मोतिहारी में हिरासत से अस्पताल तक संदिग्ध हालात में मौत, कई सवाल खड़े, परिजनों का आरोप पिटाई से हुई मौत

बिहार। मोतिहारी की धरती पर एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता दोनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। एक तरफ मोतिहारी व्यवहार न्यायालय में 35 वर्षीय अच्छेलाल पासवान की जमानत पर सुनवाई चल रही थी और जज द्वारा पुलिस से केस डायरी तलब की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर सदर अस्पताल के एक वार्ड में उसकी सांसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं। यह महज संयोग नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भयावह तस्वीर है जिसमें कागज अपनी रफ्तार से चलते हैं, लेकिन इंसान की जिंदगी बीच रास्ते खत्म हो जाती है।

मामले की शुरुआत 5 अप्रैल 2026 को हुई, जब हरसिद्धि थाना पुलिस ने कांड संख्या 124/2025, जो शराब से जुड़ा मामला बताया जा रहा है, में अच्छेलाल पासवान को गिरफ्तार किया। गिरफ्तारी के अगले दिन 6 अप्रैल को उसे हरसिद्धि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया। मेडिकल पर्ची संख्या ई-1333 के अनुसार उसका ब्लड प्रेशर 120/80 था, जो पूरी तरह सामान्य स्थिति को दर्शाता है। डॉक्टरों ने उसे केवल गैस की दवा और ओआरएस लेने की सलाह दी थी, जिससे स्पष्ट था कि वह पूरी तरह स्वस्थ था।

लेकिन जैसे ही उसे मोतिहारी सेंट्रल जेल भेजा गया, घटनाक्रम ने अचानक करवट ले ली। जेल प्रशासन की ओर से यह कहा गया कि उसकी तबीयत बिगड़ रही है और उसके हाथ कांप रहे हैं, जिसके बाद उसे आनन-फानन में सदर अस्पताल के नशा मुक्ति वार्ड में भर्ती करा दिया गया। यही वह बिंदु है जहां पूरे मामले पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि जब मेडिकल रिपोर्ट में वह पूरी तरह फिट था, तो उसे सामान्य वार्ड के बजाय नशा मुक्ति केंद्र में क्यों रखा गया।

परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों के आरोप इस घटना को और भी गंभीर बना देते हैं। परिवार का कहना है कि अच्छेलाल वार्ड के अंदर से चीख-चीख कर कह रहा था, “साहब, मुझे मत मारो, मेरे घर में शादी है, मुझे छोड़ दो।” उसकी बूढ़ी मां रामकली देवी के अनुसार, 19 अप्रैल को परिवार में शादी थी, जिसकी खुशियां अब मातम में बदल चुकी हैं। पत्नी माला देवी का कहना है कि गिरफ्तारी के समय वह बिल्कुल स्वस्थ था और वे दोनों साथ बैठकर नाश्ता कर रहे थे। परिजनों का आरोप है कि उसकी मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि बर्बर पिटाई का नतीजा है।

घटना के दिन 9 अप्रैल को एक तरफ सदर अस्पताल में अच्छेलाल का शव पड़ा था और बाहर भारी संख्या में लोग हंगामा कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ कोर्ट में उसकी जमानत पर बहस चल रही थी। यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया और जमीनी हकीकत के बीच की खाई को साफ तौर पर दिखाती है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रशासन हरकत में आया। सदर एसडीओ और डीएसपी दिलीप कुमार को मौके पर पहुंचकर स्थिति संभालनी पड़ी। बाद में जिलाधिकारी सौरभ जोरवाल के निर्देश पर तीन सदस्यीय मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया और पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराई गई।

अब यह पूरा मामला जांच के दायरे में है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी है कि आखिर एक स्वस्थ व्यक्ति हिरासत से अस्पताल तक पहुंचते-पहुंचते मौत के मुंह में कैसे चला गया। चार बच्चों और एक बेबस पत्नी के सामने खड़ा यह सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है।