वैश्विक संकट के असर को कम करने की कोशिश, पेट्रोकेमिकल कच्चे माल पर पूरी छूट का ऐलान
नई दिल्ली : वैश्विक स्तर पर बढ़ते तनाव ने एक बार फिर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने तेल और गैस की सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। हालात ऐसे बने कि क्रूड ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़कर 122 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, जो हाल के समय का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इस उछाल ने न सिर्फ पेट्रोल और डीजल बल्कि एलपीजी जैसी जरूरी चीजों की उपलब्धता और कीमत दोनों को प्रभावित किया है।
तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर दुनिया के कई देशों में दिखने लगा है। कई जगहों पर ईंधन की कमी की स्थिति बन गई है, जबकि निजी कंपनियों ने बढ़ती लागत के कारण कीमतों में बढ़ोतरी भी कर दी है। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता यह रही कि इसका बोझ सीधे आम लोगों पर न पड़े। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने पहले पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की, जिससे उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सके।
अब सरकार ने इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाते हुए पेट्रोकेमिकल उत्पादों पर लगने वाली आयात शुल्क को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। वित्त मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, 2 अप्रैल 2026 से 30 जून 2026 तक कुल 40 से अधिक जरूरी पेट्रोकेमिकल वस्तुओं पर कस्टम ड्यूटी नहीं ली जाएगी। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश के उद्योगों को जरूरी कच्चा माल बिना बाधा और कम लागत पर उपलब्ध हो सके।
इस छूट का सीधा फायदा प्लास्टिक, पैकेजिंग, टेक्सटाइल, फार्मा, केमिकल और ऑटोमोबाइल जैसे प्रमुख क्षेत्रों को मिलेगा। इन उद्योगों की लागत घटने से बाजार में तैयार होने वाले उत्पादों की कीमतों पर भी नियंत्रण बने रहने की उम्मीद है। यानी यह निर्णय केवल उद्योगों के लिए नहीं, बल्कि आम उपभोक्ताओं के लिए भी राहत लेकर आने वाला है।
सरकार ने जिन प्रमुख उत्पादों पर आयात शुल्क हटाया है, उनमें मेथेनॉल, टोल्यून, स्टाइरीन, विनाइल क्लोराइड मोनोमर, मोनोएथिलीन ग्लाइकॉल, फिनॉल और एसिटिक एसिड जैसे रसायन शामिल हैं। इसके अलावा पॉलीइथिलीन, पॉलीप्रोपीलीन, पीवीसी, पीईटी और इंजीनियरिंग प्लास्टिक जैसे उत्पाद भी इस सूची में हैं। ये सभी ऐसे कच्चे पदार्थ हैं, जिनका इस्तेमाल रोजमर्रा की कई चीजों के निर्माण में होता है।
उदाहरण के तौर पर मेथेनॉल का उपयोग प्लाईवुड, पेंट और दवाओं के निर्माण में होता है, जबकि टोल्यून से पेंट, गोंद और प्रिंटिंग इंक बनाई जाती है। पॉलीइथिलीन और पीवीसी का इस्तेमाल पानी की पाइप, बोतलें और पैकेजिंग सामग्री बनाने में किया जाता है। इसी तरह, पॉलीस्टाइरीन से डिस्पोजेबल बर्तन और फूड कंटेनर तैयार किए जाते हैं। यानी इन कच्चे माल की लागत कम होने का असर सीधे आम लोगों की दैनिक जरूरतों पर पड़ेगा।
इस फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष है, जिसने शिपिंग रूट्स को प्रभावित किया है। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से तेल और गैस की सप्लाई बाधित हुई है। भारत अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, ऐसे में इस तरह की वैश्विक स्थिति का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।
सरकार ने हाल ही में डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल पर एक्सपोर्ट ड्यूटी लगाकर घरेलू उपलब्धता को भी सुनिश्चित करने की कोशिश की है। इन सभी उपायों का मकसद यही है कि अंतरराष्ट्रीय संकट का असर भारतीय बाजार और आम नागरिकों की जेब पर कम से कम पड़े।
कुल मिलाकर, यह कदम सरकार की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए वह वैश्विक अस्थिरता के बीच देश की अर्थव्यवस्था को संतुलित रखने और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश कर रही है। अब यह देखना अहम होगा कि आने वाले समय में वैश्विक हालात किस दिशा में जाते हैं और इन फैसलों का जमीनी असर कितना प्रभावी साबित होता है।