भोजन और प्राकृतिक पेय से लेकर सौंदर्य प्रसाधन, रस्सी, चटाई और हस्तशिल्प तक नारियल का व्यापक इस्तेमाल
नई दिल्ली : आज यानी 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाया जा रहा है। नारियल केवल पूजा-पाठ या रसोई में इस्तेमाल होने वाला फल नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका, ग्रामीण रोजगार और बड़े उद्योग की बुनियाद भी है। नारियल पानी से लेकर तेल और उसके रेशे से लेकर हस्तशिल्प तक इसका लगभग हर हिस्सा किसी न किसी रूप में उपयोगी है। यही वजह है कि इस दिन दुनिया भर में नारियल की उपयोगिता के साथ इसे पैदा करने वाले किसानों और इससे जुड़े लोगों के योगदान को भी याद किया जाता है।
विश्व नारियल दिवस मनाने की शुरुआत 2009 में हुई।
नारियल उत्पादक देशों के बीच सहयोग बढ़ाने वाली संस्था की पहल पर इसकी शुरुआत की गई। यह संस्था पहले एशिया-प्रशांत नारियल समुदाय के नाम से जानी जाती थी और अब अंतरराष्ट्रीय नारियल समुदाय के रूप में कार्य करती है। भारत इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल है। इस दिवस का उद्देश्य नारियल की खेती, प्रसंस्करण, व्यापार और इससे बनने वाले उत्पादों की संभावनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।
भारत में नारियल का रिश्ता केवल खेती से नहीं, बल्कि परंपरा और संस्कृति से भी जुड़ा है। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर शुभ कार्यों तक नारियल का विशेष महत्व है। वहीं दक्षिण और तटीय भारत के खानपान में इसका व्यापक इस्तेमाल होता है। देश में केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश नारियल उत्पादन के प्रमुख केंद्र हैं। इसके अलावा ओडिशा, पश्चिम बंगाल, गोवा और पूर्वोत्तर के कई क्षेत्रों में भी नारियल की खेती होती है। हजारों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस फसल से अपनी आजीविका चलाते हैं।
नारियल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फल से लेकर उसके छिलके और पत्तियों तक का इस्तेमाल किया जा सकता है। कच्चे नारियल का पानी प्राकृतिक पेय के रूप में बेहद लोकप्रिय है, जबकि पका नारियल अनेक भारतीय और विदेशी व्यंजनों का स्वाद बढ़ाता है। नारियल का दूध भी कई तरह के व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है। इससे निकलने वाला तेल खाद्य पदार्थों के अलावा बालों के तेल, साबुन और विभिन्न सौंदर्य प्रसाधनों के निर्माण में काम आता है।
नारियल का फल इस्तेमाल हो जाने के बाद भी उसकी उपयोगिता समाप्त नहीं होती। उसकी भूसी से मिलने वाले प्राकृतिक रेशे से रस्सी, चटाई, ब्रश, गद्दे और कई अन्य सामान बनाए जाते हैं। कठोर खोल का इस्तेमाल हस्तशिल्प और ईंधन सहित अलग-अलग कार्यों में होता है। नारियल के पत्तों से ग्रामीण क्षेत्रों में झाड़ू, टोकरियां, चटाइयां और सजावटी वस्तुएं तैयार की जाती हैं। इस तरह एक नारियल का पेड़ किसान को केवल फल नहीं देता, बल्कि कई छोटे उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध कराता है।
नारियल की यही बहुउपयोगिता उसे आर्थिक रूप से भी महत्वपूर्ण बनाती है। किसान यदि केवल कच्चा नारियल बेचने तक सीमित न रहकर इससे बनने वाले उत्पादों से जुड़े तो आय के नए रास्ते खुल सकते हैं। नारियल तेल, नारियल दूध, सूखा नारियल, प्राकृतिक रेशा, पैक नारियल पानी और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में मूल्यवर्धन की बड़ी संभावना है। इससे खेती के साथ ग्रामीण स्तर पर छोटे उद्यम और रोजगार भी बढ़ाए जा सकते हैं।
हालांकि नारियल की खेती के सामने चुनौतियां भी हैं। बदलता मौसम, कीट और रोग, बढ़ती उत्पादन लागत तथा बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव किसानों को प्रभावित करता है। इसलिए उत्पादन बढ़ाने के साथ आधुनिक खेती, बेहतर किस्मों, प्रसंस्करण सुविधाओं और किसानों को मजबूत बाजार उपलब्ध कराने की जरूरत है।
आज विश्व नारियल दिवस पर नारियल की उपयोगिता गिनाने के साथ उस किसान को भी याद करने की जरूरत है, जिसकी मेहनत से यह हमारे घरों तक पहुंचता है। पूजा की थाली से रसोई तक, प्यास बुझाने से सौंदर्य प्रसाधनों तक और खेत से छोटे उद्योगों तक नारियल की यात्रा बेहद व्यापक है। शायद इसीलिए प्रकृति की यह अनोखी देन फल खत्म होने के बाद भी बेकार नहीं होती-उसका कोई न कोई हिस्सा किसी के काम और किसी की आजीविका का सहारा बन जाता है।