है कि आने वाली पीढ़ी जब इन दोनों मित्रों की प्रतिमा देखे तो उसे समझ में आए कि सच्ची दोस्ती क्या होती है और इंसानियत किसे कहते हैं।


राम कैलाश भगत की यह भावुक इच्छा केवल दो व्यक्तियों की स्मृति से जुड़ी मांग नहीं है। यह समाज के सामने एक संदेश है कि जाति और सामाजिक भेदभाव की दीवारें मनुष्य के हृदय से बड़ी नहीं हो सकतीं। अगर रिश्ते में सच्चाई, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम हो तो वह खून के रिश्तों से भी अधिक मजबूत बन जाता है।


आज के युवाओं के लिए राम कैलाश और गोपाल जी की मित्रता एक जीवंत पाठ है। यह कहानी बताती है कि सच्चा रिश्ता किसी जाति, धर्म, स्वार्थ या सुविधा का मोहताज नहीं होता। जब हृदय में निष्कपट प्रेम हो तो मृत्यु भी उस बंधन को समाप्त नहीं कर सकती।