युवा वर्ग, छात्र आंदोलन और स्थानीय मुद्दों ने चुनाव की दिशा बदल दी। कम मतदान ने भी सत्ता पक्ष के लिए कई सवाल खड़े कर दिए

बिहार : बांकीपुर का उपचुनाव बिहार के लिए सिर्फ एक सीट का चुनाव नहीं था। यह 1995 से लेकर 2025 तक इस क्षेत्र में भाजपा के लगातार चले आ रहे वर्चस्व की परीक्षा थी और इस परीक्षा में भाजपा फेल हो गई। वजह कोई एक नहीं थी। वजह थी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जनता की गहरी नाराजगी, उदासीनता और बदलाव की चाहत। इसी का सीधा असर मतदान पर पड़ा और वोटिंग सिर्फ 34 प्रतिशत से कुछ अधिक पर सिमट गई।

इस चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर कोई प्रत्याशी नहीं था। सबसे बड़ा फैक्टर जेन-जी (Gen Z) था। चुनाव से पहले वह कहीं नहीं दिखा-न बैनरों में, न सभाओं में। लेकिन मतदान के दिन वह सामने आया। छात्र आंदोलन का ताजा जख्म, भर्ती का इंतजार और पेपर लीक का गुस्सा‐इन सबने मिलकर सरकार के खिलाफ एक माहौल बनाया। और वह माहौल सीधे भाजपा के खिलाफ गया। जेन-जी ने बता दिया कि अब वह किसी के कहने पर वोट नहीं देगा, बल्कि अपने सवालों के आधार पर वोट करेगा।

बांकीपुर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का गृह क्षेत्र है। 1995 से लेकर 2025 तक यहां भाजपा का जलवा रहा है। कायस्थ मतदाताओं की बड़ी संख्या और प्रभाव के कारण भाजपा यहां लगातार जीतती रही। लेकिन इस बार न नितिन नवीन का कोई जादू चला और न ही पार्टी का पुराना समीकरण काम आया। उम्मीदवार के चयन से लेकर छात्रों के आंदोलन तक, हर मुद्दे पर भाजपा के परंपरागत मतदाता उत्साहित नहीं दिखे। कुछ विशेष कारणों से मतदान करने वाले मतदाताओं की संख्या में भी कमी आई। हालांकि उनकी संख्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई, लेकिन घटी जरूर।

राज्य के इतिहास में किसी उपचुनाव में सत्ता पक्ष ने शायद ही कभी इतनी ताकत झोंकी हो। मामला चुनावी खर्च का हो, घर-घर तक मंत्रियों और विधायकों की दस्तक का हो या प्रशासनिक तंत्र की सक्रियता का-पूरी एनडीए इस साधारण से प्रत्याशी को जिताने के लिए मैदान में उतर गई थी। बिहार में ऐसा नजारा पहले कभी नहीं देखा गया। फिर भी नतीजा नहीं बदला।

2025 के चुनाव की तुलना में 2026 के उपचुनाव में लगभग 7 प्रतिशत कम मतदान हुआ। अनुमान है कि यह कमी विपक्ष से ज्यादा सत्तारूढ़ दल के समर्थकों में आई। यानी भाजपा के करीब 7 प्रतिशत समर्थक मतदान के लिए घर से ही नहीं निकले। किसी भी उपचुनाव में 7 प्रतिशत मतदान की गिरावट सत्ता पक्ष के लिए गंभीर संकेत मानी जाती है। इसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ सकता है।

इस चुनाव की दूसरी सबसे बड़ी बात भाजपा के खिलाफ मतदाताओं की व्यापक गोलबंदी रही। 2025 की रनर-अप रेखा गुप्ता को मतदाताओं ने पूरी तरह किनारे कर दिया। भाजपा के खिलाफ परिवर्तन के पक्ष में मतदान हुआ और उसका बड़ा लाभ जन सुराज के प्रशांत किशोर को मिला। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं है कि मतदाताओं में प्रशांत किशोर के प्रति कोई असाधारण आकर्षण था। लोगों ने भाजपा के विरोध में मतदान किया और उसका फायदा जन सुराज को मिला।

हां, प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी को लेकर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं के मन में एक आशंका जरूर थी। सवाल यह था कि अगड़ी जाति से आने के कारण क्या वे उनके हितों की रक्षा कर पाएंगे। लेकिन भाजपा के प्रति नाराजगी इतनी अधिक थी कि बदलाव की इच्छा उस आशंका पर भारी पड़ गई।

राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार के अपेक्षाकृत कमजोर होने और पार्टी की कम सक्रियता के कारण भी भाजपा विरोधी वोटों का बड़ा हिस्सा जन सुराज की ओर चला गया। इस चुनाव में मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने जाति और धर्म से ऊपर उठकर भाजपा के खिलाफ मतदान किया।

भाजपा के प्रति नाराजगी के कई कारण रहे। सबसे बड़ा कारण उम्मीदवार का चयन था। दूसरा, छात्र आंदोलन और जेन-जी के प्रति सहानुभूति का माहौल। तीसरा, बिहार की मौजूदा सरकार और कानून-व्यवस्था को लेकर असंतोष। कई लोगों का कहना था कि 2025 में मिला जनादेश भाजपा के लिए नहीं, बल्कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल (यूनाइटेड) के लिए था। सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार की कार्यशैली और कानून-व्यवस्था भी चुनावी मुद्दा बनी।


बांकीपुर कायस्थ मतदाताओं का प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता रहा है। इसी संख्या बल के कारण भाजपा यहां 1995 से लगातार जीत दर्ज करती रही। लेकिन इस बार उम्मीदवार के चयन और छात्र आंदोलन के कारण यह वोट बैंक भी पूरी तरह उत्साहित नहीं दिखा। दूसरी ओर, इस चुनाव में कोई भी जाति भाजपा के लिए कोर वोट बैंक के रूप में एकजुट नहीं हुई। उपेंद्र कुशवाहा और उनके पुत्र तथा मंत्री प्रकाश कुमार बांकीपुर में प्रभावी रूप से नजर नहीं आए। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके पुत्र निशांत का भी कुर्मी मतदाताओं पर कोई खास असर नहीं दिखा। इस जाति के अन्य नेताओं ने भी प्रचार किया, लेकिन वे जातीय गोलबंदी भाजपा के पक्ष में नहीं कर सके। मतदाताओं में स्पष्ट बिखराव दिखाई दिया।

अगड़ी जातियों में भी यही स्थिति रही और पिछड़ी जातियों में वैश्य समाज को छोड़कर व्यापक एकजुटता नहीं दिखी। दलित वोटों का भी लगभग यही हाल रहा।

सबसे चौंकाने वाली बात राष्ट्रीय जनता दल के कोर वोट बैंक को लेकर रही। यादव और मुस्लिम मतदाताओं ने भी राजद के पक्ष में अपेक्षाकृत कम मतदान किया। भाजपा ने सभी जातियों के मत हासिल करने का प्रयास किया, लेकिन युवा मतदाताओं के बदलाव के पक्ष में मतदान करने के कारण भाजपा प्रत्याशी की जीत का दावा मजबूत नहीं दिखा। सरकारी तंत्र और पुलिस पर भाजपा प्रत्याशी की मदद करने के आरोप भी लगे, इसके बावजूद बांकीपुर में भाजपा विरोधी मतों की व्यापक गोलबंदी दिखाई दी। ऐसे में यदि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष रहा, तो परिणाम कुछ भी हो सकता है।

अंत में एक बात तय है। यदि भाजपा बांकीपुर में हारती है, तो पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन से लेकर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तक सभी के नेतृत्व की समीक्षा होगी। जेन-जी आंदोलन के बाद पार्टी के लिए यह दूसरा बड़ा झटका माना जाएगा। हालांकि इसे केवल प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत जीत कहना उचित नहीं होगा। इसे भाजपा के खिलाफ जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाएगा। बांकीपुर ने यह संदेश जरूर दिया है कि बिहार में अब वोट केवल जाति के आधार पर नहीं, बल्कि मुद्दों और नाराजगी के आधार पर भी पड़ने लगे हैं।