भाजपा को ऐतिहासिक हार और राजद को बड़ा झटका मिला है। इस परिणाम के बाद प्रदेश की राजनीतिक रणनीतियां बदल सकती हैं

बिहार : बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव का परिणाम आ गया है और इसने सबको चौंका दिया है। भारतीय जनता पार्टी हार गई है। उसके प्रत्याशी नीरज कुमार, जन सुराज के उम्मीदवार प्रशांत किशोर से 19,324 वोटों से हार गए। राष्ट्रीय जनता दल की प्रत्याशी रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं और अपनी जमानत भी नहीं बचा सकीं। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में रेखा गुप्ता को 41 हजार से अधिक वोट मिले थे, जबकि इस बार उन्हें केवल 14,273 वोट मिले।

31 राउंड की मतगणना हुई। एक भी राउंड ऐसा नहीं रहा, जिसमें भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार बढ़त बना सके हों। वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ से भी हार गए और अपने बूथ से भी पीछे रहे। जिस क्षेत्र में कायस्थ मतदाताओं की अहम भूमिका मानी जाती थी, वहां भी भाजपा की ताकत का वास्तविक आकलन सामने आ गया। यह साधारण हार नहीं है। यह उस किले की हार है, जिस पर 1995 से भाजपा का कब्जा था। 31 वर्षों का यह वर्चस्व एक झटके में समाप्त हो गया।

मतगणना पूरी होने से पहले ही भाजपा के कई काउंटिंग एजेंट बाहर निकल गए। सुबह से पार्टी कार्यालय में जीत की उम्मीद और लड्डुओं की तैयारी थी, लेकिन शाम तक वहां सन्नाटा पसरा हुआ था। उदासी और खामोशी ने पूरे कार्यालय को अपनी गिरफ्त में ले लिया। प्रधानमंत्री से लेकर पार्टी के बड़े नेताओं तक ने नितिन नवीन की राजनीतिक क्षमता की खूब प्रशंसा की थी। पश्चिम बंगाल में भाजपा की पहली जीत का श्रेय भी उन्हें दिया गया था। लेकिन उन्हीं के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर पार्टी को इतनी बड़ी हार मिली कि उससे उबरना आसान नहीं होगा।

इस हार के दो बड़े मायने हैं। पहला, यह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्र की हार है और वह भी 31 वर्षों के लगातार कब्जे के बाद। दूसरा, लगभग चार महीने पहले बनी भाजपा-जदयू सरकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए यह सीधा राजनीतिक झटका है। सरकार बनने के तुरंत बाद जनता ने अपना पहला बड़ा संदेश दे दिया है।

अब सवाल उठता है कि यह हार आखिर किस वजह से हुई। क्या यह भाजपा की किसी सुनियोजित रणनीति का परिणाम है या फिर जनमानस में बढ़ रही नाराजगी का असर? इसका उत्तर समय देगा। लेकिन चुनाव मैदान से जो संदेश सामने आया, वह यह था कि मतदाताओं के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के निर्णयों तथा कथित राजनीतिक अहंकार को लेकर असंतोष दिखाई दिया। इस क्षेत्र में भाजपा को ऐसी हार मिली, जिसकी कल्पना भी शायद किसी ने नहीं की थी। 1995 से पहले भाजपा को इस क्षेत्र में इतने कम वोट कब मिले थे, यह भी अब शोध का विषय बन सकता है।

जन सुराज के लिए यह जीत कितना बड़ा वरदान और नया जीवनदान साबित होगी, यह आने वाला समय बताएगा। लेकिन यदि जन सुराज इसे केवल प्रशांत किशोर की व्यक्तिगत जीत मानकर आत्ममुग्ध हो जाता है, तो परिणाम उसके लिए प्रतिकूल भी हो सकते हैं। बांकीपुर की यह जीत केवल प्रशांत किशोर की जीत नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संविधान, छात्रों और युवाओं की जीत के रूप में भी देखी जा रही है। इसे जेन-जी की जीत भी कहा जा सकता है।

इस जीत में राष्ट्रीय जनता दल के एक बड़े धड़े और उसके समर्थकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। ऐसा कहा जा रहा है कि तेजस्वी यादव को छोड़कर पार्टी के कई कार्यकर्ताओं ने दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर मतदान किया। बांकीपुर में यह धारणा भी बनी कि चुनाव भाजपा के खिलाफ नहीं, बल्कि भाजपा के कथित अहंकार के खिलाफ लड़ा गया। विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ गठबंधन के कुछ घटक दलों के भीतर से भी आंतरिक समर्थन मिलने की चर्चा रही। यदि जनता दल (यूनाइटेड) के एक वर्ग का समर्थन नहीं मिलता, तो यह मुकाबला इतना आसान नहीं होता।

यह चुनाव जाति और धर्म की पारंपरिक सीमाओं से ऊपर उठकर लड़ा गया। इसके बावजूद पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यक मतदाताओं का समर्थन प्रशांत किशोर के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ। कुछ लोग इसे किसी विशेष वर्ग की जीत कह सकते हैं, लेकिन उस वर्ग के जेन-जी मतदाताओं ने अलग सोच दिखाई। कांग्रेस और वामपंथी दलों के नैतिक समर्थन की भी चर्चा रही, जिसने भाजपा विरोधी मतों के ध्रुवीकरण में भूमिका निभाई।

बांकीपुर का प्रभाव केवल भारतीय जनता पार्टी तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर बिहार सरकार में शामिल जनता दल (यूनाइटेड) पर भी पड़ सकता है। नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद पार्टी के नेतृत्व में आए बदलाव और कथित भगवाकरण को लेकर असंतोष इस चुनाव में दिखाई दिया। समाजवादी विचारधारा से जुड़े जदयू के एक वर्ग की पार्टी नेतृत्व से असहमति की चर्चा लंबे समय से रही है। यही कारण माना जा रहा है कि तमाम प्रयासों के बावजूद जदयू का परंपरागत मतदाता पूरी तरह एनडीए प्रत्याशी के साथ नहीं दिखा।

आने वाले समय में बिहार की राजनीति की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है। यदि जनता दल (यूनाइटेड) के भाजपा में विलय या उसके पूर्ण भगवाकरण की दिशा में कदम बढ़ते हैं, तो पार्टी का एक वर्ग तीसरी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर रहे प्रशांत किशोर की ओर जा सकता है।

राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी यह चुनाव एक कठोर संदेश लेकर आया है। लालू प्रसाद यादव की सक्रिय राजनीति सीमित होने के बाद पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर असंतोष की चर्चा होती रही है। 2025 के चुनाव के बाद तेजस्वी यादव जिस तरह पार्टी का संचालन कर रहे हैं, उससे भी कुछ वर्गों में नाराजगी की बात कही जा रही है। बिहार में कांग्रेस के प्रति आम लोगों का नजरिया भी बदला है। हालांकि पार्टी के भीतर अभी भी ऐसे नेताओं की चर्चा होती है, जिन पर कांग्रेस को मजबूत नहीं होने देने के आरोप लगते रहे हैं। इसके बावजूद इस चुनाव के बाद कांग्रेस राज्य में विपक्ष की रिक्त जगह भरने का प्रयास कर सकती है।

बांकीपुर से जेन-जी को लगातार दूसरी बड़ी सफलता मिली है। जंतर-मंतर के बाद यह पहली चुनावी जीत मानी जा रही है। इससे उनका उत्साह निश्चित रूप से बढ़ेगा और वे नए मनोबल के साथ व्यवस्था परिवर्तन की अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे।

यह जीत महज 19,324 वोटों के अंतर की जीत नहीं है। इसे उस सोच की हार के रूप में भी देखा जा रहा है, जो मानती थी कि बिहार को गुजरात का मॉडल अपनाना चाहिए। इसे उस राजनीतिक अहंकार की हार भी कहा जा रहा है, जो मानता था कि दशकों पुराना गढ़ कभी नहीं टूटेगा। साथ ही इसे उस राजनीति के खिलाफ जनमत भी माना जा रहा है, जो युवाओं के सामने दूसरे मुद्दे रखकर पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे सवालों को पीछे छोड़ देना चाहती थी।

बांकीपुर ने एक बार फिर संदेश दिया है कि जब सत्ता जनभावनाओं से दूर होती है और जब छात्रों व युवाओं के मुद्दे प्रमुख बनते हैं, तब बिहार अपनी राय स्पष्ट रूप से व्यक्त करता है। 50 वर्ष पहले जयप्रकाश नारायण ने जिस आंदोलन की राह दिखाई थी, आज उसी विरासत की चर्चा नए संदर्भों में की जा रही है। अब गेंद भाजपा, जदयू और राजद—तीनों के पाले में है। भाजपा को तय करना है कि उसे आत्ममंथन करना है या पुरानी राह पर चलना है। जदयू को तय करना है कि वह अपनी समाजवादी जड़ों को प्राथमिकता देगा या नई राजनीतिक दिशा को। वहीं राजद को भी तय करना होगा कि वह संगठन और कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देगा या पारिवारिक राजनीति को।

बांकीपुर ने अपना फैसला सुना दिया है। 31 वर्षों का किला ढह चुका है। अब आने वाला समय बताएगा कि इस राजनीतिक मलबे पर नई इमारत कौन और कैसे खड़ी करता है।

अंतिम परिणाम

प्रशांत किशोर — 64,151 वोट

नीरज कुमार — 44,827 वोट

रेखा गुप्ता — 14,273 वोट

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कुल मतदान : 130208