60 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए नई शुल्क व्यवस्था लागू, भारत को 12.5 फीसदी की बजाय 10 फीसदी स्लैब में मिली जगह

नई दिल्ली। वैश्विक व्यापार व्यवस्था में अमेरिका ने एक बार फिर बड़ा बदलाव करते हुए कई देशों के लिए नई आयात शुल्क (टैरिफ) नीति लागू कर दी है। अमेरिकी प्रशासन ने ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 301 के तहत दुनिया की करीब 60 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर दो अलग-अलग शुल्क दरें तय की हैं। नई व्यवस्था के तहत 10 प्रतिशत और 12.5 प्रतिशत के दो टैरिफ स्लैब लागू किए गए हैं, जो पहले से लागू अस्थायी 10 प्रतिशत वैश्विक शुल्क की जगह लेंगे। यह फैसला उस अस्थायी व्यवस्था की अवधि समाप्त होने से ठीक पहले लिया गया है, जिसे फरवरी 2026 में अधिकतम 150 दिनों के लिए लागू किया गया था। इससे पहले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2025 में लगाए गए कुछ टैरिफ को अवैध करार दिया था, जिसके बाद नई अस्थायी व्यवस्था लागू की गई थी।

अमेरिका का कहना है कि यह कदम उन देशों के खिलाफ उठाया गया है, जहां जबरन या बंधुआ श्रम से तैयार उत्पादों के आयात पर प्रभावी रोक नहीं लगाई गई है। वाशिंगटन का दावा है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से ऐसी श्रम व्यवस्था खत्म करने के लिए यह कार्रवाई जरूरी है।

भारत के लिए राहत की बात यह रही कि उसे अपेक्षाकृत कम शुल्क वाले 10 प्रतिशत टैरिफ समूह में रखा गया है। शुरुआती आकलनों में भारत को 12.5 प्रतिशत वाले उच्च स्लैब में शामिल किए जाने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन दोनों देशों के बीच लगातार हुई वार्ता के बाद भारत को कम दर वाले वर्ग में जगह मिली। भारत के साथ ब्रिटेन, कनाडा, मैक्सिको, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित 17 देशों को भी इसी श्रेणी में रखा गया है। वहीं यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया और कुछ अन्य देशों के कई उत्पादों पर 12.5 प्रतिशत तक का शुल्क लगाया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को राहत मिलने के पीछे हाल के महीनों में किए गए नीति सुधार अहम रहे। भारत ने अपनी विदेशी व्यापार नीति में संशोधन करते हुए जबरन श्रम से जुड़े उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगाने की व्यवस्था लागू की थी। अमेरिकी अधिकारियों ने भी इस बदलाव को सकारात्मक कदम माना है।

हालांकि भारत ने अमेरिकी जांच प्रक्रिया और एकतरफा कार्रवाई पर अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई है। नई दिल्ली का कहना है कि श्रम और व्यापार से जुड़े ऐसे संवेदनशील मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत और व्यापार समझौतों के माध्यम से होना चाहिए, न कि एकतरफा टैरिफ लगाकर।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है। वर्ष 2025 में दोनों देशों के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 141 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें भारत का निर्यात 87.3 अरब डॉलर रहा। ऐसे में 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ा सकता है, जिससे अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका है।

इसका सबसे अधिक असर कपड़ा, इंजीनियरिंग उत्पाद, चमड़ा उद्योग, रसायन, हस्तशिल्प और आभूषण जैसे क्षेत्रों पर पड़ सकता है। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) काम करते हैं। अतिरिक्त शुल्क के कारण उनके मुनाफे में कमी आने या निर्यात ऑर्डर घटने की संभावना जताई जा रही है। यदि निर्यात में गिरावट आती है तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि और विदेशी मुद्रा आय पर भी पड़ सकता है, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ने की आशंका रहेगी।

 फार्मास्यूटिकल क्षेत्र को फिलहाल इस नई सूची में बड़ी राहत मिली है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिया है कि भविष्य में भारत से निर्यात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर 100 से 200 प्रतिशत तक अलग शुल्क लगाने पर भी विचार किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो भारतीय दवा उद्योग के लिए यह एक नई और बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।